जनरल वी के सिंह का ब्लॉग मेजर गोगोई के लिए

मेजर गोगोई के द्वारा की गयी कार्यवाही पर हो रही प्रतिक्रियाएँ मैंने धैर्य से सुनी। हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी एवं मानवाधिकारों के संरक्षकों को मेरा प्रणाम। आप पुनः अपेक्षाओं पर खरे उतरे।
परन्तु मुझे उनकी दलीलों से समस्या है। शायद आपको भी होनी चाहिए।
उनके अनुसार मेजर गोगोई ने कश्मीर में पत्थरबाज़ गिरोह के सरगना को जीप पर बाँधा और संविधान में दिए उसके मूल अधिकारों का हनन किया। क्या हो गया भारतीय सेना को?
मेरा एक सवाल उन बुद्धिजीवियों के लिए – आप क्या करते? मैं दावे के साथ कहता हूँ कि यदि आपके साथी उस परिस्तिथि में आपसे सहायता की गुहार लगाते, और आपको स्तिथि की गम्भीरता ज्ञात होती, तो आपमें से 95% लोग उस मुसीबत में नहीं कूदते। यदि आप साहस जुटा पाते हैं तो आप मेजर गोगोई के स्थान पर स्वयं की कल्पना कीजिये। आपके पास विकल्प सीमित हैं-
1.उपद्रवी भीड़ को आत्मसमर्पण करके उनके विवेक पर आस्था रखें। ध्यान रखें कि वह भीड़ पहले ही जनतांत्रिक चुनाव को बाधित करके और लोकसेवकों पर प्राणघातक हमले कर के क़ानून अपने हाथ में ले चुकी है।
2.बन्दूक उठायें और पत्थर का जवाब गोली से दें।
यदि आपने पहला विकल्प चुना तो आपने जनतंत्र के आक्रान्ताओं को उसके संरक्षकों के ऊपर प्राथमिकता दी है। संविधान में दिए हुए अधिकारों और उनके संरक्षण के ऊपर टिप्पणी करने के आप योग्य नहीं रहे। आपको इसका बोध कराना भी आवश्यक है कि सैनिक का जीवन आपके घमण्ड को पोषित करने के लिए प्रयोज्य नहीं है। दूसरा विकल्प आप अपने साथियों और लोकसेवकों के संरक्षण के लिए चुन सकते थे क्योंकि एक उपद्रवी जनसमूह से आत्मरक्षा के लिए यह अंतिम मार्ग हो सकता था।
अब तथ्य की बारी।
तपिश शायद इसलिए भी तीव्र है क्योंकि मेजर गोगोई के स्थान पर आप नहीं थे और दोनों विकल्पों के प्रयोग में आप ही की विजय सुनिश्चित थी। अपने निर्णय का स्वयं के ऊपर परिणाम की चिन्ता दरकिनार करते हुए मेजर गोगोई ने तीसरा विकल्प ढूँढ निकाला और अपने साथियों को सकुशल निश्चित मृत्यु से बचा लिया। और यह आशा करते रहे होंगे कि कल उनके निर्णय को शायद उनकी परिस्तिथि की आशाहीनता से जोड़ा जा सकेगा।
पत्थर हाथ में ही रह गए किसी और दिन फिकने के लिए। जो बुद्धिजीवी मेजर गोगोई के लिए दण्ड चाहते थे वे प्यासे रह गए।
ईश्वर आपको दुःख सहने की शक्ति दे।

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In English

A lot has been said about Major Gogoi and his actions on Election Day in the valley. I have been listening patiently to some of the arguments put forward by the champions of human rights who have an intellectual bent of mind.
I have a problem with the arguments, and so should you.
These champions of human rights who are crying hoarse for the man tied to the jeep are lamenting what the army has come down to. The army which is supposed to defend every citizen of the country is now employing human shields and blatantly compromising the fundamental rights as provided in the constitution.
My questions to them is – What would you have done?
As I see it, if these intellectuals understood the gravity of the situation, 95% of them would have not have come to the rescue of the polling team, and the men protecting them. If they did have the guts to appear, they had few options before them when faced by a bloodthirsty mob which was swelling by the minute.
1. Offer themselves as human sacrifice to protect the right of a mob to pelt stones and kill anyone trying to conduct a democratic election.
2. Fire at the mob, and disperse it by force.
If you chose Option 1, you obviously chose the assailants of democracy over its protectors. You are no longer qualified as champions of rights as provided in the constitution. You should also be informed that army men are not disposable to pander to your misplaced sense of righteousness.
Given the situation, option 2 may have been your choice to defend yourself and your team which was doing a job sanctioned by the government, from a mob which is undeniably on the wrong side of the law.
Now here is the fact. The burn felt by these intellectuals is especially severe because Major Gogoi produced the third option knowing fully well the personal ramifications of his decision as an officer. He knew that he would be reprimanded for a solution to protect the men under his command. He took the selfless decision and hoped that his desperation would be understood.
The intellectuals now baying for his blood have been left thirsty. And rightly so

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