वक्त कितना बदल गया

अगर आप को अपने बचपन की यादों को गर्मीयों की छुट्टीयों को ताज़ा करना है तो जरूर पढ़ें-:

समय पंख लगाकर कैसे उड़ गया पता ही नहीं चला,मां का कमरे से आवाज लगाना दौड़कर मां के नजदीक पहुंच जाना अभी भी याद है वह सब,वह समय ही कुछ और था |सुबह तड़के उठ जाना, स्कूल के लिए तैयार होना,अपने आप जूते और म़जे पहनना,और मम्मी का खूब सजाना संवारना।

मेहदावल में ही मेरा बचपन बीता,मेहदावल में ही मैं पला बढ़ा,अगर यादों के पन्ने मैं पलटता हूं तो देखता हूं कि वह समय ही कुछ और था मुझे अभी भी वह दिन याद है जब हम अपनी मां से एक रूपये और दो रूपये लेने पर भी बहुत खुश हुआ करते थे |दो रूपये की दो आइसक्रीम मजे से खा लेते थे |

उस समय की इमली, कटारे, बेर, शकरकंदी, इमली के चिएँ, सुपारी अभी भी मुंह में पानी ला देते है |वह मजा और चीजें आजकल कहां |आज के बच्चों को पिज्जा बर्गर के अलावा कुछ नहीं सूझता |सन् 2007 मेरी दादी जी को गुजरे आज दस साल बीत चुके हैं मगर उनका एहसास उनकी यादें, उनका प्यार, हर बात के लिए टोकना, अच्छी बातें और संस्कार जो हमने अपनी दादी मां से पाए सभी यादों की सुनहरी कड़ी में अभी भी जीवित हैं |

जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव आए,परिवार में दस से ज्यादा सदस्य,हर स्थिति का सामना हम सभी ने बहुत धैर्य और साहस से किया| एक समय वह था जब हम तंगहाली में भी एक जोड़ी कपड़ों में पूरा साल निकाल देते थे मगर आज बच्चों को सभी सुविधाएं चाहिए उन्हें इससे कोई सरोताज नहीं कि उनके मां-बाप इस स्थिति में है या नहीं आजकल के बच्चों को सिर्फ उनकी फरमाईशों के पूरा होने से मतलब है|

मुझे अपने समय का रविवार और बुधवार भुलाए नहीं भूलता उस समय दूरदर्शन और मेट्रो नेटवर्क ही हुआ करता था दूरदर्शन पर हर रविवार को फिल्म आती जिसका इंतजार पूरे हफ्ते रहता था बुधवार को 8:00 बजे चित्रहार और ,शक्तिमान, शकालाका बुम बुम का सभी को बेचैनी से इंतजार रहता था | क्या दिन थे ? वह भी कि रविवार की प्रात: सब तड़के उठकर घरों की सफाई में तल्लीन हो जाते और टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों को देखने के लिए 8:00 बजे से पहले-पहले नाश्ता पानी हो जाते और फिर पूरा परिवार मिलकर एक ही हॉल में सभी कार्यक्रमों का लुफ्त उठाते |फेरीवालों के गलियों में चक्कर और हर फेरीवाले को रोककर समान लेकर खाना मजा ही कुछ और था |जिस बच्चे के पास पांच रुपया होता बस फिर मत पूछो वह क्या-क्या खा सकता था दो रुपये के 10 बिस्कुट दो रुपये की 10 नलियां जिन्हें फुकनी भी कहते थे| आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि 5₹ में कितनी सारी चीजें हम उस समय खाया करते थे त्यौहार पर रिश्तेदारों से पांच और दस के नोट का मिलना और सब नोटों को इकट्ठा करना सब से पूछना कि उन्हें किसने कितने पैसे या रुपए दिए वह वक्त और मजा ही कुछ और था आज अगर स्मृतियों के पन्ने पलटते हैं तो आज की भागमभाग की जिंदगी से चिढ़ मचती है | उस समय कितना सुकून |

त्योहारों का अपना ही मजा था परिवार की एकजुटता प्यार और अपनापन मिलकर बैठना सब बहुत यादगार है| पहले घरों ,हवेलियों में लोहे के जाल बने होते थे जाल पर साथ-साथ खाना खाना |छत पर टहलना उस समय वातानुकूलित यंत्र नहीं होते थे इसलिए स्वच्छ शीतल ठंडी हवा का मजा छत पर ही लिया जाता था |दोपहर शाम ढलते ही छतों को ठंडा करते थे|पानी डालते थे | पानी को सुखाने के लिए पंक्ति भी गाते थे |जमीन को जल्दी सूखाने के लिए यह सब किया करते थे |

छत के सुखते ही अपना-अपना बिस्तर बिछाना, लेट कर आसमान को देखना ,तारों को देखना, बादलों का चलना क्या जमाना था आज भी यह सब बातें लिखते हुए मुझे हंसी भी आ रही है और जहन में वह सभी तस्वीरें फिर से ताजा होती नजर आ रही है वक्त कैसे गुजर जाता है कभी हम खुद बच्चे हुआ करते थे आज बच्चों के पालक हैं उनको देख कर अपना बचपन फिर से लौट आता है मगर आज जब देखते हैं कि जो हमारे समय में बात थी वह आज नहीं है ना ही शुद्ध वायु शुद्ध जल शुद्ध खाना कुछ भी तो शुद्ध नहीं है |आज की भागमभाग की जिंदगी ने उनको भी एक मशीन बना दिया है उस समय स्कूल जाने में भी एक मजा आता मगर आजकल के बच्चे स्कूल जाने से भी कतराते हैं स्कूल का नाम लेते ही उन को बुखार चढ़ जाता है |

हमारे वक्त का मज़ा ही कुछ ओर था| ये तो स्मृतियों के कुछ पन्ने हैं जो आपके साथ साँझा किए हैं और जिनको लिखने के लिए कलम अपने आप ही लेखनी बनकर कागज पर उतर आई है |

मनीष की कलम से

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