दिल्ली वालों से ही सीख लें

काफी पहले की बात है उन दिनों मैं दिल्ली में था।2 जून के दोपहर में पैदल दक्षिणी दिल्ली मे किसी रोड की ओर बढ़ रहा था।उन दिनों इतने पैसे नहीं थे सो पैदल चला जा रहा था। दूर-दूर तक कंक्रीट का जंगल होता था।सर मुंडवा रखा था,रास्ते मे कही पेड़ नही थे जिसकी छाया में बैठ सकता।तेज धूप से सिर पर छाले से पड़ गए।कई दिन बीमार रहा।उन दिनों दिल्ली में प्रदूषण के हालात इस कदर बिगड़ गए थे कि रात को सोते थे तो सुबह तक सफेद चादर काली हो जाती थी।इतना प्रदूषण था की साँस लेना मुश्किल।दूसरे जल का टोटा गन्दा पानी आता था।अब् तो बोरिंग से पानी नही निकलता।पेड़ों-पौधे के नामो-निशान बस रह गए थे।बिल्डिंगे और सड्के इतनी तेजी से बनी की सभी पेड़ लील गई।समय बीतता गया।आप गर्व कर सकते हैं इस पर। यह 2010 के जून की बात है।एक दिन मैंने एक खबर पढ़ी।दिल्ली में पेड़ों की ऊंचाई से हरियाली नापी गई।जबकि ग्रीनरी नापने की परम्परा जमीन पर हरियाली के फैलाव से रहा है।यह कुल बीस साल में हुआ।यह सारी दुनिया में सबसे अनूठा पैरामीटर था।आज यह दुनिया का सबसे हरा-भरा और सबसे ज्यादा वृक्षों वाला शहर है।कई देशों के लोग दिल्ली वालो से यह सीखने आये कि ऐसा कैसे किया जाए।हालांकि गाड़ियां,डीजल वाहन,और कार्बन प्रोडक्शन तुलना में कई सौ गुना बढ़ गया।इस वजह से प्रदूषण कंट्रोल नही हुआ।फिर भी इतनी सफल वृक्षारोपण दिल्लीवासियों की उपलब्धि है।

उस समय की जनता आगे आई थी।उस समय की सरकार ने यह प्लान किये।उन्होंने प्लान किए हर सड़क, हर बची हुई जमीन,हर बड़े-छोटे भूखंड पर,तालाब के किनारे,ऐतिहासिक स्थल पर पीपल,पाकर,गूलर,बरगद,आंवले,बेल आदि लाखों पेड़ लगाए।सभी लोग इसमें सहभागी बने।एक-एक पेड़ एक-एक परिवार द्वारा देखभाल किया गया,छोटे बच्चे-बच्चियां लगातार इस काम में इच्छाशक्ति से लगे रहे तब जाकर आज दिल्ली की ग्रीनरी वैश्विक स्तर से भी ऊपर है।वहां का हर गलियारा,चप्पा-चप्पा दुनिया में किसी भी महानगर,मेट्रो की तुलना में हरा-भरा है।सरकारी विभागों के अलावा भी सभी दिल्लीवासियों ने इसे टारगेट,और जीवन पद्दति के तौर पर लिया था उसके परिणाम स्वरुप आज पेड़ो की छाया पाते है।किसी तरफ चले जाइए ऊंचे-ऊंचे पेड़ दिल को सकून देते हैं। यह हो सकता है कि छोटे शहरों में और गांव में आपको जामुन,बेर,बेल,शहतूत,आवंले,कैथ खाने को ना मिले लेकिन दिल्ली के कई मोहल्लों में, कई कालोनियों में आपको यह आसानी से खाने को मिल जाता है।दिल्ली वालों ने इसके लिए भरसक त्याग किये है।जब एशियाड के समय ठेकेदार कुछ काटने चले बड़ी संख्या में लोग सड़क पर उतर आये।पेड़ काटने नही दिया गया।बल्कि सरकार को मजबूर होकर बड़ी-बड़ी मशीनों से पेड़ो को जड़-जमीन सहित दूसरे इलाके में लगाना पड़ा।लोग उन पेड़ो की देखभाल तब तक करते रहे जब-तक नई कोपलें नही निकल आई।यह होता है जज्बा।

केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्लीवासियों की बड़ी हंसी उड़ती रहती है,उनकी समझ पर प्रश्न उठते है,लेकिन वृक्षारोपण की सफलता के वजह से उस समय भी मेरे मन में दिल्लीवासियों के प्रति सम्मान बरकरार रहा।दिल्ली चाहे जैसी हो लेकिन हरियाली के मामले में पेड़ों के मामले में, वृक्षों के मामले में, उसने साबित किया कि वह ‘दिल वालो का शहर है।आज सारी दुनिया में सबसे ज्यादा पेड़ जिस शहर में है।उसका नाम दिल्ली है।कुछ दिनों पहले मैं दिल्ली में था खेल गांव में रुका हुआ था।मैंने इतने मोटे-मोटे पेड़ इधर के सालो मे गांवो में भी नहीं देखे।जहां-तहां मैना,चिड़ियां,कबूतर,तोते,गौरेये,नीलकंठ,कठफोडवा,गिलहरी,किलहट,बुलबुल,आदि अधिकांश भारतीय पक्षियों की प्रजातियां वहां मौजूद थी और चहचहा रही थी।कालोनियों में अधिकांन्श अपार्टमेंट की छतों पर पेड़ की डाले आ जाती हैं।कई घरो मे चिड़ियो के लिए पानी रखने की परंपरा भी मैं ने देखी।प्रकृति का यह रंग देखकर मन को एक सुकून सा मिल रहा था।अब् दिल्ली वालों को यमुना जी पर जुटना चाहिए।उनका जल संकट भी हल हो जाएगा।(खैर! यह दूसरा विषय है)

सकारात्मक दृष्टिकोण से अगर हम उनके अनुभवों से सबक लें,योजनाओं से,स्थानीय नागरिकों के प्रयास से, पेड़ों के प्रति लगाव से हम कुछ सीखें और अमल में ले तो हमारा पूरा देश ऐसा हरा-भरा हो सकता है।कभी लखनऊ भी हरा-भरा था।इसे बागों का शहर कहते थे।आज हम अधिकांश शहर में घूम ले,पेड़ बहुत कम दीखते है।विकास के नाम पर बीचो-बीच शहर से हजारों पेड़ काट डाले गए,लेकिन लगाए नहीं गए।जो लगाये गये है उनकी देखभाल नही होती।ऐसे ही कानपुर,इलाहाबाद,बनारस,गोरखपुर,देश-प्रदेश के अधिकांन्श शहरो में भी हर जगह पेड़ काटे तो गए लेकिन लगाए नहीं गए।मध्य प्रदेश के शहरो को छोड़कर आप जहां भी जाये यह महसूस होगा।कई जगह ऐसी भी है जहां ऑक्सीजन की कमी हरदम महसूस होती है।

लगभग सभी छोटे शहरों का भी यही हाल है।सरकारी योजना बनाती हैं।हर साल 5 जून से 10 जुलाई तक पेड़ लगते हैं।इतने पेड़ अगर सचमुच लग जाएं और देखभाल हो जाए तो आपका शहर खूबसूरत घने जंगल में ही बदल जाए जैसे कि दिल्ली बदल गई।लेकिन वह पेड़ जाने कहां खो जाते हैं।उसमें जन प्रयास का अभाव भी दिखता है।बिलकुल अपना कर्मकांड करके काम खत्म कर लिया जाता है।हर साल हम पौध-रोपन का विश्व-रिकार्ड बनाते है।वह अभियान के तौर पर केवल चार दिनों का खेल-प्रदर्शन बनकर रह जाता है।कुछ ठेकेदार टाइप लोगो को मोटा माल मिल जाता है,और धरती सूनी रह जाती है।ध्यान रखिए वृक्ष,प्रकृति और वर्षा,अकाल का बड़ा घना सम्बन्ध होता है।पेड़ वर्षा जल आकर्षित करते है।जीवन का अस्तित्व पेड़ो की वजह से है।पेड़ ग़ायब होने के 100 साल के अंदर वहां से अन्य जीवन भी खत्म हो जाता है।घर,साधन कम पड़ गए तो भी मानव जी लेगा पेड़ गये तो जीव और जीवन खत्म ही होना है।

देश के बहुत से गाँवों से भी पेड़-बाग़ गायब हो गए है।मेरे भी गाँव में तीन-तीन सौ साल पुराने पेड़ गिर गए।पूरा बाग़ खाली हो गया है।अब वह जगह सूनी लगती है।नये लगाये नही जा रहे।पेड़ काटकर खेत या घर बना लिए जा रहे।हर जगह प्राकृतिक असन्तुलन खड़ा हो रहा है।तालाबो का और बुरा हाल है।वह पटते जा रहे।उथले होते जा रहे।क्योकि मिटटी बाग़ न होने की बजह से नीची जगह बहकर चली जाती है।तालाब नही रहेंगे तो भूजल-चार्ज भी नही होगा।अधिकतर लोगो को नही पता की दुनिया के कुल जल का 3 प्रतिशत ही मीठा जल है।जमीन के नीचे पानी की फैक्ट्री नही है।वह वर्षा-जल के बढ्ने से नदियों,कुओं,तालाबो के रुके पानी से स्रोतों द्वारा सालो में धीरे-धीरे भरता है।वही पानी हम नलों और पंपिग सेटों से खींचते है।साबुन आदि के इश्तेमाल से पानी की खपत बेतहाशा बढ़ा भी है।जब वह री-चार्ज होना बंद हो जायेगा तो पानी खींचते-खींचते एक दिन खत्म हो जाएगा।इससे देश के सभी गाँवों में जल-संकट खड़ा होगा।अभी सचेत होना होगा।दिल्ली के तर्ज पर गाँवों में योजना बनाकर स्थानीय लोगो को आगे आना चाहिए,बड़े बुजुर्गों को अब् सतर्क हो जाना चाहिए।यह बच्चो के भविष्य का मामला है।खूब पेड़ लगाए जाएं।कामर्शियल पेड़ लगाने के बजाय बड़े-वृक्ष वाले देशी पौधे रोपने चाहिए।जिनकी उम्र थोड़ी लम्बी हो।

अब हम-सभी को धरती बचाने का प्रयास करना चाहिए।मिला-जुला प्रयास हमारी हरियाली वापस देगा।हर इंच खाली जमीन पर,हर एक टुकड़े पर,हर एक प्लाट पर,लम्बी आयु वाले छायादार मोटे वृक्षों का रोपण आवश्यक है। केवल आवश्यक नहीं है उसके बचाव,खाद,पानी के लिए लगातार प्रयास की जरूरत है।जब तक वह बड़ा ना हो जाए तब तक एक पिता की तरह उसकी देखभाल की जाए।।धरती हरी-भरी बनी रहे यह हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।’एक पेड़ आपको जिंदगी में कई सौ करोड़ रुपए की कीमत अदा कर जाता है।आपको बिना कुछ जताये।जाते-जाते अपनी लकड़ी,डाले,और जड़े तक सौंप जाता है और हम कितने कृतघ्न है।उसकी फ़िक्र तक नही करना चाहते।सकून,ऑक्सीजन देना और कार्बन डाइऑक्साइड का सोखना इसकी तो हमने कीमत ही नही लगाई। चुप न बैठिए,जुलाई आने वाला है,वृक्ष,जल,और गो-माता को बचाइये तभी आप तभी बचेंगे।एक घण्टे का समय समाज और मातृभूमि को दीजिये यह भी एक कमाई है जिसे आपके वंसज भोगेंगे।

Writer- Pawan Tripathi Jee

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