मैं ऐसा ही हूं- फेसबुकिया नेता

हां मै यही हूं इसलिये कह रहा हूं क्यों कि सादे पन्ने सी नही है मेरी जिंदगी इसके कयी रंग है।मेरे बहुत से मित्र जानना चाहते है कि मैं क्या हूं।तो चलिये कुछ रोचक हिस्से साझा करता हूंं।

मै एक साधारण मध्यम् वर्गीय परिवार मे जन्मा वर्तमान में एक बेरोजगार युवक हूं जो रोजगार के लिये भिन्न भिन्न क्षेत्रों मे प्रयास कर रहां हूं अर्थात एक मंजिल की तलाश मे हूं जिस दिन मिल गया सफलता तो मिलेगी ही यह परम् विश्वास है।कयी स्थानीय मित्रों ने तो बेरोजगार बता कर तंज कसा है ताने मारते है अच्छा लगता है मुझे यदि आप मुझे लक्ष्य विहीन या भटका हुवा या सीधे शब्दों मे मुझे निकम्मा होने की उपाधि देते है तो मुझे प्रसन्नता मिलती है।फकीरी और बादशाहत तो उपर वाला तय करता है हम इंसानो की यह औकात नही है मित्रों यह ध्यान रखना होगा।😊

घुमक्कड़ी खाना बदोश जिंदगी है अपनी भारत के कयी शहर अर्थात् जब भी इच्छा हुयी उस शहर की ओर कदम खुद ब खुद चल दिये क्यों कि इच्छाओं की हत्या करना मेरे बस की बात नही और नाही फितरत है मेरी।

मेरे पास लाख मानसिक चिंता हो मन कितना भी उदास हो पर मेरे चेहरे की मुस्कान किसी को यह जानने का अवसर नही देते कि मनीष की जिंदगी में चल क्या रहा है,यकीं मानिये यही मेरे जीने का अंदाज यही है।आपको जलन होती है तो जलिये मेरी मुस्कान सदैव आपके जले हुवे जख्मों पर मरहम् की तरह ही होगी और यदि आप इसे नमक समझते है तो यह आपकी महानता है।

हां लिखने का शौक है इसलिये फेसबुक पर जिंदा रहता हूं।यहां मै अपनी कॉबिलियत और बुद्धिमत्ता का प्रदर्शन नही करता अपितु जिंदगी के रंग को देश के वर्तमान परिस्थितियों अपने शब्दों से एक आकार देता हूं।कम शब्दों मे आप इसे भावनात्मक शाब्दिक या मौन मनोरंजन कह सकते है फेसबुक इससे बढ़कर कुछ नही है।मेरे संवेदनशील पोस्टों पर आप सराहना या आलोचना के दो शब्द उपहार स्वरूप देते है तो फीलगुड😊😊 वाली फिलिंग दे ही देते भले ही वह क्षणिक हो।

बहुत से मित्रों का कहना है कि मैं नेतागिरी मे रुचि रखता हूं चलिये बता देता हूं सक्रिय राजनिती की महात्वाकांक्षा नही है,किंतु यह आपका बड़प्पन है कि आप मुझे “फेसबुकिया नेता” की उपाधि दे ही देते है जिसे मैं स्वीकार्य करता हूं।

Writer- मनीष Jee

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