पिता के स्वरूप को अपने शब्दों से एक आकार देने का मनीष का छोटा सा प्रयास

वो उम्मीद भी है वो आस भी है
वो मरहम भी है वो एहसास भी है,

वो अंदर से नर्म भी है छिपे कयी मर्म भी है
वो पूजा है प्रार्थना भी है और वो धर्म भी है,

वो खुदा है गॉड भी है वही भगवान भी है
सब रूपों को समाहित करता इंसान भी है,

बेटा जब भी रोया तब उसका खिलौना भी है
बेटा जब भी सोया तब उसका बिछौना भी है,

वो परिवार का जमीर भी है मां की जागीर भी है
वह परिवार की आत्मा भी है और शरीर भी है,

वो मुसीबतो को काटने वाली तलवार भी है
टूटते हौसले के लिये वो चट्टानी दीवार भी है,

मनीष की कलम से

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