तुम लौट आओ बाबा,
तुम्हारी कुर्सी अब भी खाली है,
माँ रख देती है सुबह का ताज़ा अखबार , 
और भूल जाती है कि
चूल्हे पे चढ़ा आई है चाय का पानी,
खौलता रहता है पानी,
बरसती रहती हैं आँखें….

तुम लौट आओ बाबा,
अब दूध वाला भी नहीं पूछता
कि बाबूजी कहाँ हैं और
दादी के मोटे चश्मे के भीतर
अब भी तुम्हारी तस्वीर टंगी रहती है,
पनीली नज़र को याद ही नहीं कुछ और…

तुम लौट आओ बाबा
बगिया के फूलों को अब भी लगता है कि
तुम आओगे, और अपने स्नेहिल स्पर्श से,
नन्ही कलियों को सहलाओगे….

मैं कह नहीं पाता इनसे कि
बाबा अब नहीं आयेंगे
तुम लौट आओ बाबा ,
बस एक बार ,
तुम लौट आओ बाबा…!!

“मेरे स्वर्गीय दादा जी को समर्पित”

 Writer – मनीष
Reference – Facebook

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