एक छोटी सा मेरा भाव समस्त पुरुष प्रजाति को समर्पित___

रशिक भी हूं मैं,पथिक भी हूं मैं
नारी के सम्मान का भार उठाता श्रमिक भी हूं मैं__

जब बात होती है नारी के अस्मिता और रक्षा की तो वही रक्षा करने वाला वटवृक्ष भी हूं मैं__

पिता की छाया हूं पुत्र रूपी साया हूं पति के रूप मे नारी की आत्मा मे समाहित भी हूं मैं__

दाल रोटी की जुगाण मे भरण पोषण परिवार और समाज के प्रति समर्पण का प्रतीक भी हूं मैं__

कंधे पर बेटी को बिठाता सीने से पत्नी को लगाता हुवा प्रेम रूपी नाव को खेवता नाविक भी हूं मै__

मां की गोद जीवन की अभिलाषा बहन को आजीवन मिले ना निराशा जीवन मे मिलते संघर्ष मे अपनी महत्वाकांक्षाओ को करता धुमिल भी हूं मै____

हां गर्व से नही भावपूर्ण से कहता “पुरुष” हूं मैं

मनीष की कलम से

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