व्यक्तिगत प्रयास और सामूहिक प्रयास – सन्दीप सिंह

इसके लिए मैं कछुए और खरगोश वाली कहानी का सहारा लूंगा। जिससे शिक्षा मिलती है कि धीमा और लगातार चलने वाला रेस जीतता है। ये कहानी तो हम सब जानते हैं, अब आगे की कहानी देखते हैं: –
रेस हारने के बाद खरगोश निराश हो जाता है, वो अपनी हार पर चिंतन करता है और उसे समझ आता है कि वो अति आत्मविश्वास का शिकार (over-confident) होने के कारण ये रेस हार गया, उसे अपनी मंजिल तक पहुँच कर ही रुकना चाहिए था। अगले दिन वो फिर से कछुए को दौड़ की चुनौती देता है। कछुआ पहली रेस जीत कर आत्मविश्वाश से भरा होता है और तुरंत मान जाता है। रेस होती है, इस बार खरगोश बिना रुके अंत तक दौड़ता जाता है और कछुए को एक बहुत बड़े अंतर से हराता है। इसका मतलब ये हुआ कि तेज और लगातार चलने वाला धीमे और लगातार चलने वाले से हमेशा जीत जाता है ( Fast and consistent will always beat the slow and steady) । यानि slow and steady होना अच्छा है लेकिन fast and consistent होना और भी अच्छा है। अब आगे चलते हैं — इस बार ‘कछुआ’ कुछ सोच-विचार करता है और उसे ये बात समझ आती है कि जिस तरह से अभी रेस हो रही है वो कभी-भी इसे जीत नहीं सकता। वो एक बार फिर खरगोश को एक नयी रेस के लिए चैलेंज करता है, पर इस बार वो रेस का रूट अपने मुताबिक रखने को कहता है। खरगोश तैयार हो जाता है। रेस शुरू होती है। खरगोश तेजी से तय स्थान की और भागता है, पर उस रास्ते में एक तेज धार नदी बह रही होती है। बेचारे खरगोश को वहीं रुकना पड़ता है। कछुआ धीरे-धीरे चलता हुआ वहां पहुँचता है। आराम से नदी पार करता है और लक्ष्य तक पहुँच कर रेस जीत जाता है। #अब_मतलब_ये_हुआ_कि_पहले_अपनी_ताकत_को_जानो_और_उसके_मुताबिक_काम_करो_जीत_आपकी_ही_होगी (Know your core competencies and work accordingly to succeed) । थोड़ा और आगे चलते हैं— इतनी रेस करने के बाद अब कछुआ और खरगोश अच्छे दोस्त बन गए थे और एक दुसरे की ताकत और कमजोरी समझने लगे थे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि अगर हम एक दुसरे का साथ दें तो कोई भी रेस आसानी से जीत सकते हैं। इसलिए दोनों ने आखिरी रेस एक बार फिर से मिलकर दौड़ने का फैसला किया। यह रेस आपस में नहीं अपितु दोनों केवल संयुक्त प्रयास का परिणाम देखने के लिए प्रयोग के तौर पर कर रहे थे। इसलिए इस बार as a competitor नहीं बल्कि as a team काम करने का निश्चय लिया। दोनों starting line पर खड़े हो गए….get set go…. और तुरंत ही खरगोश ने कछुए को ऊपर उठा लिया और तेजी से दौड़ने लगा। दोनों जल्द ही नदी के किनारे पहुँच गए। अब कछुए की बारी थी, कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ पर बैठाया और दोनों आराम से नदी पार कर गए। अब एक बार फिर खरगोश कछुए को उठा फिनिशिंग लाइन की ओर दौड़ पड़ा और दोनों ने साथ मिलकर रिकॉर्ड टाइम में रेस पूरी कर ली। दोनों बहुत ही खुश और संतुष्ट थे। आज से पहले कोई रेस जीत कर उन्हें इतनी ख़ुशी नहीं मिली थी जितनी आज के परिणाम को देखकर।
#इसका_अभिप्राय_ये_हुआ_कि_सामूहिक_प्रयास_हमेशा_व्यक्तिगत_प्रदर्शन_से_बेहतर_होता_है (Team Work is always better than individual performance) । हमारे जीवन में भी यही है, कई बार हम किसी की गलती या भूल के कारण जीत जाते हैं तो खामखाह खुशी में वहम पाल लेते हैं अपने मन में कि मैंने अपने प्रयास से ही सब किया है। लेकिन जब वास्तविकता से पाला पड़ता है तो धरासाई होने में देर नहीं लगती, लेकिन जब हम अपनी शक्ति को पहचानकर उसके हिसाब से कार्य करते हैं तो हमारी जीत की संभावनाएं प्रबल हो जाती हैं। ये तो थी व्यक्तिगत जीवन की बात! लेकिन जब हम संगठनात्मक कार्य में लगे हों तो हम व्यक्तिगत (Individually) चाहे जितने बड़े परिणाम देने वाले हों लेकिन संगठनात्मक कार्य सामूहिक प्रयास से ही सफल हो सकता है, क्योंकि अकेले दम पर “हर” मैच नहीं जीता जा सकता। अगर लगातार जीतना है तो आपको सामूहिक रूप से अर्थात एक “दल” में, एक “टीम” में काम करना सीखना होगा। जब आप संगठनात्मक काम करते हैं तो अपनी काबिलियत के आलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होता है, और जब जैसी परिस्थिति (situation) हो उसके हिसाब से “दल” की टीम की ताकत (strengths) को प्रोयग करना पड़ता है, तभी आप संगठन को ठीक दशा और दिशा में लेकर जा सकते हैं। जितना बड़ा लक्ष्य होगा आपके प्रयास भी लक्ष्य के अनुरूप उतने ही बड़े चाहिएं। बड़े लक्ष्य के आगे कछुए की ‘धीमी’ मगर लगातार चाल से काम नहीं चलेगा ? उसके लिए तो खरगोश वाली तेज और लगातार चाल ही सार्थक हो सकती है।
वन्दे मातरम्

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व्यक्तिगत प्रयास और सामूहिक प्रयास

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