गरीब by दार्शनिक मनीष

धूप में जलता हुवा
पथरीले रास्तो पर
उम्मीदो के पंख लिये
चलता… मैं एक गरीब हूं

मेला जब आता है लोकतंत्र
का सौदा होता है हमारे उम्मीद
हमारे सपनों का,एक मत के बूते
पर उज्जवल भारत का सपना
देखता …मैं एक गरीब हूं

सरकारी फाईलों मे कैद है हक
हमारा,हमारे हिस्से की रोटी सरकारी
बाबुओं की थाली में देख कर अपनी
भूख मिटाता….मैं एक गरीब हूं

आवासीय योजनाओं की बहार है
बिना छत के सोता मेरा परिवार है
अपने हिस्से की छत मे अमीर को
देख निंद भगाता….मैं एक गरीब हूं

मेरे किताब किसी और के बस्ते में
सरकारी स्कूलों के मुफ्त के निवाले
के दम पर आपने हाथो मे कलम
पकड़ता…..मै एक गरीब हूं

कोई पूछे मेरी जात तो भूखा बता देना
कोई पूछे मेरा धर्म तो रोटी बता देना
राजधर्म के खातिर साहेब् सब
कुछ लुटाता ..मैं एक गरीब हूं,

दार्शनिक मनीष

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