यहीं बगल में किसी का एक मकान है जहाँ छत पर बने एक कमरे को एक परिवार ने किराये पर ले रखा है। पति बचपन में शायद किसी बिमारी की वजह से उचित कद काठी प्राप्त नहीं कर पाया है, शायद 5 फिट भी हाइट न हो, वजन पचास भी ना। वहीं पत्नी की हाइट उससे बड़ी है, वजन में करीब 70 से कम न होगी। हाँ एक पैर से हल्की सी लंगड़ी भी है। दो बच्चे हैं। सरकारी स्कूल में पढते हैं।

पति की इनकम करीब 7 हजार रूपया होगी, जिसमें से करीब 16-1700 रूपये किराये तथा बिजली बिल के जाते हैं। मुश्किल से पाँच हजार बचते होंगे। उसमें बच्चों की पढाई, पेट्रोल वगैरह वगैरह। शायद औसत से कम कद काठी तथा ज्यादा पढे लिखे न होने की वजह से उसे इससे ज्यादा पैसा मिल भी न पाये कहीं और, या हो सकता है नौकरी ही न मिले। पत्नी कभी कभी शादियों में खाना बनाने या बर्तन धोने जाती है।

दोनों अपने भीतर की कमियों को समझते होंगे और सोचते होंगे की मैं ही ऐसा था तो मुझे ऐसा मिला। दोनों को देख लगता नहीं की उन्हें जीवन से किसी प्रकार की शिकायत है। कहीं आसपास मकान बनता है तो वह छत से झाँक कर उस बनते मकान को देखते हैं, शायद सोचते होंगे की क्या हमारा भी ऐसा घर कभी बन पायेगा? उनके लिये तो यह सपना देखना भी बड़ी हिम्मत की बात होगी। 7 हजार में शहर में वह जिंदा हैं क्या यह भी छोटी बात हैं? प्लाट तो सस्ते से सस्ता भी 5 लाख का होता है।

छोटी सी दुनिया है, वह छत पर का एक छोटा सा मकान। पति पत्नी दो बच्चे और वह काम से घर तक आनेवाली सड़क। इससे बाहर उन्हें कभी देखा ही नहीं। यहाँ आसपास बड़े बड़े घर हैं जहाँ से अक्सर लड़ते रहने की आवाजें आती हैं, पर कभी उस छत से ऐसी आवाज नहीं आयी। लगता है की सुख-दुख, किसी के अधूरे या परिपूर्ण होने की हमनें जो परिभाषाएं बना रखी हैं वह सब झुठी हैं।

मैं कभी अपने छत पर जाता हूँ तो मेरे लिये आकर्षण का केंद्र सिर्फ और सिर्फ वह एक कमरा ही है। उसे देख मुझे अजीब सी शांति मिलती है।

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