गरीब by दार्शनिक मनीष

On

धूप में जलता हुवा पथरीले रास्तो पर उम्मीदो के पंख लिये चलता… मैं एक गरीब हूं मेला जब आता है लोकतंत्र का सौदा होता है हमारे उम्मीद हमारे सपनों का,एक मत के बूते पर उज्जवल भारत का सपना देखता …मैं एक गरीब…

मेरा गांव by दार्शनिक मनीष

On

गौर से बैठो और निहार लो इत्मिनान दो बदले प्यार लो बस दो पल तो यहा गुजार लो कुछ यादों को पल मे संवार लो कुल कुनबा कुटुम्ब है पास बुलाये रिश्ते है नाते है सब आस लगाये गुजरे वक्त यूं कुछ…

जिंदगी के सबक

On

#जिंदगी_के_सबक शिर्षक से मुद्दतों बाद #मनीष की एक छोटी सी रचना-: खुशनुमा दौर था जिंदगी का आई कुछ दौर ए मुश्किलें तो फिर सब कुछ हिला सा दिया,, सब्र का एक सागर था अंदर मेरे हौसलों के ज्वार ने टूंटते उम्मीदों को मेरे फिर…

वो मिट्टी का घरौंदा झट से बिखर गया

On

#प्रद्युम्न_की_याद_में_मेरे_द्वारा_मेरे_द्वारा_रचित_छोटा_सा_भाव-: वो मिट्टी का घरौंदा झट से बिखर गया वो मां का दिल था खौफ से शिहर गया सुबह जब स्कूल से आई सहमी सी खबर और पिता से बोला कि प्रद्युम्न भगवान के घर गया, रौंद दिया बचपन को उसके रेत…

हां मै युवा हूं

On

शीर्षक से देश की युवा के मन भाव प्रदर्शित करने का मेरा एक छोटा सा प्रयास-: मत दो मुझे एक दिन का दुलार दो मुझे एक छोटा सा रोजगार कहने को तो है योजना हजार क्या आंकड़े बतायेगी सरकार,, उड़ते हौसलों के…

हां पुरुष ही हूं मैं

On

एक छोटी सा मेरा भाव समस्त पुरुष प्रजाति को समर्पित___ रशिक भी हूं मैं,पथिक भी हूं मैं नारी के सम्मान का भार उठाता श्रमिक भी हूं मैं__ जब बात होती है नारी के अस्मिता और रक्षा की तो वही रक्षा करने वाला…

नोट से ही मान मिले

नोट से ही मान मिले

On

मूड मे आया लिख दिया-: पैसा ही सब मीत जग की यही रीत ना मोह ना माया धन ही सब काया ना अपना ना पराया जितनी भारी है जेब परिवार ने उसी पर ही अपार प्रेम लुटाया बुआ पूछे सैलरी चाची भी…

घर के बड़े बुजुर्ग आदरणीय दादा जी को समर्पित

On

तुम लौट आओ बाबा, तुम्हारी कुर्सी अब भी खाली है, माँ रख देती है सुबह का ताज़ा अखबार ,  और भूल जाती है कि चूल्हे पे चढ़ा आई है चाय का पानी, खौलता रहता है पानी, बरसती रहती हैं आँखें…. तुम लौट…

आग और राख

On

“आग और राख” के संबन्ध पर प्रकाश डालने का मेरा छोटा सा प्रयास अपने शब्दो के माध्यम् से-: मानवीय ही नही अपितु विश्व के सभी जैवीय प्रजाति के लिये आग का महत्व है।कभी यही आग हमे पका भोजन देती है और इसी…

वर्षा ऋतु के आगमन पर एक मेरी छोटी सी रचना

On

देखो काली घटा छाई है खुशी की सौगात लाई है फूल कलीयां भी मुस्कुराई है धरती की अग्न को मिटाई है इंद्रधनुषी रगं की छटा को देखो काली छायी घोर घटा को देखो बादल कर रहे है सिंह गर्जना मोर बनी है…