“जल रहा है आदमी “-ज्ञानेश्वर उपाध्याय जी

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रक्त पिपासु बेरहम दिल हो गया है – आदमी बिन धुंआ और आग का जल रहा हर आदमी मजहब, लालच, स्वार्थ, पर मर रहा हर आदमी जिंदगी मुश्किल बनाता जा रहा हर आदमी धैर्य, शक्ति, आसवान भूल गया आदमी कर्म योग धर्म…

गरीब by दार्शनिक मनीष

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धूप में जलता हुवा पथरीले रास्तो पर उम्मीदो के पंख लिये चलता… मैं एक गरीब हूं मेला जब आता है लोकतंत्र का सौदा होता है हमारे उम्मीद हमारे सपनों का,एक मत के बूते पर उज्जवल भारत का सपना देखता …मैं एक गरीब…

वो मिट्टी का घरौंदा झट से बिखर गया

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#प्रद्युम्न_की_याद_में_मेरे_द्वारा_मेरे_द्वारा_रचित_छोटा_सा_भाव-: वो मिट्टी का घरौंदा झट से बिखर गया वो मां का दिल था खौफ से शिहर गया सुबह जब स्कूल से आई सहमी सी खबर और पिता से बोला कि प्रद्युम्न भगवान के घर गया, रौंद दिया बचपन को उसके रेत…

हां मै युवा हूं

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शीर्षक से देश की युवा के मन भाव प्रदर्शित करने का मेरा एक छोटा सा प्रयास-: मत दो मुझे एक दिन का दुलार दो मुझे एक छोटा सा रोजगार कहने को तो है योजना हजार क्या आंकड़े बतायेगी सरकार,, उड़ते हौसलों के…

हां पुरुष ही हूं मैं

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एक छोटी सा मेरा भाव समस्त पुरुष प्रजाति को समर्पित___ रशिक भी हूं मैं,पथिक भी हूं मैं नारी के सम्मान का भार उठाता श्रमिक भी हूं मैं__ जब बात होती है नारी के अस्मिता और रक्षा की तो वही रक्षा करने वाला…

गौरव दिया भारत के सम्मान को

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महिला क्रिकेट विश्व कप फाईनल तक पहुंची भारतीय महिला टीम को समर्पित मेरी एक रचना-: वर्ल्ड कप नही जीता फिर भी जीता दिल हिंदुस्तान का मान बढ़ाया शान बढ़ाया गौरव बढ़ाया हिंदूस्तान का, नारी शक्ति को करता नमन शीश झुका मै करता…

नोट से ही मान मिले

नोट से ही मान मिले

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मूड मे आया लिख दिया-: पैसा ही सब मीत जग की यही रीत ना मोह ना माया धन ही सब काया ना अपना ना पराया जितनी भारी है जेब परिवार ने उसी पर ही अपार प्रेम लुटाया बुआ पूछे सैलरी चाची भी…

गरीब के दर्द

गरीब के दर्द

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गरीब के दर्द को शब्दों से परिभाषित करने का मेरा एक रचना-: धूप में जलता हुवा पथरीले रास्तो पर उम्मीदो के पंख लिये चलता… मैं एक गरीब हूं मेला जब आता है लोकतंत्र का सौदा होता है हमारे उम्मीद हमारे सपनों का,एक…

शिष्य वही है जो अपने, गुरु का सदैव मान बढ़ाये

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गुरु पुर्णिमा के अवसर विश्व समेत मेरे सभी गुरूजनों के सम्मान मेरे द्वारा रचित एक कविता-: हम गीली मिट्टी है गुरू एक कुम्हार मिट्टी से घड़ा बना जीवन दिया संवार, वास्तविकता से आपने ही परिचय करवाया भला कौन बुरा क्या इसका आभाष…

घर के बड़े बुजुर्ग आदरणीय दादा जी को समर्पित

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तुम लौट आओ बाबा, तुम्हारी कुर्सी अब भी खाली है, माँ रख देती है सुबह का ताज़ा अखबार ,  और भूल जाती है कि चूल्हे पे चढ़ा आई है चाय का पानी, खौलता रहता है पानी, बरसती रहती हैं आँखें…. तुम लौट…