कंपनी ने कागजों में ही हाइवे बना दिया और 455 करोड़ का गबन कर लिया

लखनऊ. दिल्ली सहारनपुर-यमुनोत्री हाइवे को टू लेन से फोर लेन बनाने के नाम पर बैंक और उसके अधिकारियों की मिलीभगत से टेंडर हासिल करने वाली कंपनी ने 455 करोड़ का गबन कर लिया। कंपनी ने कागजों में ही हाइवे बना दिया और अब फरार हो गयी है। इसके बाद से ही यूपी स्टेट हाइवे अथॉरिटी में तब हंगामा मच हुआ है। इस मामले में विभाग की ओर से लखनऊ के विभुतिखंड थाने में एफआईआर दर्ज करा कर खानापूर्ति कर ली गयी है, लेकिन अब अधिकारी सवालों से बचते नजर आ रहे हैं। ऐसे में कई सवाल खड़े हो रहे हैं। वहीं, यूपी स्टेट हाइवे के सीईओ नवनीत सहगल ने बताया कि अब शासन से बातचीत के बाद नए सिरे से टेंडर देने की कार्रवाई की जाएगी।

क्या है मामला
– एसईडब्लूएलएसवाई हाईवे कंस्ट्रक्शन कंपनी ने दिल्ली से सहारनपुर एनएच-57 तक यमुनोत्री हाइवे बनाने का ठेका लिया था, लेकिन पूरे पैसे लेने के बाद भी निर्माण कार्य नहीं करवाया।
– फोर लेन बनाने के नाम पर बैंकों व उनके अधिकारियों से मिलीभगत कर एक कंपनी ने चार अरब 55 करोड़ 46 लाख 77 हजार पांच सौ पांच रुपये का गबन कर लिया।
– इस मामले में प्राधिकरण के परियोजना महाप्रबंधक (दिल्ली सहारनपुर-यमुनोत्री मार्ग) शिवकुमार अवधिया ने मेसर्स एसईडब्ल्यू-एलएसवाई हाइवेज लिमिटेड कंपनी के प्रमोटर डायरेक्टर, डायरेक्टर और 14 विभिन्न बैंकों के अधिकारियों समेत 18 के खिलाफ जालसाजी की रिपोर्ट दर्ज कराई है।

नहीं मिले इन 5 सवालों के जवाब

सवाल न.1# विभाग की मोनिटरिंग कमेटी क्या कर रही थी?
– जानकारों का कहना है कि जब भी कोई टेंडर होता है तो मोनिटरिंग कमेटी बनायी जाती है, जोकि कंपनी के काम-धाम पर नजर रखती है।
– यूपी स्टेट हाइवे अथॉरिटी के सीईओ नवनीत सहगल भी मानते हैं कि मोनिटरिंग कमेटी बनाई गई थी, लेकिन विभागीय अधिकारियों की मिलीभगत से इनकार कर रहे हैं।
– ऐसे में सवाल यह है कि जब कंपनी 13% काम कर बैठ गयी थी तो कमेटी ने क्या एक्शन लिया। इस बारे में कोई भी अधिकारी नहीं बता सका।
सवाल न.2# विभाग के इंजीनियर्स ने मौके का इंस्पेक्शन कर क्या एक्शन लिया?
– यूपी स्टेट हाइवे अथॉरिटी के परियोजना महाप्रबंधक शिवकुमार अवधिया कहते हैं कि यह कंपनी और बैंक के बीच का मामला है।
– विभाग का काम नहीं हुआ इसलिए मामला दर्ज कराया गया है।
– लेकिन जानकार सवाल खड़े करते हैं कि जब काम बंद हो गया और हाइलेवल मीटिंग में भी इसका डिस्कशन हुआ था तो फिर मौके का निरीक्षण कर क्या एक्शन लिया गया। इसका जवाब अधिकारीयों को देना चाहिए।सवाल न.3# 6 महीने बाद क्यों रिपोर्ट लिखाई गयी?
– परियोजना प्रबंधक शिवकुमार अवधिया कहते हैं कि कंपनी को टू लेन से 4 लेन बनाने के लिए 30 मार्च 2012 से 900 दिन का वक्त दिया गया था। जिसका 1 अप्रैल 2012 से काम भी शुरू हुआ।
– लेकिन नवंबर 2013 में कंपनी ने काम रोक दिया। तब कंपनी ने बताया कि पर्यावरण विभाग की एनओसी नहीं मिल रही है।
– तब कंपनी को 721 दिन का समय दिया गया, जोकि जून 2016 में पूरा हुआ और इस मामले की एफआईआर फरवरी में कराई गयी है।
– जानकार कहते हैं कि समय पूरा होने के बावजूद जब काम पूरा नहीं हुआ था तब अधिकारियों ने क्या किया।
– इस सवाल का जवाब भी अधिकारीयों के पास नहीं है।

सवाल न.4# क्या विभाग से बैंक का पत्राचार नहीं हुआ?
– जानकार सवाल खड़े कर रहे हैं कि क्या बैंक से विभाग का पत्राचार नहीं हुआ।
– अधिकारीयों का कहना है कि सरकार के पैसों का नुकसान नहीं हुआ।
– बहरहाल, अधिकारी इसका जवाब नहीं दे पाए कि बैंक से उनका पत्राचार हुआ था या नहीं।
सवाल न.5# सवालों का जवाब देने से क्यों भाग रहे हैं अधिकारी?
– जब इस मामले में अधिकारीयों से सवाल जवाब किया जाने लगा तो अधिकारी जवाब देने से कतराते रहे।
– परियोजना महाप्रबंधक का कहना है कि उन्होंने अप्रैल 2015 में ज्वाइन किया है इसलिए पूरी जानकारी नहीं है।
– जबकि जीएम एडमिन वीएस चौधरी का कहना है कि मामला टेक्नीकल से जुड़ा है। इस वजह से मामला नहीं पता है।
– अधिकारीयों का कहना है कि उस समय कौन सा स्टाफ था यह भी नहीं पता।
– ऐसे में सवाल खड़े होते हैं कि जब विभाग का इससे लेना देना नहीं है।
Reference link- Bhaskar.com

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