प्लांटेड खबरों का युग समाप्त हुआ

आपको याद है,आडवाणी जी और जिन्ना वाला प्रकरण?आडवाणी जी पाकिस्तान गए थे।वहाँ वह जिन्ना के मकबरे पर चले गए थे।भारत की मीडिया ने खबर चला दी की उन्होने कहा है “जिन्ना ने बड़ा अच्छा काम किया था।वह देश भक्त था,।भारतीय मीडिया ने इसे इस ढंग से पेश किया जसे कयामत आ गई हो।संघ और संबन्धित संगठनो मे कोहराम मच गया।इसे आडवाणी जी द्वारा वैचारिक अधिस्ठान पर प्रहार माना गया।बिना तसदीक किए लोग आडवाणी जी पर टूट पड़े।पूरे संगठन ने उनसे इस्तीफ़ा मांग लिया।उन्होने बेमन से दिया।मीडिया ने एक झूठी और मेनुपूलेटेड खबर के बल पर पचास साल की उनकी तपस्या को तबाह कर दिया था।उसके बाद हार्डकोर कार्यकर्ताओ ने उनको कभी स्वीकार नही किया।वह 18 वर्ष की उम्र से संघ के कार्यकर्ता थे।बीजेपी जो कुछ भी है उसमे उनका बहुत बड़ा योगदान था।आडवाणी जी ने बहुत परिश्रम से धूर्त टाइप की कांग्रेसी राजनीति के केंद्र मे हिंदुत्व को ले जाकर स्थापित किया था।यह आंखो मे हरदम गड़ता रहता था।उनका यह हश्र करके लुटियन लाबी ने बड़ी पार्टी दी थी और लगा था की मीडिया-मैनेजमेंट और प्लानिंग द्वारा कुछ भी संभव है।सटीक प्लानिन्ग से संघ जैसे संगठन को उँगलियो पर नचाया जा सकता है।प्लांटेड,मेनिपुलेटेड,आर्टिपुलेटेड,खबरों को फ्लोर पर लाकर कुछ भी स्टब्लिश किया जाने लगा।विदेशी कंपनियो तो छोड़िए दुशमन देश भी लाबिंग के सहारे नेताओ को किल करने मे लग गए।अफरा-तफरी भरे इस युग के नीतिकर्ता कुछ औद्योगिक घराने थे।लुटियन जोन युग के नाम से इसे जाना जाएगा।आडवाणी जी को खत्म करके उन्हे लगा कि राष्ट्रवादी और हिंदूतत्व की विचारधारा उन्होने मिटा दी।संघ को तो वह पहले ही एक खास इमेज मे कैद करके समाप्त समझते थे।

सेम इसी तरह मोदी को देश की मीडिया लगातार विलेन बनाकर प्रस्तुत करती रही।उस व्यक्ति को पंद्रह साल तक लगातार जिस तरह से छवि-दोहन यंत्र के द्वारा प्रताणनाये दी गयी मुझे आश्चर्य है कि वह बच कैसे गए।बहुत सारे संघ भाजपा नेता मीडिया ने इन पचास सालो मे तबाह किए।आचार्य रघुबीर,बलराज मधोक,नाना जी,कल्याण सिंह,उमा भारती,गोबिंदाचार्य जैसे न जाने कितने योग्य, काबिल,अनुभवी,राष्ट्रवादी नेताओ के कैरियर मीडिया ने पीक पीरियड पर बर्बाद कर दिये थे।वह भी बिला-वजह।वे अपने प्री-डिसाइडेड पैरामीटर पर नेताओ को ढालते है।हर किसी को उसी शेप मे ढालने की कोशिश करते है।उन पैरामीटरों मे अगर वह फिट नही बैठ रहा तो उसे आउट करने मे लग जाते हैं।अटल जी मजबूरन उस शेप मे सेट होने की कोशिश करने लगे।परिणाम यह रहा कि नकली-बनावटी फीचर मे वह घुटने लगे और असमय बीमार रहने लगे।

मोदी का प्रधान-मंत्री बनना,योगी का मुख्यमंत्री बनना उस युग का पटाक्षेप है।नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव मंगलुरु बैठक में ही हो चुका था। बाद में गोवा बैठक में यह डिक्लेअर हुआ।इन दोनों बैंठकों में 3 महीने का अंतर है, मीडिया को कानों-कान खबर नहीं लगी।खबर तब् आई जब गोवा में संगठन ने यह डीक्लियर किया कि हम मोदी को प्रधानमंत्री प्रत्याशी बनाने जा रहे हैं।ऐसे ही सर्जिकल स्ट्राइक चुपचाप हुई उसके 10 दिनों बाद मीडिया को प्रेस द्वारा बताया गया।नोटबंदी की तैयारिया जनवरी से ही शुरू हो गई थी, 8 नवंबर को प्रधानमंत्री ने जब भी घोषित किया तब जाकर पता चला। ठीक उसी तर्ज पर 7 फरवरी 2017 को ही योगी आदित्यनाथ जी मुख्यमंत्री होने पर सहमति बन चुकी थी।लेकिन मीडियाई आखरी क्षणों तक नहीं जान पाए।यह संगठन की कसावट और अनुशासनिक पकड़ जता रही है।यह भारतवर्ष के लिए श्रेष्ठ लक्षण है जो घुसपैठियों से संगठन राष्ट्र और विचार को बचाएंगे।इस तरह सर्जिकल स्ट्राइक,नोंटबंदी, नरेंद्र मोदी का प्रधान-मंत्री प्रत्याशी डिक्लेअर होना और योगी का मुख्यमंत्री होना ऐसी खबरें हैं जिन्होंने खबर प्लांटेशन के इतिहास की मिट्टी पलीद कर दी।नरेंद्र मोदी और संगठन पर अनुशासनिक पकड़ की विशेषता ने मीडिया को उनकी औकात में लाकर खड़ा कर दिया।प्रसासनिक जगत में मीडिया की घुसपैठ को धत्ता बताते हुए साफ़-साफ़ यह जाहिर हो गया कि अब खबरे बनाई नही जाती बल्कि घटनाएं होती है।बाद में खबर दी जाती है।अब खबरों की ऐंगल चलाने से कोई फरक नही पड़ता।न्यूज ऐंगल के जानकार तुरंत भाँप लेते हैं इस खबर के माई-बाप कौन है।जिस ढंग से आखिरी पल तक मीडिया को इतने बड़े संगठन और इतने सारे लोगो ने दो महीने पहले तय नाम की भनक भी नही लगने दी उससे लगता है की अब देश के नेताओ को बदमाशी पकड़ मे आने लगी है।क्रमश राजनीति मैनेजमेंट न रहकर जन-आधारित प्रक्रिया मे बदल जाएगा।शायड भविष्य मे और भी जनता मे से नेता उभर कर आगे आयें।

शायद उन्हे नही मालूम की दुनिया भर मे नेतृत्व की मान्य अवधारणा है कि जिस व्यक्तित्व की छाया-तले व्यवस्था रहती है,जो प्रभावित हुये बगैर दूरदर्शी निर्णय लेता है,खुद के बनाए पैरामीटर मे दुनिया सेट करता है,परिभाषाए बनाता है,और अतीत के अनुभवो से रुपहला भविष्य गढ़ता है,वही नेता है,।दुनिया भर के अखबारो,चैनलो की नजर मे नेता खुद ही खबरों का कारखाना है।जेनरेटर न की खबरो से प्रकाशित रहने वाला।आप व्यवस्था मे है न कि व्यवस्था आप से।योग्य व् सफल नेतृत्व और शासक के निर्णयों की खबरें आती है न की खबरों से निर्णय होते है।

अमूमन नेता चार तरह के होते है।1-वंशानुगत नेता,2-जन्मजात गुणवान नेता,3-प्रबन्धक नेता,4-इम्पोज्ड नेता।इन वर्षो मे इम्पोज्ड नेतरितत्व की बाढ़ आ गई।मैंने सूची बनाई है 1950-2014 तक ऐसे सैकड़ो नेता समाज पर थोपे गए।उसका परिणाम जनता और भारत वर्ष ने ही भुगता।भ्रष्टाचार का बढ़ना,देशहित को इगनोर हो जाना,नकली धर्म-निरपेक्षता,बहुसंख्यकों का उत्पीड़न जैसे कुप्रभाव इसी मे से निकले।हमको इस पर खूब शोध करवाने चाहिए।सन 2000 ई के बाद एक समय तो ऐसा आ गया जब प्लांट न्यूज द्वारा ही राजनीतिक निर्णय करवाए जाने लगे।मुझे याद है।लखनऊ मे कल्याण सिंह प्रकरण किस तरह खबरों द्वारा धीरे-धीरे परवान चढ़ा था।मीडिया के द्वारा नेता का कद डिसाइड होने लगा।मैं यहा केवल संघ और भाजपा की बात नही कर रहा बल्कि सारी पार्टिया और संगठन मीडियाटिक-फ्लो मे बहने लगे।संगठनो के निर्णय भी उनकी बैठको से न होकर मीडिया की खबरों मे से जेनरेट होने लगे।अपने हितकारी पूर्व-निर्धारित निर्णयो की तरफ अखबार के मालिक उन्हे बहा ले जाते थे।भावावेश मे संगठन के लोग यह जान भी नही पाते थे कि यह तो मीडिया मठाधीशों द्वारा प्रभावित करके करवाया गया है।अधिकतर राजनीतिक पार्टियों मे नेता संगठन,जनता.समाज द्वारा न निर्धारित होकर खबरों और मीडियाटिक-नेरेशन से बनने लगे।

गो-ह्त्या,राममंदिर,कामन सिविल कोड,धारा 370,बंगलादेशी घुसपैठिए जैसे बड़े मुद्दे वह जिस ढंग से टरकाते हैं,बंगाल या कश्मीर मे हिन्दुओ के उत्पीड़न वह मेन मीडिया और वास्तविक खबरों से जिस ढंग से गायब कर देते है।उससे समझा जा सकता है वह एक सोची-समझी मंशा के साथ चलते है।वे सिंडीकेट के तौर पर मिल-जुल कर पूरी स्ट्रेटजी से चलते हैं।उपार्जित और आर्टिफ़ीसियल खबरों कि जिस ढंग से न्यूज ट्रेडर्स की भांति शोरगुल के साथ बजाया जाता है वह साफ-साफ जताता है कि गणतज्ञ भारतीय ओपीनियण मेकिंग का कार्पोरेट काइयाँ-पन आसानी से नही जाएगा।इन्हीं कारणों से जब सरकार ने NDTV पर एक दिन का बैन लगाया था तो उसका चतुर्दिक स्वागत हुआ था।लेकिन चैनलों ने एक सुर उसका विर्रोध करके लागू नही करने दिया।

हर बार उन्होंने बताया कि यह सर्वे रिपोर्ट है फलाने जीत रहा है,गलत साबित हुआ।उन्होने बताया नोट-बंदी फेल गलत साबित हुआ।उन्होने सर्जिकल अटैक पर मन-गढ़ंत खबरे प्रकाशित की बाद मे सेना ने धज्जिया उड़ा दी।ऐसी हजारों चीजें हैं जिन पर वह रोज झूठे साबित होते हैं।लेकिन पिछले 5 दिनों जी तो हद हो गई है।यह सीएम बन रहा है,यह CM बन रहा है मेरी खबर पक्की खबर,जाने किस-किस को मुख्यमंन्त्री की शपथ ग्रहण करवा कर जनता में भ्रम फैलाते रहे।क्या नाटक लगा रखा है?जनता को दर्शकों को एकदम मूर्ख बना कर रख दिया है।

यह इमानदारी या चरित्र की बात नहीं है।यह एक प्रोफेशनल इथिक्स है।अगर वकील से गलती होती है तो वह बार होने की सजा पाता है। अगर IAS से होती है तो सस्पेंड होता है।इंजीनियर से होती है तो सजा आप जानते ही हैं, डॉक्टर से होती है तो करियर समाप्त भी होता है,आपके मजदूर से भी अगर कोई गलती हो जाए तो उससे भी थोड़ी ना थोड़ी सजा मिलती है यहां तक की मी-लार्ड से भी गलती हो जाए तो महाभियोग चलाकर हटाया जाता है।परन्तु मीडिया इतनी ऊपर हो चुकी है कि उसे कोई किसी तरह की कंप्लेंट एजेंसी ही नहीं है।उसपर नियंत्रण नियामक एजेंसी नही है तो भी प्रोफेशनल इथिक्स के नियम तो स्वतः लागू हैं।

यह प्रोफेशनल इथिक्स है कि अपने गैर-जिम्मेदारना व्यवहार और तमाम झूठो पर वे खुद आकर माफी मांगा करे जिससे उनकी साख बची रहे और भारतीय मीडिया पर जनता का विश्वास खबरदाता के तौर पर बचा रहे।झूठ पकड़े जाने पर पश्चिमी जगत और अमेरिकन-यूरोपियन मीडिया मे माफी मांगने की पर्ंपरा है।दुनिया भर में इस तरह की बातों पर सम्पादक द्वारा खुद सामने आ कर खेद जताता है।पत्रकार भी व्यक्तिगत तौर पर सामने आकार माफी मांगता है।वहाँ कई प्रकार के नियंत्रण नियामक आयोग है।अदालतों मे केस करके मोटे भुगतान होते है। पर भारतीय मीडिया अपने को सबसे ऊपर मानती है।प्रिंट मीडिया में तो कभी-कभी ‘ खेद है ‘ छपा दिख जाता है लेकिन इलेक्ट्रनिक मीडिया में से किसी को भी गलती मानते या शर्मिंदा होते नहीं सुना।हमारे यहाँ नख-दंत हीन प्रेस-काउंसिल के सजावटी तौर पर इश्तेमाल होती है।छोटी-बडी अदालते भी इस मामले मे बेचारगी से ग्रस्त दिखती है।बहुत खोजने पर भी मुझे एक भी उदाहरण बहुत मोटे हरजाने या सजा का नही दिखा।जबकि लंदन,पेरिस,आस्ट्रिया और अमेरिकन अदालतों मे तीस मिलियन डालर तक के हरजाने के कई मामले नेट पर उपलब्ध।झूठी,मानहानि करने वाले और बनावटी खबरों पर साउथ अफ्रीका और अरेबिक अदालतों मे जेल और मोटे जुर्माने के मामले भी दिख रहे हैं।हमारे यहा इस मामले मे लोकतन्त्र के अन्य खंभो की तरह चौथे खंभे का विकास नही हो रहा है।कुला मिलाकर गैर-जिम्मेदारी और गैर-जबाबदेही से छुटकारा मिलता नही दीख रहा।उनका झूठ उन्हें खुद ही खत्म करेगा।कुल मिलाकर आप अब खबरों से मैच के आख़िरी बाल तक का मजा उठाइये।

Writer – Pawan Tripathi jee

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