राष्ट्र,भूमि खो रही है।

हिन्दुस्तान मे ही किसी मुस्लिम मोहल्ले के “हिंदू” से पूछिए!
……….जो 47 में हुआ था।राष्ट्र,राज्य की अवधारणा…..को पुष्टि देता हुआ….
हमारे ही व्यक्तित्व को छोटा करता है “जब,हम न समझने का नाटक या “विभ्रम,में होते है कुछ घटने लगता है….!
केवल बोलने के लिए बोलना है…और….!फर्जी बुद्धिजीविता के भ्रम के शिकार कम्युनिष्ट?सेकूलरिया जमात!
जब केवल झूठ आधारित सिद्धांत जीना है तो केवल किसीको प्रभावित करने के लिए तो जियो!…इसीलिए समाप्त हुए…!
…..पता करो एमसीपीआई ने माना है हम आज तक ‘मुस्लिम कट्टरता को इग्नोर करते रहे इसीलिए हमारा यह हाल हुआ है,,,!
….केवल इगो तुष्ट/शांत करने के लिए तर्क हेतु बहस मत करो!
ज़मीनी समस्याएँ देखो/खोजो वरना मारशीया पढ़ने वाले भी न बचेंगे!!!!
अथवा
कश्मीर!!!!””!!
या बंगलादेश!!!”
पाकिस्तान के अंदर बचा खुचा छ: हजार साल से संघर्षरत एक प्रतिशत “राष्ट्र,भूमि खो गयी!!”
या नौकरियों की तलाश में बाहर “गया,जड़े तलाशता एक बड़ा समुदाय”!!!
जरा ध्यान से यह भी देखिये…
मुस्लिम बहुल ईलाके में हिन्दू के घर का होना क्या होता है!
शायद हमारी कल्पना से परे है वह डर, वह धड़कनें, वो अचानक सांसों का बढ जाना….. बेटे को घर से बाहर भेजते हुए,स्पेशिली जवान बेटियों का घर से निकलना,…गुन्डो,शोहदो और जाहीलो का टोपी पहने घर के बाहर डेरे डालना!उसकी सकुशल वापिसी की दुआ होंठों में बुदबुदाना फिर भी उसके घर वापिस लौटने तक सांसों का अटका रहना…..ऊपर से फर्जी सेकुलर नेताओ व अख़बरवालो का रोज-रोज घटिया खबर छाप-कर जीना मुहाल करना दंगें,लव जिहाद के आरोप, गाय के कटने की अफवाहें,गोधरा,कश्मीर के पन्डतो जैसी घटनाएं, आतंकवादी घटनाएं, पाकिस्तान की भारत विरोधी राजनैतिक घटनाएं, भारत पाक मैच, केवल उनके लिए टी वी पर आने वाले डिबेट या समाचार नहीं होतें। ये खबरे ही काफी होती हैं उनके पूरे वजूद को हिलाने के लिए। वे दोस्त जिनके साथ उनका रोज का उठना बैठना होता था, अब उन दोस्तों की हर एक हरकत घात लगाती हुई प्रतीत होती। अविश्वाश उन्हें तोड़ने लगता है। दरवाजे पर वक्त बेवक्त हुई हर सरसराहट चैकन्ना कर देती हैं उन्हें। वह आंखे वह कल्पनाएं जो भविष्य के सपने बुनना चाहते हैं बचाव के मंसुबे बुनने लगते हैं। सोचा था बड़े भैया का परिवार और खुद का परिवार बड़ा हो गया, बच्चे बड़े हो गएं एक कमरा आगे की खुली जगह में डाल दूं।पर पड़ासियों की निगाहों में आने का खतरा उन्हें दो छोटे कमरों में ही सिमटने को मजबूर कर रहा है……..अपना नाम उसे डराता है।………………………………………..अभी अच्छे पोस्ट पर हैं, एक मकान बनवाना चाहा,मुनीश जी बचपन से ही इस जगह रहने की वजह से लगाव रखते थे,बहुत सी छोटी-छोटी यादें जुड़ी थे किंतु ढेरो यातनाएँ भी..तमाम गुंडागर्दी भी..कई बार वोट तक नही डालने दिया…..इसलिये यहाँ न रहने की सोच चुके हैं वजह, आस पास मुस्लिम आबादी का होना,….. अपने डर से बचने की एक नाकाम कोशिश। जेहादी आदत के कारण से एकत्र हुए लोगों के उस कस्बे को दूर-दूर तक के लोगो ने नाम दिया है… “मिनी पाकिस्तान,,,बीच की सड़क को बाघा बार्डर।
इतनी उम्र किसी तरह 17 दंगो के साथ काट लिया,…. जिस तरह संभव हुआ खुद से कहीं कुछ गलत देखा,,,…..गलत का विरोध नहीं कर सकते…..अपने ज़मीर को मार डाला,….सर कलम होने का ख़तरा….और ढोंगी सेकूलरियाओ के चलते कही खबर और एफआईआर तक न होती…आए दिन किसी न किसी “काफ़िर, की……!
बड़ी मुश्किल से दिन कटे..! क्या करें अपने और अपने परिवार की जान प्यारी है। झूठे आरोपों की सफाई न दे पाने की घुटन, घुटन, घुटन बस घुटन। कुछ कह नहीं पाने का घुटन, कुछ कर नहीं पाने का घुटन, बेखौफ़ जी नहीं पाने का घुटन!मुस्लिम के नाम पर एक बार बाँट चुके अपने देश के अंदर ही एक मुहल्ले मे बहुसंख्यकों के बीच अल्पसंख्यक होने का घुटन!
वो जानते हैं उनके मुस्लिम दोस्त, पडोसी ऐसे नहीं हैं…….पीढ़ी दर पीढ़ी का उठना बैठना है। बचपन की रोटी-काटे की दोस्ती है…लेकिन तभी तक जब वह “एकल, होता है जैसे ही वह बहुवचन मे बदला और सप्ताह का खास दिन आया और या अपनी “किताब, पढ़ी वह जाने क्या हो जाता है…इन सालों मे यह बात दिमाग़ मे अच्छी तरह बैठ गयी है….बूढ़े पिताजी कहते भी हैं “‘काश देश बंटने वाले साल चुप न बैठते और कड़ाई से इनके हिस्से मे इन्हे भेजवाने पर जनता को साथ लेकर खड़े हो जाते….मति मारी गयी थी….अपने सगे बड़े भाई से बँटवारे के समय इंच-इंच हिस्सा लिया और जूट की टट्टी तक फाड़ कर बाँट लिया….और देश को बाँट कर भी.’…..केवल हिन्दू,आबादी नियंत्रित करने की कोशिश हो रही थी।
उसके कुछ ही दिन पूर्व 23 प्रतिशत मुस्लिमो ने 30 प्रतिशत जमीन लेकर अलग देश बनवा लिया था और 8-9 प्रतिशत मुस्लिम पाकिस्तान गये थे।
……अब पछताते हैं “नेताओ के भरोसे देश को नही छोड़ना चाहिए था,,,,,…
देश बाँटने के बाद भी…हम परदेशी बनें रहे..!…
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और…कश्मीर..1990 एक सीन!!!!””!!
….शाम होते ही लाउडस्पीकर की आवाज तेज हो जाती थी ‘काफिरो घाटी छोडो’ ‘कश्मीर हमारा है’… भीड़ की भीड़ घुसती थी हिन्दू मुहल्लों में… …तब बस हत्या करके नही छोड़ा जाता था ..बल्कि स्त्रियों के स्तनों को काट कर उसपे अपना धर्मिक चिन्ह बनाया जाता था।
एक तरह से राष्ट्र की हत्या होती थी….क्योंकि सरकारें तो थी ही…. बच्चों को दिवारों पर पटक कर मार के उनके शवो को गली के बिजली के तारो पर टांगा जाता था, ताकि खौफ पैदा हो और बस्ती हिन्दुओ से खाली हो जाए।
रात के अँधेरे में हिन्दू-सिक्ख बस्ती में से पुरुषो को एक तरफ खड़ा कर के एक-47 की मैगजीन खाली कर दी जाती थी।
घरो के बाहर पोस्टर लगते थे हमे काफिरो के घर चाहिए उनकी औरतों और बच्चियों के साथ।
15 लाख कश्मीरी हिन्दुओं ने घाटी छोड़ी थी जो किसी यूरोप के देश की आबादी के बराबर थी।
वहां “जन था, भूमि थी जिसकी संस्कृति और जीवन शैली हमारे “राष्ट्र, में रहने को तैयार नही।
ऐसा ही होता है।हिंदू घटा देश बॅंटा!

Writer By- Pawan Tripathi jee

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