मामला केवल मांस का नही है।

योगी सरकार द्वारा अवैध बूचड-खानों पर कानूनी कार्रवाई के बाद आप जो फन-फनाहट,तिलमिलाहट देख रहे है वह केवल एक प्रतीक है।यह पूरे पन्द्रह सौ साल बाद एक जरूरी कदम उठाया गया है।इस बीच हम कितना नुकसान उठा चुके हैं आप कल्पना भी नही कर सकते।हम युगों से गो-गंगा संस्कृति खिलाफ हर दशक में युद्द झेलते रहे है।अगर इसको आप सामान्य युद्ध समझ रहे थे तो आप खुद ही सामान्य नहीं है।समझदानी पर पत्थर पड़ा है।यह गाय का खाना,गाय-बैलो का काटा जाना,सूअर का थाली से गायब हो जाना केवल साधारण फेनामना नही था।यह केवल भोजन संघर्ष मात्र नहीं था।यह सूअर का अचानक गंदे जीव में तब्दील हो जाना, बना दिया जाना यह कोई भोजन संघर्ष नहीं था।यह फूडिंग से सम्बंधित कोई बवाल नहीं था।एक बिल्कुल सोची-समझी सोची-समझी नियत काम कर रही थी।यह १५ सौ साल का आर्थिक युद्ध है मजहबी-संसाधनों का संघर्ष।आप जरा एक उदाहरण देखिए ‘अरबयो के बड़े आक्रमणों में गाय को अपनी सेना के आगे करके चलते थे। बड़ी संख्या में गायों को आगे लेकर चलते थे।
उन्होंने खुद अपनी इतिहासिक किताबो में यह वर्णन किया है।ऐसे 130 युद्ध हैं,1000 साल में जिसमें गायों को आगे लेकर चले थे(आज भी होता है)।हिंदू-सैनिक गायों पर वार नहीं करता था,हिंदू गायों पर प्रहार नहीं करता था, शस्त्र नहीं उठाता था।वह हार कर मरना पसन्द करता किंतु अपनी इकोनामी नही नष्ट करता। यह जिम्मेदारियों, कर्तव्य प्रतिबद्धताओं और आंतरिक शक्ति का परिचायक था,यह महान चरित्र का उदाहरण है।एक राजा को ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए।उसके प्रजा की अर्थव्यवस्था नष्ट ना होने पाये। लेकिन कम्युनिस्ट इतिहासकारों का कमीनापन देखिए कि पल-पल इसे उन्होंने नजरअंदाज किया है, इसे उन्होंने खराब उदाहरणों के साथ देखा है,पेश किया है,नकारात्मक चित्रण किया है।डेढ़ सौ से अधिक युद्ध जिनमें गायों के नाते निर्णायक युद्द बन गया और यह निर्णायकता इतिहास पर भारी पड़ी।आक्रांता अच्छी तरह जानते थे कि गाय हिंदुओं में सबसे महत्वपूर्ण चीज है,सूअर भी सबसे महत्वपूर्ण इकाई के रूप में काम करता है। करीब उस समय देश की 25% आबादी गाय पर और 18 से 35 परसेंट आबादी सूअर के पालन पर निर्भर थी।
आर्थिक रूप से यह समाज के सबसे सशक्त लोग थे।यह एक बड़ा आंकड़ा है मैं आपको और तथ्य देता हूं।

कुछ घटनाये परवर्ती गुप्त शासन काल की है या कहिये की गुप्त वंश के अवसान के साथ ही आक्रांता सक्रिय हो उठा।आप इतिहास की पुस्तकों से खुद तथ्यों का मिलान कर सकते हैं।लगभग सभी इतिहासकारों ने इस तरह के व्यापारों के बारे में लिखा है।अरबी व्यापारी आते थे और यहां की समृद्धि देखते थे। उन्होंने बहुत जल्दी भाप लिया के हिंदुस्तान को जीतना कठिन ही नही नामुमकिन है।इस देश में ओपीनियन मेकर के बजाय यहां का जन सामान्य समृध्द है।ऐसे समाज को कोई भी प्रभावित नही कर सकता।संघर्ष से तो इसे मिटाया ही नही जा सकता।यह अध्ययन उन्होंने पैगंबर के जन्म लेने से भी पहले समझ लिया था।अरब् जगत से व्यापार तो उसके बहुत पहले से चल रहा था न।फिर अरब एक सूखा मरुस्थल था, जहां खाने के लिए कुछ जानवर मात्र उपलब्ध थे,कुछ व्यापार आदि के द्वारा इधर से हिन्दीस्तान से कुछ भोजन-भजन की व्यवस्था हो जाती थी। अधिकतर कबीले कोई बड़ा उत्पादन नहीं करते थे। स्पेशली फूडिंग-भोजन का कल्चर मांस पर निर्भर था।इधर हिंदुस्तान की भोजन श्रृंखला का कृषक-विविधताओं से,गोदुग्ध से विभिन्न साग-सब्जियों से हजारों तरह के अन्न से परिपूर्ण था।खूब भरा हुआ था।अरब के लिए यह आश्चर्यजनक था। वह व्यापार भी किस चीज से करता। बहुत सारे पत्थर, रत्न और बहुत सारी यूरोपियन चीजें लेकर आता था।इनको आप तथ्यो से रिसर्च कर सकते हैं।सब मिल जाएगा। खुद भी पढ़ सकते हैं। गुप्त राजवंश में भारत वर्ष की समृद्धि गायों पर निर्भर थी।इसलिए तो गौ माता कहलाती थी। छठी-सातवीं-आठवीं-शताब्दी में उन्होंने इसे समझा।अगर हम काऊ-इकोनामी ही खत्म कर दें तो इस ‘जाति, को नष्ट किया जा सकता है।इससे इन्हें गरीबी में,आर्थिक संघर्षों में जकड़ा जा सकता है,इनको समाप्त किया जा सकता है।यह पूरे 500 सालों के गहन अध्ययन के बाद उन्होंने कमजोरी ढूंढ निकाली। फिर उन्होंने गायों पर अटैक किया।युद्ध के बाद एक तथ्य और देखें,मैक्सिमम हिंदूओ की हत्याएं तो वह करता ही था,साथ-साथ हजारो गायों को भी मारता था।खेती बरबाद करता था।उन 150 युद्धों का रिकार्ड विशेष तौर से चेक करें।शुरुआती दौर में ही उन्होंने अफगान,सिंध,पंजाब,गुजरात,राजस्थान, हिमालय की तराई भाग,दिल्ली के आसपास के पशुधन को तबाह कर दिया।यह सब स्थानिक मंदिरों के रिकॉर्ड में उपलब्ध हैं।जिस पर किसी सरकार ने काम नही होने दिया।बाद में यह गायों का काटा जाना, धार्मिक उपलब्धि से जोड़ दिया गया।यहां मैं विशेष रूप से उल्लेख करना चाहूंगा कि कैसे एक हजार में चालबाजियों से, विभिन्न तरह के शासनादेशों से, विभिन्न तरह के प्रपंचों से, विभिन्न प्रोपोगेंडा से उन्होंने भारत की भोजन श्रृंखला को बदलने का प्रयास किया। यह भोजन श्रृंखला केवल नष्ट करना केवल धर्म-युद्ध ही नहीं थी।यह भारतीय समाज में हस्तक्षेप थी। वह हस्तक्षेप बहुत तरीके से भारतीय राष्ट्रीय समाज को विभिन्न जातियों में बांट रही थी।एवं आधारभूत जातियों को कमजोर कर रहा था। इसको भारतीय समाज के रचनाकार बहुत सालों तक नहीं समझ पाए और जब समझे तब तक देर हो चुकी थी।कभी समय मिले तो पाक-कुरान शरीफ के शूरा-अल-बकर के आयत 65 से लेकर ७२ तक ध्यान से पढ़े,(कमेंट बॉक्स में दिया है)दंग रह जायेंगे,अपने भोलेपन पर।यह वे लाइने हैं जो गो-अर्थ व्यवस्था पर सीधा आक्रमण थी।

असल में गोवंश पर आक्रमण आर्थिक आक्रमण था। यह साजिशी तरीके से हमारे समाज में विभाजन की नींव गहरा करके दलित वर्ग तैयार करता है। इसकी निहित मंशा ही यह थी भारतीय गाय-दुग्ध गोवंश आधारित अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो जाए। इसके लिए वह सातवीं सती से ही गाय खाओ,गोवंश खाओ,पशुधन मिटाओ और सूअर को भारतीय समाज की मेन स्ट्रीम से गायब करके पूरी तरह मिटा दो,रणनीति पर चल रहे हैं।अरेबिक आक्रमण का एक सुनियोजित तरीका था जो भारतीय समाज को पूरी तरह कमजोर करता है।समाज का एक वर्ग लगातार दलित और गरीब होता चला जाता है।हमें पता ही नहीं चलता की कारण क्या है। बेसिकली हम कभी कारण तलाशने बैठे ही नहीं।कभी आप इसके शोध में जाएं तो आपको साफ-साफ दिखेगा की सातवीं सदी में ही वह समझ चुके थे कि हर आठ-दस साल में ही हिंदू लुटने-पिटने के बाद भी दोबारा कैसे खड़ा हो जाता है? आर्थिक रूप से सक्षम हो जाता है?सुख,समृद्धि,शान्ति कहां से आती है?इतना जिनोसाइट-अत्याचार-प्रताणित होने के बावजूद कैसे बच जाता है?उनके लिए अन्य समाजो की तरह सनातनी समाज का पूरा धर्मांतरण न कर पाना घोर आश्चर्य जनक था।क्योकि वे शासक हो चुके थे।फिर पराजित गुलाम समाज की आर्थिक रीढ़ तोड़ने का कुचक्र रचा गया।

यह उनको बहुत चक्कर में डालने वाला माजरा था। इस वजह से उन्होंने विश्लेषण-चिंतन-अध्ययन किया और समझ गए।यह बहुत सुगठित समाज है।उन्होंने निष्कर्ष निकाल लिया कि गाय आधारित अर्थव्यवस्था नष्ट की जाए तभी धर्मांतरण की कोई सफलता मिलेगी।तब जाकर हम इस समाज पर हावी हो सकेंगे।उन्होंने बेस पर वार किया।दुतरफा हमला किया।
1-गोवंश काटो खाओ।
2-सूअर पालन से नफरत करो-करवाओ।यह करके खत्म करो।

भारतीय समाजो,समुदायों की,सनातनी समाज की रचना ऐसी रही है कि रोजगार संपूर्ण जातियों में बैठे हुए थे। बेरोजगारी की समस्या संभव ही नहीं थी।छोटे से छोटे काम का डिजाइन किया गया था।जीरो प्रतिशत अन-एम्प्लायमेंट।दुनिया में कोई उदाहरण इस तरह का नही मिलेगा।क्षत्रिय सैनिक-पुलिसिंग की जाति थे,ब्राम्हण शिक्षा-दीक्षा-भिक्षा,पठन-पाठन,पूजन-संगठन-चिन्तन की व्यवस्था थी,यादव,ग्वाल,बढ़ई,नाई,खटीक,कुम्हार,कहार,सोनार,लोहार,धरकार,बसखार,बरुखार,मल्ल,मल्लाह,मछेरा,चर्मकार आदि-आदि सभी के काम सदा से अर्थव्यवस्था के लिहाज से बनाये गए थे।इस बंटवारे की वजह से समाज में बेरोजगारी कभी नही खड़ी हुई।काम बदल लेने की स्वततंत्रता के हजारो उदाहरण मौजूद है। इसमें किसी की महत्ता कम-ज्यादा से नही आंकी जाती थी।सभी अन्योंनाश्रित थे।सभी बराबर थे।यह कसावट समाज की डिपेंडेंट इकोनामी को मजबूत बनाते थे।यही आर्थिक सुरक्षा भी प्रदान करती थी।काम वही और वैसे ही आज भी है।पर उन्हें देखने का नजरिया बदल दिया गया है।
बाल-नाखून काटने से लेकरखेती करने तक का काम, गोपालन से लेकर के बटाई तक का काम, मांस काटने से लेकर के सोना बनाने तक का काम, व्यापार करने से लेकर के नौका निर्माण का काम,छोटे से छोटा काम भी बटा हुआ था।वाहन कौन चलाएगा,घर में कौन काम करेगा,रस्सी कौन बटेगा,दवाई कौन बनायेगा,मिठाई,जूता,बरतन, कपड़े सबके काम निर्धारित थे, मिट्टी के बर्तन,पीतल के बर्तन बनाने के अलग लोग थे।इस वजह से सुगठित समाज तैयार था। विकेंद्रित अर्थव्यवस्था की इस हिंदू इकोनॉमी ने दसियों हजार साल तक समाज में कोई संघर्ष होने नहीं दिया।सब साथ-साथ समाज में सुखपूर्वक जीते रहे।यहां तक की राजा कौन हो इससे भी कोई फरक नही पड़ता था।

हर काम बटा होने की वजह से समाज सुगठित था, व्यवस्थित था एक दूसरे पर आश्रित था।इसलिए आपसी प्रेम-सामंजस्य था।इस वजह से धर्मांतरण हो पाना संभव नहीं था।बेसिकली मार्क्सवाद-साम्यवादी व्यवस्था समाज में या किसी भी देश में केवल वर्ग-संघर्ष कराने पर आधारित है।यह वर्ग संघर्ष कराने के लिए वह समाज में बिसबीज बोते हैं।वर्ग तैयार करने की उंनकी रणनीति भारतीय कार्य आधारित समाज-व्यवस्था में फेल हो जाती है।इस नाते वह ऐसे नकारात्मक चीजें रोपने-बोलने-लिखने-स्थापित करने का प्रयास करते रहते हैं, जिससे समाज में दो वर्गों का निर्माण हो सके।समाज टूटकर वर्ग संघर्ष के लिए आतुर हो जाए।वर्ग संघर्ष कराने की उनकी यह नकारात्मक सोच मार्क्स के ‘क्रांति, नामक एक विसबीज पर निर्भर है।यह उनको सत्ता को कब्जे में लेने का उपाय मात्र है।यह समाधान नही देता।दुनियां भर में इसी वजह से फेल रहा।जातीय संरचना की वजह से यह पूरी साजिश भारत में फेल हो जाता है।क्योंकी भारत में रोजगार के लिए कोई संघर्ष नहीं था।यहां आर्थिक संघर्ष नही था।पूर्ण जातीय व्यवस्था रोजगार आधारित व्यवस्था थी।उससे ऊपर उठकर के कोई विकास करना चाहे विकास कर सकता था।वह चाहे तो कार्य बदल सकता था।सदियों के बाद धीरे धीरे यह व्यवस्था समाज की रीढ़नुक्रमानुपाती के रूप में स्वरूप धारण कर लिया।अब समस्या क्या है जब बेरोजगारी ही नहीं है,द्वंद ही नहीं है तो धर्मांतरण और क्रांति कैसे कराएं? इसको लेकर के उन्होंने नफरत के बीज बोने शुरू किए।यह अंग्रेजो के जमाने से थोड़ा पहले शुरू हुआ।वह जातियों को छोटा-बड़ा करके दिखाने की परंपरा स्थापित करने लगे।ऊंच नीच करना शुरू कर दिया।उससे पहले ‘मानव-सामान-कार्य बराबर है, सिध्दान्त था।वरना ब्राम्हण के पास तो कोई ठोस भौतिक वस्तुएं न थी वह कैसे जीवित रहता?

व्यवस्था में गोपालन करने वाला गो-आधारित अर्थव्यवस्था रखने वाला, भारतवर्ष इतना ज्यादा उत्पादन करता था कि हर कोई उस पर निर्भर रहता था।छत्रिय का काम था रक्षा करना उसको भी उसी में से मिलता था। ब्राह्मण का काम था पढ़ाना, शिक्षा,अध्यात्म,वह भी उसी गो-अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता था।गाय के कारण समृद्धि खुद ही खड़ी हो जाती थी।प्रकारान्तर से अन्य वर्गों का बसर भी उसी से होता था।एक दूसरे पर सहयोग करके, आर्थिक रुप से ग्रहण करके, व्यवस्था स्थापित होता था। कोई उत्पादन करता था,कोई कोई सहयोग करता था।सभी एक दूसरे के लिए-एकदूसरे के साथ जीते थे।कोई शिकायत किसी से होती तो काम बदल लेते।

दान भी देश की इकोनॉमी का एक अंग रहा है।आज भी हरेक व्यक्ति दान को दिनचर्या में शामिल रखता है।वह केवल समाज से सेफ्टी-वाल्व का काम ही नही करता था बल्कि गोंद या एडहेसिव की भूमिका निभाता था।ज्यादातर सामाजिक कार्यो का धन दान से निकल आता।इस नाते कभी भी भारतवर्ष में वर्ग संघर्ष या एक दूसरे के प्रति शत्रुता भाव कभी पैदा नहीं हो सका।यह तो इधर के लेखन से, इधर के कम्यूनिकेशन सिस्टम से, इधर के सरकारी प्रोत्साहन के नाते इतनी नफरत पैदा की गई। जातीय भाव पैदा हुए।इन सौ सालों की देन है यह।स्पेशली परवर्ती कांग्रेसी शासको की देन है।हिंदू समाज में दरार पैदा की गई, एक निहित स्वार्थ की वजह से साजिशन पैदा की गई,उसका टारगेट आप अच्छी तरह समझ सकते हैं।

इस्लाम जब भारत में आया तो उसने राजाओं को छत्रियों को परास्त करके सत्ता पाई थी।अन्य देशों की तरह भारत की जनता इस्लाम में तब्दील नही हुई तो आश्चर्य से भर उठे।उसने देखा कि भारतीय इकोनॉमी इस ढंग से एक दूसरे में गड्ढमगड्ढ है, गुत्थम-गुत्था है कि पुरे हिंदू समाज का एक साथ इस्लामीकरण करना कभी संभव नहीं है।क्या करें, उन्होंने तोड़ दो का व्यवहार अपनाया।सबसे पहले उन्होंने सूअर पालन पर आघात किया।शासनादेशों से,हतोत्साहन की नीतियां अपनाई।उसको घृणित चित्रित करना शुरू किया।उसने समाज के एक बड़े वर्ग को दलित में बदल दिया।वही मुख्य मांसाहारी खाद्य था जिस पर देश का बड़ा हिस्सा निर्भर करता था।

दूसरा आक्रमण गाय-अर्थव्यवस्था पर किया। गाय केवल गाय नहीं थी, वह माता जैसी स्थिति में थी।उसका कारण समझना आसान है।दूध, घी,मट्ठा,दही जैसी चीजें भोजन के रूप में प्राप्त होती थी,उससे पैदा हुए बैल से खेत जोता जाता था,गोबर,मूत्र वगैरह भी कहीं ना कहीं उपयोग में लिया जाता था।फसल,कृषि सब कुछ उसी पर निर्भर था।यह अरब में न था।जमीन उपजाऊ बनाने के लिए बिना गाय के यह संभव नहीं था।भारत की उर्वरा-भूमि गाय-आधारित थी। और भारत माता के आधार-श्रध्दा तत्व निर्माण का कारक यही चीजे थी।यह श्रद्धा सीधे-सीधे सामाज की बनावट और आर्थिक स्वरुप निर्धारित करती थी।नितांत वैज्ञानिक अवधारणा समझ लीजिए।इस पद्धति को इस्लाम ने भाप लिया। उन्होंने सीधा टारगेट करना शुरू किया।भोजन के रूप में सूअर पालन को हतोत्साहित करो,जो की मुख्य मांसाहारी आहार था। उसे नष्ट करते-करते परिणाम सामने हैं।उसके केवल आर्थिक परिणाम नहीं निकले भारतीय समाज में ही दरार पड़ गई।एक बड़ा वर्ग जो कभी अमीर था अचानक गरीब और दलित वर्ग में तब्दील हो गया।आज आर्थिक अभावों की वजह से वह दरार लगातार चौड़ी होती जा रही है।अर्थव्यवस्था का मूलाधार जो सूअर पालन और गो पालन करता था वह अपने स्थान से डिग गया।इससे सब कुछ बदलने लगा।आर्थिक पिछड़ेपन की वजह से यह धर्मान्तरण के लिए साफ्ट मैटेरियल मिल गया।

आगे चलकर वामपंथियों और अधकचरी समझ वालो ने इसे एक खतरनाक स्टेज में पहुंचा दिया।उन्होंने मीडिया,सिनेमा साहित्य, लेखन,पाठ्यक्रमों में घुसपैठ कर के हिंदू समाज के बेसिक आधार पर हमले करने शुरू किए।दरअसल सामान्य सनातनी मार्गदर्शकों,विचारकों, विद्वानों,संतो,सन्यासियों और थाट लीडर्स को उन्होंने टारगेट किया।सबसे पहले उनको पोंगापंथी और पाखंडी इमेज में क्रिएट कर जिससे दिमागी खुराक देने वाला न बचे।फिर ब्राम्हणों को जो की प्राकृतिक तौर पर सनातनी सामाज के संगठक थे अलग-थलग करने पर लगे।उसके बाद खुद की बुद्धिजीवी छवि हासिल की।भारतीय समाज में खुद को बुद्धिजीवी तौर पर स्थापित किया। चुकी नेहरू और सोवियत मदद से सत्ता पर पकड़ थी ही शिक्षा,सिनेमा,मीडिया,साहित्य,कला आदि पर धीरे-धीरे नेहरू ने इन को कब्जा करा दिया।चूंकि प्रतियोगी परीक्षाओं पर भी इन्होंने ही कब्जा कर रखा था इसलिए बुद्धिजीवी छवि बन गई। यह बनने के बाद उन्होंने सामान्य समाज में वह चीजें इंपोज करनी शुरू की जो साजिश के लिए जरूरी थी।उन्ही में गो-हत्या को बढ़ावा देना,सुवर पालन को समाज से गायब् करना भी था।
गाय को श्रद्धा के बिंदुओं से हटाना शुरू किया।उसे माँ के बजाय एक पशु में बदलने का प्रयास करना शुरू किया। ऐसा नहीं है कि वह जानते नहीं थे वह जानते थे कि गाय के प्रति श्रद्धा पूरी अर्थव्यवस्था को जोड़े हुए है। पर उन्होंने बड़ी चतुराई से गाय को ‘मांस, में बदल दिया।उनके लेखन ने भारतीय हिंदू समाज को टारगेट किया हुआ था इसको थोड़ा भी मनन करेंगे तो आपकी मूल मानसिकता समझ में आ जाएगी। पिछले 12 सौ साल से वह यह आक्रमण लगातार जारी रखे हुए हैं। हमें इसे अच्छी तरह समझना होगा और इसका निदान ढूंढना होगा नहीं तो हमारा समाज, हिंदू समाज लगातार विभाजित होता रहेगा गरीब होता रहेगा,कमजोर होता रहेगा। समाज के सभी हिस्सों का सुख समृद्धि और शांति से भरपूर होना जरूरी है।

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