माँसाहार सम्बन्धी नियम व कानून – दुष्प्रचार का जवाब

मांसाहार पर बहस जारी है। वैध और अवैध बूचड़खानों पर भी बहस जारी है। योगी आदित्यनाथ की सरकार के आने के बाद से यह बहस और तेज गई है, परंतु हमें यह याद रखना चाहिए कि अधिक समय नहीं हुआ है, जब देश में कुछ लोग “गौमांस उत्सव” भी मना रहे थे। यह भी स्मरण रखें कि जैन पर्व के समय मांस व्यापार पर प्रतिबंध लगाए जाने पर, देश में मांसाहार विषय को लेकर काफी तेज बहस चली थी। मांसाहार पर बहस देश में कोई नई बात नहीं है। यह एक बड़ी ही पुरानी बहस है। मांसाहार करना चाहिए या नहीं, इस पर एकमत हो पाना बड़ा ही कठिन है। आर्य समाज जैसे संगठन में पहला विवाद मांसाहार को लेकर ही हुआ था, कि मांसाहारी को आर्य समाज में प्रवेश दिया जाना चाहिए या नहीं। मांसाहार मनुष्य के अनुकूल क्यों नहीं है, इस पर वैदिक संपत्ति में पंडित रघुनंदन शर्मा ने विस्तार से लिखा है। उन्होंने वहाँ जो तथ्य और तर्क दिए हैं, वे आज भी अकाट्य बने हुए हैं। मांसाहार को अनुचित और मनुष्य की शारीरिक-मानसिक रचना के विपरीत माना जाता है। परंतु समझने की बात यह है कि यह सनातन धर्म के प्रमुख सिद्धांत “जियो और जीने दो” का विरोध भी करता है। ऐसे में इन दोनों ही सिद्धांतों में सामंजस्य कैसे बैठाया जाए?
भारतीय मनीषियों ने इस पर भी विचार किया था और उन्होंने इसका समाधान भी निकाला था। भारतीय मनीषियों का मानना था कि मांसाहार की प्रवृत्ति को समाप्त करना असंभव है, परंतु इसे मर्यादित किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने इसके अनेक उपाय किये थे। इसमें एक प्रमुख उपाय था आखेट या शिकार। मांस की प्राप्ति के लिए आखेट या शिकार को ही आधार माना गया। इसके अतिरिक्त मांस की आपूर्ति किसी और साधन से प्राचीन भारत में कभी भी नहीं की गई। मांस व्यापार को स्पष्ट रूप से अनैतिक माना गया। मनु स्मृति ने इस पर साफ-साफ लिखा है कि किन किन कारणों से मांसाहार कभी न करे। इससे आगे बढ़ कर मनु ने मांसाहार हेतु पशु को मारने की आज्ञा देने वाले, उसे मारने वाले, उसे काटने वाले, मांस को खरीदने और बेचने वाले, पकाने वाले, परोसने वाले और खाने वाले इन आठों को पातक माना है।
यही कारण है कि भारत हमेशा से मूलतः शाकाहारी देश ही रहा है। फिर भी यह सच है कि प्राचीन काल से ही भारत में मांसाहार भी किया ही जाता रहा है। समझने की बात यह है कि भारतीय मनीषियों ने कभी भी व्यक्ति के निजी अधिकारों में कभी भी कानूनी हस्तक्षेप नहीं किया। केवल उनका नियमन ही किया है। इसलिए मांसाहार वर्जित होने पर भी होता ही रहा है और इस कारण मांस का व्यापार भी होता है। परंतु प्राचीन काल में इसका नियमन आज की तुलना में कहीं अधिक अच्छे तरीके से किया जाता था। प्राचीन काल में मांस-व्यापार को नियंत्रित करने के लिए जो नियम बनाए गए थे, वे मनुष्य स्वभाव की इस कमजोरी को नियंत्रित करने के उद्देश्य से बनाए गए थे। इसका एक उदाहरण चाणक्य के अर्थशास्त्र में मिलता है।
चाणक्य ने मांस व्यापार पर नजर रखने के लिए सूनाध्यक्ष की नियुक्ति करने का विधान किया है। किन पशुओं का वध किया जाए और किसका नहीं, इस पर सरकार के आज के नियम कुछ खास नहीं बताते। जो नियम हैं भी, वे मांसाहार को नियंत्रित कर नहीं कर सकते, उलटे वे उसको बढ़ावा देते हैं। चाणक्य इस बारे में साफ-साफ निर्देश देते हुए कहते हैं – समुद्र में उत्पन्न होने वाले हाथी, घोड़ा, बैल आदि की आकृति वाले भिन्न-भिन्न प्रकार के जलचर, सारस, नदियों, तालाबों और छोटी-छोटी-छोटी नहरों में होने वाली मछलियां, क्रौंच, उरक्रोशक, जलकौआ, हंस, चक्रवाक, जीवंजीवक, भृंगराज, चकोर, मत्तकोकिल, मोर, तोता, मैना, मुर्गा, आदि मछलियों, पक्षियों और पशुओं को न मारा जाए। बछड़ा, सांड़ और गाय भी अवध्य हैं।
इस प्रकार देखा जाए तो चाणक्य पालतू पशुओं के मारने, उनके मांस को खाने और उनका व्यापार करने को साफ-साफ निषेध करते हैं। केवल खुले वनों में रहने वाले मृग सरीखे जीवों के मांस के व्यापार की ही अनुमति दी गई थी। साथ ही ग्रंथों में माँस व्यापार करने के लिए पशुओं को मारने का स्थान भी नियत रखने की व्यवस्था दी गई है। कहीं भी मरे पड़े पाए गए पशु का मांस भी नहीं बेचा जा सकता। यह बात हमें समझनी चाहिए कि जिस पशु को हम पालते हैं, उससे हमें मोह हो जाना स्वाभाविक है। यदि वह मोह हमें नहीं होता, तो हम मनुष्य होने पर एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। पालतू पशुओं को मारने से मानव स्वभाव में एक विकृति पैदा होती है जो उसे कालांतर में अधिक असहिष्णु, निष्ठुर और सामाजिक दायित्वों के प्रति उदासीन बना देती है।

इस प्रकार देखा जाए तो चाणक्य के अनुसार राज्य का काम मांस-व्यापार से राजस्व प्राप्ति पर नजर रखने से अधिक अवध्य पशु-पक्षियों की सुरक्षा करना है। साथ ही इन नियमों से मांसाहार भी नियंत्रित होता है. ऐसे स्पष्ट वैदिक नियमों के बावजूद कुछ स्वार्थी तत्त्व वेदों और मनुस्मृति में माँसाहार को लेकर अफवाहें फैलाते हैं, जिनमें कोई तथ्य नहीं होता। माँसाहार के उचित नियमन तथा विपणन संबंधी क़ानून हमारे प्राचीन ग्रंथों में उल्लिखित हैं. स्वार्थी तत्वों से सावधान रहें, मित्रों को जागरूक करें तथा समय-समय पर तथ्यात्मक विश्लेषण करके दुष्प्रचार का खंडन भी करते रहें।

Writer- Sandeep Singh Jee

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