प्रोजेक्ट जेसन बॉर्न डिस्ट्राइ

अमेरिका मे दो मुख्य पार्टिया है,डेमोक्रेट और रिपब्लिकन।ब्रिटेन मे भी लेबर और कंजरवेटिव्स पार्टी है।फ्रांस मे यूनियन पार्टी और शोषलिस्ट पार्टी है।आस्ट्रेलिया मे लेबर और पीपुल्स पार्टी है।जापान मे लिबरल और कोमितांग है।इटली मे डेमोक्रेटिक और मूवमेट पार्टिया है।कभी कोई जीतता है कभी कोई।लेकिन सरकार बदलते ही जो पार्टी सरकार मे आती है।उस पार्टी के सारे के सारे कार्यकर्ता सरकार मे आते है।छोटे-बड़े सभी पदो पर कार्यकर्ता ही बैठता है।क्योकि उनकी जबाबदेही होती है।यह जबाबदेही केवल नेता की नही होती,स्थानीय कैडर की भी होती है।सारा का सारा कैडर ही सरकार मे आता है।दुनियाँ के सभी स्ंभवत: उनकी मशीनरी भी इसीलिए सशक्त भाव से काम करती है।सामूहिक कार्य होते है और सामूहिक निर्णय,प्रतिनिधित्व,सामूहिक जिम्मेदारियो के साथ जबाब देही।परिपक्व लोकतन्त्र इन बातो को सीख चुका है।परंतु भारत मे कुछ नेता सरकार मे आते है।वे सब कुछ अपने इर्द-गिर्द समेत लेने की कोशिश करते है।पार्टियो के नेताओ की प्रवृत्ति कार्यकर्ता के साथ सत्ता-काल मे अपनी प्रभुता, बांटने मे नही रहती।उन्हे लगता है बड़ी मुश्किल से तो मौका मिला है क्यो किसी के साथ बांटना।{यहाँ कांग्रेस,सपा-बसपा या आप पार्टी जैसी पारिवारिक कंपनियो की बात न करके हम कैडर-बेस्ड पार्टी की बात कर रहे है।}

संगठन मे ढेरो लोग लगे होते है।विभिन्न दायित्वों पर वह काम करते है। सेवा,संगठन कार्य,व्यवस्था,सम्पर्क,तमाम कार्यक्रमों मे सभी सक्रिय रहा करते है।इनही कार्यक्रमों मे से तमाम पदाधिकारी एवम प्रचारक निकलते है।वैसे संघ के सभी प्रशिक्षित कार्यकर्ताओ का उपयोग संगठन कार्य मे नही हो पाता।किसी समय मे ऐक्टिव रहा प्रशिक्षित कार्यकर्ता भी समय के थपेड़ो मे गायब हो जाता है।हजारो कार्यकर्ता जीवन की विभिन्न परिस्थितियो का शिकार होकर नेपथ्य मे खो जाते है।लखनऊ-कानपुर-काशी-आदि महानगरो मे ही सूची बनाइये तो हर शहर मे हजार मिलेंगे।जिनकी कोई योजना नही हुई होगी।ऐसा नही है वे काम नही कर रहे होंगे।वे जहां भी होते है कुछ न कुछ संगठान के लिए करते है।जिसके लायक जो भी बन पड़ता है करता ही है।उसका चरित्र उसकी पहचान होता है।अपने राष्ट्र के प्रति उसका समर्पण,उसकी ईमानदारी,उसकी वेदना,उसकी सक्रियता ही उसे स्वयनसेवक स्वरूप देती है,उसे देखने मिलने ,वाले उसे संघवाला के नाम से ही जानते है।परंतु समय के प्रवाह ने उसे संगठन कि दैनिंदिन गतिविधियो से उसे काट रखा है।उन पर भी उतना ही श्रम,त्याग,व खर्च आया है।बस वह वेस्टेज हो रहा है।उन्हे कोई खोजने वाला नही है।उनको रचना मे लेने वाला कोई नही आता।किसी भी भांति उनका उपयोग करना चाहिए।खोजिए जेसन को।

दरअसल हो क्या रहा है कि संगठन अब सत्ता में है।कोई माने या न माने।किन्तु यह सच है।जबाबदेही सामूहिक है,भले ही वह फेसबुकिया कार्यकर्ता है।लेकिन वह सक्रिय तो रहा ही है।समाज में कार्यकर्ताओं के सामने यह संकट है कि लोग उसे संगठन और विचारधारा का प्रतिनिधि समझते हैं।वह संगठन के विचारों के प्रतिनिधि के रुप में समाज में स्थापित है।कुछ ही दिन पहले इसी काम के लिए उसने वोट मांगे थे,इसलिए वह ज्यादा जवाब देह हो गया है।सरकार की असफलताओ-सफलताओ पर उसकी इज्जत-बेइज्जती निर्भर हो चुकी है।कई चीजों पर आँख चुराते हुये भागना अच्छा नही लगेगा। किसी नेता के बजाय कार्यकर्ता को सत्ता की हर कृति-कुकृत्य का जवाब सामने देना पड़ता है।उस की जवाबदेही, प्रतिबद्धता और जीवन पद्धति बदल जाती है। मशीनरी संगठन का कार्यकर्ता, चरित्रवान, निष्ठावान है, संगठन का काम करना,गवर्नमेंट मशीनरी का काम करना-मशीननरी पर नजर रखना आता है।लेकिन वह चालाकियां,मक्कारी,गणेश परिक्रमा,लाबी बाजी,गिरोहपडता, इत्यादि नहीं सीख पाता। ना ही वह सीखना चाहेगा,क्योंकि शाखा पद्धति, संगठन पद्धति,प्रशिक्षण पद्धति के द्वारा उसके अंदर ठूस-ठूस कर राष्ट्रनिष्ठा ईमानदारी और पारदर्शिता भर दी गई है।यह समस्या हो जाती है कि जब वह बाहरियों को संगठन में उच्च स्तर पर पहुंचते देखता है,पैरामीटर बदल जाते है या पैरामीटर है ही नही।वह अपने चरित्र के अंदर गिरावट देखना पसंद नही करता है परिणाम उल्टा हो जाता है वह लंबे समय के लिए बैठ जाता है।वह बहुत सारी बातें व्यवहारगत रूप में अपना नहीं पाता। गवर्नमेंट मशीनरी पर गलत लोग जिनका संगठन से दूर दूर तक का लेना देना नहीं होता, चरित्र से दूर-दूर तक का लेना देना नहीं होता।ढिंढोरा पीट कर मैं भी-मैं भी कर के ऊपरी स्तर पर हावी हो लेते हैं।गवर्नमेंट मशीनरी का वह लाभ लेना शुरु करते हैं,संसाधनों को जुटाना शुरू करते हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना शुरू करते हैं।परिणाम स्वरुप विचारधारा फेल होने लगती है। यह केवल संघ और राष्ट्रवादी विचारधारा नहीं, सारे संगठनों की विचारधारा के साथ है।गलत लोग अति महत्वाकांक्षी और धूर्त लोग सिस्टम पर हावी हो जाते हैं और कब्ज़ा कर लेते हैं।यह इसलिए लिख रहा हूँ ताकि सनद रहे।

इसमें भी कोई खास बात नहीं है।खास बात यह है कि ‘विचारों, का सरकार में आने के बावजूद उनका प्रतिपादन ना हो पाना।विचारों का सरकार के संगठन पर पकड़ ना हो पाना।वह केवल इसलिए होता है कि प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं का उपयोग ना के बराबर हो जाता है।प्रशिक्षित कार्यकर्ता कही भी उपयोग में नही लिए जाते है। उनके द्वारा विचार चरित्र जीये हुए कार्यकर्ताओं के द्वारा इंप्लीमेंट किया जा सकता था।वह ना होने के नाते चीजें वैसी ही पुरानी रह जाती हैं।पदों पर जो लोग आते हैं वह अपनी मशीनरी डेवलप करने की कोशिश करते हैं।वह अपने साथ एक गिरोह की मशीनरी सरकार में लेकर आते हैं।उसी गिरोह के साथ सरकार की मशीनरी को पूरी तरह लूट करके अपनी व्यक्तिगत सत्ता बढ़ाने की कोशिश करते हैं। उनकी कोशिश हमेशा यह होती है कि संघ और बीजेपी की सत्ता न बनने पाए।अंदर ही अंदर उनका संघर्ष चल रहा होता है।वह अपनी व्यक्तिगत हैसियत बढाने में लगे होते है न की संगठन की।संघ के मौलिक विचारों से वह अपने पद की प्रभुसत्ता को बचाते है।ऐसे में उनकी कोशिश होती है संगठन के मूल लोग यहां ना भर जाए।उनको इगो-तुष्टि करनी आती है।वह यह भी नही जानते कि क्या कीमती चीज खो रहे है।इसी दृष्टि-सृष्टि के द्वारा वहां के कार्यकर्ताओं को काट देते हैं।उन्हें चापलूसी,महिमामंडन इतना भाने लगता है कि अभिभूत होकर भूल जाया करते है कि इसी के लिए अपना जीवन लगा दिया था।निर्णायक स्थान पर बैठे स्ंगठको को अभिभूत होने की जगह यह समझना होगा कि वह इतिहास के मुहाने पर बैठे है,आज कि हर गतिविधि का हिसाब इतिहास के तौर पर एक दिन समाज लेगा।संगठन के पदाधिकारी विचार-वान होते हुये भी अनुभव न होने के कारण सत्ता के मौलिक स्वरूप,प्रकृति और व्यवस्था को नहीं पहचानते तो उनको समझाना-बरगलाना-प्रभावित करना आसान होता है।नेता और कुछ नही पकार पाते तो उनको अनिर्णयात्मक मन:स्थिति मे पहुचाने मे कामयाब हो जाते है।अति सकारात्मक होने के नाते उन्हे सूचना नही होती कि इन्हीं लोगों का गिरोह,इन्हीं लोगों के निकटस्थ लोग मोटा माल उड़ा रहे हैं।उनके घरों की संपत्तियां बढ़ रही है।उनके रिश्तेदार अचानक धनवान हुए जा रहे हैं।उनकी गाड़ियां,घोड़े,बंगले,बढ़ती सम्पत्तियां सब इसी जिस मशीनरी में एक का बीज है।उसी की लूट के सहारे खड़ी हो रही है।धीरे-धीरे यह नेता संगठन के मौलिक स्वरूप को चैलेंज देना शुरु कर देता है।संगठन की शक्ति के सहारे कुछ लोग अपनी व्यक्तिगत कद्दावर छवि बनाते चले जाते हैं।जैसे-जैसे उनकी कद्दावर नेता की छवि बनती है, संगठन की छवि उनकी कद्दावर व्यक्तित्व के सामने कमजोर हो जाती है।इसी लिए वे संगठन के माध्यम से आने वाले कार्य को तो घुमा-फिरा कर नही होने देते,संगठन के मौलिक-प्रशिक्षित कार्यकर्ताओ को विभागों में नियुक्ति-पकड़ नही बनने देते,उन्हें प्रभावशाली नही होने देते।क्योकि इससे संगठन का प्रभाव बढ़ना शुरू हो जाएगा।संगठन का प्रभाव बढ़ना यानी उनके नियंत्रण में कमी।

सरकार की अधिकतर योजनाएं फेल क्यों होती हैं।यह जानने के लिए ही हम यह विश्लेषण कर रहे हैं।किसी योजना के इंप्लीमेंटेशन के लिए हमें या तो गवर्नमेंट मशीनरी का उपयोग करना होगा अथवा सांगठनिक( पार्टी की) मशीनरी का उपयोग करना होगा।इसका सदुपयोग सीखना पड़ेगा।जब गवर्नमेंट मशीनरी फेल होती है तो संगठन मशीनरी का उपयोग सुचारु रुप से करने के लिए प्रयास करना चाहिए।सिस्टम पर पकड़ बनाने के लिए,समस्याओं के निराकरण के लिए,सूचनाओं के प्रवाह के लिए अमूमन दो रास्ते होते हैं या तो गवर्नमेंट मशीनरी ठीक से कार्य करें, उनकी सूचनाएं दे अथवा संगठन की मशीनरी से काम करवाया जाए।गवर्नमेंट मशीनरी से कोई प्रोजेक्ट,टारगेट,निर्णय मुख्यमंत्री से होते हुए चीफ सेक्रेटरी, आयुक्त,कलेक्टर,तहसीलदार से होते हुए लेखपाल तक जाती है अथवा स्थानीय प्राइमरी पाठशाला के मास्टर या पुलिस मशीनरी की निचली इकाई तक जाती है।इसी तरह से इंप्लीमेंटेशन भी होता है। अमूमन सरकार की मशीनरी करप्ट हो चुकी है। सरकार की मशीनरी निकम्मेपन, अकर्मण्यता,निष्ठाहीन और चरित्र हीनता के स्तर तक बदल चुकी है।कीमत जनता और पार्टी चुकाती है।जब ऐसी मशीनरी फेल या भ्रष्ट हो तो संगठन की मशीनरी का उपयोग करना चाहिए।निर्णायकों-निर्धारकों को एक आब्जर्वेटरी बॉडी डेवलप करनी चाहिए,जिसे कार्यकर्ता विशेषकर ट्रेंड कार्यकर्ता समभाले।स्पेशिली जब आपके पास योग्य और प्रशिक्षित कार्यकर्ताओ की कमी नही है तब खुलकर उनका उपयोग करने मे कोई बुराई नही,आखिर जिम्मेदार तो सबको होना है।वहां निष्ठाएं,कर्मठता और सुचारुता के साथ गहन परिश्रम व राष्ट्रनिष्ठा के नाते ज्यादा परिणाम सामने आएंगे।ईमानदार, प्रशिक्षित,चरित्रवान कार्यकर्ताओ को संगठन में, सरकार में, सत्ता में उपयोग लेने की एक व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है।अगर व्यवस्था विकसित नहीं हुई तो इसके दुष्परिणाम विचारधारा और अंतिम दुष्परिणाम राष्ट्र और समाज भुगतेगा।हमें सजग रहना होगा। जैसन बॉर्न का उपयोग करो केवल प्रशिक्षण ही नहीं।नही तो फिल्म जरूर देख लीजियेगा हर सीरीज के अंत में वह क्या करता है।

(बाकी पढ़िये-अगले हफ्ते)

Writer- Pawan Tripathi Jee

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