काल पूछेगा इतिहास

भारतीय राजनीति मे कभी अरुण नेहरु नाम के एक व्यक्ति थे।1980 में जब जनता पार्टी को इंदिरा जी ने हरा दिया और एक बहुत बड़ी बहुमत लेकर आई, तो उस समय देश भर में अरुण नेहरु को राजनीति का चाणक्य कहा जाने लगा।बहुतों को याद होगा उन दिनो अरुण नेहरू,प्रणव मुखर्जी दो लोग इंदिरा जी के मानस पुत्र कहलाते थे।करीब आगे के कुछ सालो तक भारत की राजनीति, इन्ही दोनों चाणक्य के इर्द-गिर्द घूमती रही।यह अलग बात है बाद में इस चाणक्य की दुर्दशा हो गई थी।वैसे खजाना लेकर वह अलग हुए थे इसलिये परेशान होने की कोई बात नही।बिलकुल इसी तर्ज पर 1990 में गोविंदाचार्य को वीपी सिंह ने राजनीति का चाणक्य कहा था।थिंक टैंक नाम से जाने जाते थे।गोबिन्द जी एक दशक 1990-से 2000 ई तक भाजपाई राजनीति के केंद्र मे रहे।भारतवर्ष में पॉलिटिकल मैनेजमेंट का काम उसी युग में आया था।1993 के बाद मध्य प्रदेश में एक समय दिग्विजय सिंह को कांग्रेस के महान रणनीतिकारों में गिना जाता था।वह जिस तरह से चाहते थे राज्य को,चुनावों को वैसे घुमाते थे।मीडिया ने दिग्विजय सिंह को “चुनावी प्रबंधन का महारथी, की उपाधि दी गई थी।ऐसा लगता था कि मध्य प्रदेश की राजनीति से दिग्विजय सिंह का सूरज कभी अस्त ही नहीं होगा।यह वाकई उनही के मुखारबिन्दुओ से निकला था “राजनीति चुनाओ के प्रबंधन का नाम है,ठीक से मैनेज करके किसी भी सीट को जिताया जा सकता है,। वह और उनकी मुस्कुराहट के साथ चुनावी प्रबंधन टीम धीरे-धीरे कांग्रेस में हावी हो गई।अर्जुन सिंह की राजनीति खत्म करने का श्रेय दिग्विजय सिंह जी को जाता है।कभी मेनन और गुलजारीलाल नन्दा भी इसी तरह के प्रबंधन के लिए जाने जाते थे।2004 के बाद तो गज़ब हो गया।आंकड़ो का विश्लेषण और सर्वे करने वाली कुछ क्ंपनिया और व्यक्ति देश के पटल पर विशेषज्ञ रूप मे ऊभरे और छा गए।दरअसल उस साल स्व॰प्रमोद महाजन जी ने फील गुड के चक्कर मे दो बड़ी कैम्पेन क्ंपनिया हायर कर ली थी।उससे पहले केवल कांग्रेस ही कई कंपनियो को चुनाव मे लगाती थी।चूंकि 2004 के आम चुनाव मे कार्यकर्ताओ की जगह कुछ कंपनिया खुलकर लड़ रही थी और सारा खेल पैसे का हो चुका था इसलिए माहौल ही बदल गया।क्रमश:सभी पार्टियो ने कार्पोरल-कल्चर अपनाना शुरू कर दिया सर्वे,आंकणन,इमेज्मेकिंग ग्रुप्स,पीआर-इवेंट मैनेजमेंट,एडवरटाइजिंग प्रोडक्सन,प्रोग्राम-मैनेजमेंट,कैम्पेन मैनेजमेंट,यह सब एक दम से पेड हो गया।पूरी राजनीतिक गतिविधिया बाकायदा कुछ कम्यूनिकेशन एजेंटो द्वारा तय होने लगी। चुनावी कंपनियों के दिन आ गये।वर्तमान में कम से कम 15 प्रबंधन कंपनियां इस समय ठेके लेकर कंसल्टेंसी करती है।लगभग सभी पार्टियां मोटी रकम देकर उन्हें हायर करती है और वही काम करवाती है जो कभी कार्यकर्ताओ के जिम्मे था।प्रबंधन कंपनियां एकदम से देश की जनता और लोकतंत्र की दशा दिशा तय करने लगी है।आज यह अमेरिकन तर्ज पर सालाना 12 हजार करोड़ का कारोबार है जो की वैध नही है।खैर आज का विषय यह नही है।

मोतीलाल वोरा-दिग्विजय सिंह की टीम भारतीय राजनीति के चाणक्य के नाम से लम्बे समय तक काबिज रही।लगातार 10 वर्षों तक कम्पनियो द्वारा चुनाव प्रबंधन के बल पर मनमोहन सिंह की सरकार सोनिया गांधी की रिमोट सरकार चलती-जीतती रही थी।ऐसे ही 2014 में जब मोदी चुनाव जीतकर आये तो प्रशांत किशोर नाम के एक अल्पज्ञात से सज्जन प्रकट हुए और उस चुनाव की सफलता का श्रेय लेने का प्रयास किया।लेकिन संघ-भाजपा की टीम ने उन्हें बाहर कर दिया। बिहार चुनाव के बाद तो ऐसा लगने लगा जैसे भारतीय चुनावी प्रबंधन का मसीहा पीके नाम धर कर आ गया हो।भारत की मीडिया हमेशा एक व्यक्ति चुनने की कोशिश करती है।जिसे स्थापित करके अपने अनाप-शनाप काम करवा सके।बिलकुल उसी थीम पर 2017 के उत्तर प्रदेश के चुनाव के बाद भी कुछ ही लोगों की के द्वारा सफलता का श्रेय लेने का हड़पने का ऐसा प्रयास हो होने लगा।जैसे प्रबंधन या इसी के दम पर ही चुनाव जीते हैं।वह सबकुछ हडप लेना चाहते हैं।वह सब कुछ अपने दो-चार लोगों को जिम्मेवार बनाकर मजे लेना चाहते हैं।बिलकुल उसी तर्ज पर जैसे कांग्रेस के जमाने में होता रहा है।बेसिकली यह प्रवृत्ति कांग्रेसी सोच और जीवन-पद्दति से जन्मी है। वह धीरे-धीरे भारतीय राजनीति में ही व्याप्त हो गई है।

शायद उनको पता नहीं है की एक पार्टी की छवि बनने और सफ़लता की प्रक्रिया कार्यकर्ताओं के लंबे समय तक सतत प्रयास का परिणाम होती है।कार्यकर्ताओ के लगातार चिंतन और वैचारिक सक्रियता द्वारा एक पार्टी धरातल पर आती है।जनता कंपनी या कुछ चतुरों की जगह उनही चरित्रों को वोट देती है।वह निरंतर अपनी विचारधारा,अपने चरित्र,अपनी चाल से एक पार्टी की ब्रांडिंग करते हैं।उनकी समस्त शक्तियां उस पार्टी में अंदर तक निहित हो जाती है।यह कोई चुनाव प्रबंधन या अचानक की गतिविधियां नहीं तय करती कि आप सत्ता में आ जाए।आप जीते या हारे बेसिकली यह कालचक्र की शक्ति द्वारा निर्धारित होता है। कालचक्र किसी एक समय में, एक विचार में उस विचारों के समूह में अपनी शक्तिपात करता है।लेकिन कुछ अहम वादी उस संपूर्ण शक्तिपात को अपने व्यक्तिवादिता द्वारा भोग लेना चाहते हैं।उसका दुष्परिणाम जब समय बदलता है तो वह विचारधारा पिट जाती है।क्योकि कालचक्र परख करता है।यदि उसके साथ,उसके कारणों,उद्देश्यों,जरूरतों से विचारधारा से तालमेल नही बैठाया तो शक्ति खुद ब खुद नष्ट हो जाती है।इसलिए निर्णायक पोजिशन में बैठे लोग हमेशा ध्यान रखें कि युगों के बाद केवल एक बार ही ऐसी कृपा आती है।एक विचार,एक समूह के अंदर कालचक्र व चेतना सुनिश्चित उद्देश्यों को पूरा करवाने आती है,उस समय में अगर हमने उससे सन्तुलन नही बनाया,गलत दिशा में गये,निहित स्वार्थों से भरे फैसले लिए तो दोबारा नहीं मौके मिलते।अगर हमने कालचक्र के सभी एक्सेस के हिसाब से निर्णय लिया तो लक्ष्य पूरा करने के लिए लंबा समय मिल सकता है।जीतते या हारते कभी कुछ व्यक्ति नहीं है।जीतता-हारता हमेशा समूह, संगठन और विचार है।कुछ व्यक्ति कभी-कभी उस विचार की सफलता को जरूर हड़प-भोग लेते हैं और काबिज हो जाते हैं।इन व्यक्तियों से सावधान रहने की जरूरत है।क्योकि डेस्टिनी माफ़ नही करती है।देखना हो तो देश के कई नेता इस समय दिख जाएंगे।

Writer – Pawan Tripathi

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating / 5. Vote count:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: