गैंगेस्टरो का खात्मा करेंगे योगी-मोदी!

तकरीबन 15 साल पहले एक बार मैं गाड़ी की टंकी फुल कराने गया था। 36 लीटर की टंकी पूरे 45 लीटर पी गई।मैं आज तक नहीं जान पाया ऐसा कैसे हुआ।धीरे-धीरे सब पता लगने लगा।सबसे मजेदार बात जो पता चली की आज तक कोई भी चौपहिया-दुपहिया,तिपहिया ऐसा नही आया जिसमे हवाईजहाजो की तरह इग्जैक्ट ईंधन बता सके।उसमे तरह-तरह के ई-डिवाइस लगे किंतु कोई मोटर कंपनी अपनी टंकी मे तेल-मापक यंत्र नही लगाती।बड़ा रोचक तथ्य कई कंपनिया बाहर के देशो मे यह अपनी गाड़ियो मे यह फीचर देती है किंतु भारत मे नही।आप पेट्रोल पंप पर कभी जान नही पाये की कितना लीटर आपने खरीदा इसकी हर भर-सक कोशिश होती रही।अपने सामने ही हम देखते थे कि हमें कम तेल दिया जा रहा है,तड़प कर रह जाते।हमने कंप्लेंट किए और उसका उत्तर कभी कुछ नहीं आया।धीरे-धीरे उसे हम सब ने,पूरे समाज ने एक्सेप्ट कर लिया।रोज अपनी डकैती हमारे सामने घटती और हम कुछ नही कर पाते। एक ऐसी व्यवस्था,एक ऐसी मजबूरी जो आत्मा में समा गई।हम कुछ नहीं कर सकते क्योंकि जो बात छानबीन के बाद निकल कर आई वह बहुत बड़ी थी।यह प्रति लीटर 200 मिलीलीटर तेल जीवन रेखा है।ऊपर जाकर वह बहुत बड़ा आकार ले लेती है। हम अकेले होते हैं,नागरिक के तौर पर।किसको पता नहीं था कि सभी पेट्रोल पंप 1 लीटर के बदले 800 मिली लीटर तेल देते है। यह पिछले 25 साल से लगातार चल रहा था। कोई भी गाड़ी लेकर जाओ 36 लीटर की टंकी में 42 लीटर तक भर देते थे।चिप वगैरह तो बाद मे आ गया उससे फले भी कम तौलने का कोई न कोई तरीका निकाल ही लेते थे।जनता को पता था,दूर-दराज के एक-एक आदमी को पता था।गांव-देहात दूर दराज के सारे लोग जानते थे कि पेट्रोल पंप कम दे रहे हैं।पेट्रोलियम कंपनियो,प्रशासन,नाप-तौल विभाग,सप्लाई विभाग की मिलीभगत,हिस्सेदारी साफ-साफ दिखती थी।कितनी सरकारे आती और चली-जाती किसी के कानो पर जू नही रेगता था।लेकिन योगी के आने से पहले हजारों लाखों कंप्लेंट कहां चले जाते थे । आखिर कोई सरकार इस पर कार्यवाही क्यों नहीं करती थी।कितनी अंधेरगर्दी होगी आप कल्पना कर लीजिए और यह अंधेरगर्दी लगातार बर्दाश्त करते थे।ऐसा लगता था इसका कोई अंत नही होगा।

यह केवल प्रति लीटर/2 सौ मिलीलीटर की चोरी का मामला ही नहीं था।यह मामला था 20 हजार करोड़ रुपया महीना अवैध कमाई का।देश भर से 4 हजार करोड़ प्रति हफ्ते ऊपर तक जाता है,इसका एक नेटवर्क बना हुआ है।एक बड़ा सिंडिकेट काबिज है।यह 200 मिलीलीटर बढ़ते बढ़ते लाखों-करोड़ों खरबो लीटर में बदल जाता है।हजारों करोड़ के रूपये में बदल जाता है।जिसकी अपनी ताकत होती है।आप को स्वीकार करवा सकता है कि आप चोर हैं।आप अकेले या छोटे-मोटे संगठन के सहारे इस से लड़ नहीं सकते।आप इसका मुकाबला नहीं कर सकते।मारे जाएंगे।बहुत सारे लोग मारे गए।यह लगभग हर विभाग में मौजूद होता है।बस शकल और काम के तरीके बदल जाते है।लूट ही उद्देश्य है। लगभग हर क्षेत्र में, हर जिले ,हर गांव में होता है।स्थानीय राजनैतिक,सामाजिक,न्यायिक सारे अधिकारी मिले होते हैं।उनकी ताकत आपके सामान्य नागरिक की ताकत से काफी बढ़ जाती है।इस पर जैसे ही कोई कार्यवाही करने चलता,या तो ट्रांसफर हो जाता या मार दिया जाता।अभी कुछ दिनों पहले इसी वजह से आईआईएम के पूर्व छात्र और एक मशहूर पेट्रोलियल कंपनी के ईमानदार मैनेजर मंजूनाथ की हत्या हुई थी।तब लाख कोशिश के बाद भी भी कुछ नही हो पाया था।तब से कई और भी वीभत्स हत्याए भी हो चुकी है। बाद मे इस पर कई फिल्में भी बनी।नेताओ और राजनीतिक दलो मे से कोई आगे नहीं आया।फिर टाय-टाय फुस्स हो गया।भारता की जनता मन-मसोस कर रह गई।हमको याद है वीरप्पा मोइली ने कुछ साल पहले कहा था “पेट्रोलियम लॉबी इतनी ताकतवर है कि जब चाहे मंत्री बदलवा दे,किसी को मरवा दे तो भी कुछ न बिगड़ेगा।लंबे समय तक पूरे देश की जनता से इसी प्रकार से जबर्दस्ती उगाही की जाती रही है।यह 20 हजार करोड़ महीने की अवैध रकम भला क्या कुछ नही कर सकती थी!पूरे देश में साल के अंत के 3 लाख करोड रुपए सालाना हो जाता है।इस सीधी लूट की कमाई को ऊपर तक,ऊपर तक काफी ऊपर तक इस पैसे से बहुत कुछ मैनेज होता है।केवल पेट्रोल पंप मालिक शामिल नहीं है।पेट्रोल पंप मालिको के अलावा इस घटतौली मे कंपनी के लोग,स्थानीय अधिकारी,सप्लाई ऑफिसर और स्थानीय प्रशासन सबके अपने हिस्से रहे हैं।स्वाभाविक है सब मिल जुलकर मामले को दबाने मे लग जाते है।यदि कार्रवाई करनी ही है तो केवल मशीने सीज करने से कुछ नही होगा।यह एक आपराधिक गतिविधि है।मशीनों नही आदमियो की जिम्मेदारिया तय होनी चाहिए।उनपर कठोर सजा मिलनी चाहिए।अन्य विभागीय अधिकारी/कर्मचारी इसपर वेतन उठा रहे थे।अपने कर्तव्य का पालन न करके आपराधिक लूट मे शामिल थे उन पर आईपीसी की धाराओ के तहत कार्रवाई होनी चाहिए ।नही तो कुछ दिनो की लीपापोती के बाद यह फिर शुरू हो जाएगा।

समोसा,मिठाई खा रहे होते है,दूध खरीद रहे होते है आपको पक्की तौर पर मालूम होता है,नकली है,मिलावटी है आप क्या कर लेते है।आपने इसके लिए टैक्स दिया ही है एक फूड-इंस्पेक्टर रखने के लिए,वह अपना काम किसलिए करता है।तनख़्वाह के अलावा एक बड़ी रकम उसे इकट्ठा करना होता है।आप उस मिलावट की कीमत दुतरफा चुका रहे है।सड़क के जाम किसकी वजह से लगे होते है कभी ध्यान दीजिएगा।ओवरलोडेड वाहन कौन चेक करता है,घटिया-पुराने पब्लिक-वैहिकल्स को कौन सवारिया ढुलवाता है,कौन 7 सीटर परमिशन के बावजूद उन वाहनो मे भूसे की तरह 14-15 सवारिया ठुसवाता है।यह केवल एक विभाग का मामला नही है।पूरे सिस्टम का मामला है।प्रशासन,बिजली-पानी और घर के अंदर की बातो को तो छोड़ ही दीजिये जैसे ही बाहर निकलते है।यह प्रदूषित हवा रोकने के लिए भी एक विभाग मौजूद है।वह क्या करता है खुद सर्च करिए।कहीं भी सावधानी से नजर दौड़एंगे आपको मोटी-मोटी रकमे दौड़टी-तैरती नजर आएंगी।तेल,दाना-पानी,बिजली,टैक्स,सुरक्षा,शिक्षा,दीक्षा,जमीन,सड्क,आसमान,पुलिसिंग,न्याय,हवा,पानी जहां तक नजर दौड़ाएंगे सब तरफ से सरकारी मशीनरी मौजूद है,उसका नियंत्रण है पर वह उसे नियंत्रण का बेजा लाभ उठा रही है।बड़े बाबू से बच पाना मुश्किल है।बड़े बाबू की निष्ठाएं व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षा और घनघोर आर्थिक स्वार्थ में निहित है।

ऊपर तक पहुँचते-पहुँचते यह छोटी-छोटी राशिया कई हजार करोड़ की मुद्रा पर पहुँच जाता है।यह इतना बड़ा आंकड़ा है कि साधारण व्यक्ति उसकी कल्पना भी नही कर सकता है।उस भ्रष्टाचार/कदाचार से एक बड़ी अवैध मशीनरी भी डेवलप हो रही होती है।उसने इन सत्तर सालो मे अपनी गहरी जड़े जमा ली है।इन सालो मे पली-बढ़ी अवैध मशीनरी खुद मे ही एक ताकत बन चुकी है।ऊपर जाकर यह लाबिस्ट के रूप मे विकसित हो गया है।पोलिटकल साइंस का एक गज़ब सा सिद्धांत है पैसा अंत मे राजनीतिक नियंत्रण हासिल कर ही लेता है।प्रजातांत्रिक भारत की बेसिक समस्या का यह है कि मशीनरी का सेल्फ नियंत्रण है।चूकी मशीनरी की आदते,आचरण,कार्यव्यवहार स्वयंभू बनाई जा चुकी है इसलिए कोई भी पवित्र-ईमानदार-सोच वाली सरकार इसको कंट्रोल न कर सकेगी।जैसे ही उन्हे प्रतिकूलता दिखेगी वे या तो निष्क्रिय हो जाएँगे,और कुछ दिनो बाद उस सरकार के नुमाइन्दो मे ही चारित्रिक बदलाव करने की कोशिश करेंगे,उन्हे भ्रष्ट या फिर सुविधाभोगी मे बदल देंगे या फिर असन्तोष का जनमत तैयार करने मे लग जाएंगे।

आम जनता तो छोड़िए यह सिंडिकेट सरकारों पर भी ताकतवर होते चले जाते है।विदेशो मे इस तरह के अवैध सिंडिकेटों पर नकेल डालने की कोशिश होती है,मैक्सिमम को सजा मिल ही जाती है।भारतवर्ष में नहीं है।यहां कोई भी अवैध ग्रुप-गुट बना लिया,और सरकारो मे लाबिंग शुरू कर दी,कुछ ही दिन मे माल निकलने लगता है।सब चलता है।यह सफेदपोश गिरोह मोटे-मोटे रकमो से/के लिए एकदूसरे की कमाई का संरक्षण करते हैं।खरबो-खरब रुपए निकलते हैं। उनमें बंट जाते हैं।यह माफियाओं से कही ज्यादा ताकतवर होते हैं। वह मरवा सकते हैं।वह उठवा सकते हैं और लूट सकते हैं।वह सीधे सीधे लोकतंत्र का हरण कर सकते हैं।कई बार तो राजनीतिक पार्टियों से भी ज्यादा ताकतवर होते हैं।इन्हीं अवैध लाबियो मे सेे घरेलू,परिवारवादी पार्टियां भी जन्मती है।उन्होंने देश को,देश की जड़ो को खोखला कर डाला है।लोकतंत्र को काफी गहराई से नुकसान पाहुचाया है।ध्यान से देखें तो दिखेगा। यह जो परिवारवादी नेता हैं यह कहां से जनमे और इनके पीछे की ताकत कहां है यह भी दिखने लगेगा।कुछ सिंडीकेट तो आईएएस के अलावा उच्च-पदस्थ अधिकारियों को भी अपने गिरोह मे मिला लेते हैं।जजों को भी साथ कर लेते हैं,नेता,पुलिस,पत्रकारों के साथ मिलकर के सिंडिकेट बना लेते हैं।यह विशुद्ध आपराधिक गिरोह जैसा ही काम करते-कराते हैं।परंतु हमारे देश मे इस पर नकेल डालने वाला कोई कानून नही है।वह उस पूरी फील्ड में मोनोपोली बनाने लगते हैं।एक बड़ी रकम निकल ही आती है फिर वह सिस्टम को कंट्रोल कर ही लेते हैं।वह रकम कोई हजार,लाख तक में सीमित नहीं होती वह हजारों करोड़ में होती है बंटवारा होता है। वह रकमें अपने में ही ताकत पैदा कर लेती हैं।उन से टकराने की हिम्मत कोई नहीं कर पाता।कोई ईमानदार पुलिसिंग या सामाजिक सक्रियता दिखी भी तो वह जल्दी ही समाप्त हो जाती है।क्योकि वह एक माफिया जैसा बर्ताव करते हैं।1-पेट्रोल लाबी,2-सेना-सप्लाय लाबी,3-दवा लाबी,4-खाद्य लाबी,5-रेल लाबी,6-उद्योग नीति निर्धारण लाबी,7-विदेश व्यापार नीती लाबी,8-कृषि लाबी,9-इधर के 15 वर्षो में एक नई लाबी भी पनपी है शिक्षा लाबी,10-टेली उद्योग यानी आईटी लाबी,खनिज लाबी,12-टैक्स कारोबार-भारत में टैक्स चोरी करवाना सबसे बड़े कारोबार के रूप में स्थापित है।बैकिंग लाबी को हमने जान बूझ कर छोड़ दिया है।क्योंकी वह अंतहीन है।उसकी मारक क्षमता कहां तक है इसका अंदाजा सरकार ही लगा सकती है।अन्य छोटे-मोटे गिरोह बाजो को हमने देखने की भी जरूरत नही समझी है वह तो हर साल बनते बिगड़ते रहते हैं।प्रत्येक लाबी के कुछ अघोषित नियम है।उन नियमों पर काम करने की जरूरत है। यदि नियम समझ में आ गये तो जल्द ही आप भी लाभ में होंगे।राज्यों मे तो एक सशक्त ट्रांसफर-पोस्टिंग लाबी भी मौजूद होती है।आप चाहे तो स्टेट लेबिल भी इन लाबियो की सूची बना सकते है।

जब कभी बहुत सारे स्वार्थी लोग मिलकर आर्थिक हितो के लिए एक टीम बना लेते हैं।जनता खुद कमजोर पड़ जाती है।एक विभाग पकड़ा,स्थानीय पुलिसिंग को,पत्रकारों में से कुछ को पकड़ा,नेताओं का संरक्षण लिया,एक-आध व्यूरोक्रेट मिल ही जाते हैं।बन गया गिरोह।लोकतंत्र ,गया तेल लेने।पूरी दुनिया में सिंडिकेट गिरोह बनाने पर कानून हैं।अमेरिका में इस पर कडा कानून है,इंग्लैण्ड,फ्रांस,जर्मनी,इटली,रूस में भी कठोर कानून है,ऑस्ट्रेलिया तक में कानून है ,और तो छोड़िए अरेबिक और मुस्लिम देशों में भी इस
तरह गिरोहबंदी,माफियागीरी के खिलाफ कानून है।कई देशो मे जजो और अति-संवेदन-शील अधिकारियों का पद-निर्वहन के दौरान सामाजिक मिलन-जुलन पर प्रतिबन्ध है।उनसे लिखित अपेक्षा की जाती है “आप सिंडिकेट बना कर के,अवैध गिरोह बना करके, एक दूसरे का संरक्षण नहीं देंगे।,यहां तक कि विभागों में भी गिरोह या टीम बनाने पर रोक है।वह सिंडिकेट के खिलाफ कार्यवाही नहीं करते जेल डाल देते हैं।वहां पर बहुत कठोर कानून है।उनको मालूम है’अगर गिरोहबंदी हो गई,एक-दूसरे आर्थिक-कारोबारी संपर्क मिल गए, आर्थिक नाकाबंदी कर लिए गये तो फिर डेमोक्रेसी का कूड़ा ही होना है।आम जनता बर्बाद ही होनी है।इसलिए वे सजग रहते है।यूरोपियन अमेरिकन सिस्टम इस पर इंटलिजेंस करवाता है।नजर रखता है।बिलकुल आतंकी गतिविधियो वाले तर्ज पर वे खूफ़िया विभाग बनाते है।भारत में इस तरह खुलकर के कुछ नहीं है।इस मामले मे हमारा लोकतन्त्र अभी अपरिपक्व जैसा दिखता है।वैसे भारत मे भी बहुत साल तक ऊपरी स्तर के जजो के सामाजिक गतिवधियों मे खुले रूप मे शिरकत न करने की परंपरा थी।इधर बहुत कुछ तेजी से बदल गया है।

इस विषय पर पश्चिमी समाज और ओपिनियन मेकर इंडस्ट्री कितनी सजग है।इसको जानने के लिए जब उनके साहित्य या पत्रकारिता पर नजर दौड़ाएंगे तो हजारो टन मैटीरियल मिलेगा।मुझे 1 हजार से अधिक किताबों का संदर्ब मिला।इसके लिए हालीवुड फिल्मे देखे,आपको मजा न आ जाए तो कहिएगा। परंतु ध्यान रखे कि अमेरिकन फ़िल्मकारों की समस्या यह है की वे “समस्या का ही महिमंडन कर डालते है।मारिया पूजो के उपन्यास पर बेस्ड ‘गाड-फादर, की कुल तीन फिल्मों की सीरीज आई थी।1931 मे आई पब्लिक एनिमी,एंजेल्स विथ डर्टी फेसेज़(1938)देखिएगा,वह काफी हद तक आज के भारतीय समाज का और नेतागीरी को दिखाती है।2009 मे आई सुपरहिट फिल्म “पब्लिक एनिमीज,भी पूरा मजा देगी।2007 मे आई फिल्म अमेरिकन गैंगेस्टर हालाकी अपराध पर आधारित है परंतु पीछे के नेताओ को भी दिखाती है।द अनटचबल 1987,बोनी एंड क्लाइड 1967,मौजे तो गेट-कार्टर भी बहुत पसंद है।2012 मे आई फिल्म ‘ला-लेस,का अंत भी एक खास जगह ले जाती है।जिसमे आपको अंदाजा लगता है की जब कानून गठजोड़ कर लेता है तो आप अपने नागरिकों को जल्दी-जल्दी अपराधी बनाते है।बैटल विधाउट आनर एंड हयूमिनिटी (1973) व्हाइट हीट(1949) हीट(1995)वायर(2002 TV Series)ब्लो (2001)सिंडीकेट,कैसीनो,सिटी आफ मेन,अमेरिकन मी,गोत्ती आदि-आदि वैसे तो फिल्मे है।लेकिन भारत मे सत्तर साल मे बने सिंडीकेट और उसकी ताकत की झलके देती है।फिलहाल यह फिल्मे है इससे ज्यादा कुछ नही लेकिन हमारे यहाँ यह सब हकीकत मे है।इसे कांग्रेसियों ने इन सत्तर सालो मे बाकायदा प्लान बनाकर विकसित किया है।बल्कि हमारे यहाँ के गिरोहो की जड़े फिल्मी विलेनो से कही ज्यादा गहरी और घातक है।उनसे कोई हीरो नही केवल राजनीतिक इच्छा-शक्तियाँ ही मुक्त करा सकती है।

कभी कोई इनसे मुकाबला करने नहीं आता।सरकारों में मुकाबला करने की क्षमता और घट जाती है,क्योकि उनकी रिक्वायरमेंट बढ़ जाती है।वह ऐसे मामले मे हिस्सेदार बन कर ज्यादा माल काटने की प्रवृत्ति से भरे होते है।वे तो बढ़ावा देने मे ही लग जाते है।इस ग्रुप से कोई मुकाबला नहीं कर सकता, लोकतंत्र की मजबूरियां होती हैं, वह धीरे-धीरे एक्सेप्टेंस करा देता है ,वह धीरे-धीरे स्वीकार करा देता है कि एक लीटर पेट्रोल मे से 200 मिलीलीटर आप को चुरवाना ही है।200 मिलीलीटर का एक्स्ट्रा पैसा देना ही है।उसकी ताकत एकल व्यक्ति की ताकत से, एकल नागरिक की ताकत से कई गुना ज्यादा होती है।आप उसे अपनी आंखों देखी मक्खी की तरह निगलते हैं और रोज निगलते हैं।धीरे-धीरे सरकार की मिलीभगत चोरी को अधिकार मे बदल देती है।वह कार्यवाही नहीं करती,उनके लोग मिले होते हैं। इसी तर्ज पर नोटबंदी मोदी का मनोबल था, उसने मुकाबला किया उसने नीचे तक मुकाबला किया और किसी तरह नहीं माना। लेकिन यह जो अवैध पेट्रोलियम की घटती है उसके लिए योगी का यह पहला वार था। लेकिन किसी के घर में चोरी होती है तो चोर के पकड़े जाने पर जो सजा होती है।वही सजा इन सभी चोरो को भी देनी चाहिए।परन्तु कठोर सजा देने तक कोई नही लड़ पाता,लोग बिक जाते है, ढीले पड़ जाते है या उनके शक्तियों के सामने कमजोर हो जाते है।क्योकि यह सामाजिक मामले होते है तो लम्बे समय तक इसे कोई आंदोलन के रूप के भी नही लेता है।अगर लेना भी चाहे तो व्यक्तिगत फायदे नही दीखते।जबकि गिरोह को व्यक्तिगत रूप से मोटा आर्थिक लाभ मिल/दिख रहा होता है।

आजादी के बाद उप्र मे इस पर योगी ने पहला प्रहार किया है।अचानक कहीं छटपटाहट मच गई है।ऊपर तक खलबली मच गई है।पेट्रोलियम कंपनियां,केन्द्रीय नेटवर्क, सिंडीकेट ऊपर तक हड़बड़ा गया है।अब समस्या यह है की एक प्रदेश मे कार्रवाई होगी तो देश भर मे मांग उठेगी।मोटी रकम और मोटे मगर-मछ दोनों दबाव मे है। वह सरकार पर दबाव बना रहे हैं।संगठन पर दबाव बना रहे हैं ।वे सब एक दम से एक्टिव हो गए हैं।पेट्रोल पंपों का हड़ताल चोरी और सीना-जोरी की कहानी कह रहा था।अगले दिन ही सरकार ने प्रदेश के सभी पेट्रोल पंपो की पकड़ी गई मशीनो को सीज करने का अधिकार दे दिया।अन्य कार्रवाइयों के लिए शासन के पास रिपोर्ट मँगवाने का आदेश दे दिया।हालाकी योगी पर बहुत दबाव पड़ा लेकिन वे नही झुके।नही तो छापा करने वाली टीम को पूरे अधिकार नही देते।घटतौली करने वाले सभी मालिको और वहां कार्यरत कर्मचारियों पर गिरफ्तारी का आदेश भी है।मोदी-योगी जी से कुछ ऐसी ही उम्मीदें भी हैं।वह आगे आए और इन सिंडिकेट,इस गिरोह को तोड़ दें,इन लोगों को खत्म करें।इस देश की असली समस्या हैं।

कुल मिलाकर योगी सरकार का यह बड़ा फैसला था, जो नोटबंदी की तरह ही प्रभावी और अंतिम जड़ों तक वार करने वाला था।लेकिन पूरी सिंडिकेट और मशीनरी अचानक एक्टिव हो गई है। वह किसी तरह उसको रोक देना चाहती है।मुझे लगता है कि योगी,मोदी दोनों ही बिलकुल नहीं चाहेंगे कि अब जमाखोर, मिलावटखोर सामूहिक चोरी करने वाली सिंडिकेट विभिन्न स्तरों पर बन गए अवैध गिरोह बने रहे।इन मिलावट-खोरों,जमाखोरो,कमीशन खोरों के खिलाफ दोनों ही कार्रवाई करना चाहते है।परंतु भ्रष्ट तत्व रुकावटे दाल रहे है।योगी कार्यवाही कर रहे हैं।अब गन्ना किसानों की घटतौली,जमाखोरों,गोदामबाजो,गेहूं किसानों के गेहूं-धान किसानों के घटतौली सब पर उनको कड़ा शिकंजा करना होगा। वह जमकर कसे। केवल शिकंजा कसने से ही काम नहीं चलने वाला। जिन अधिकारियों पुलिस विभाग के लोगों ने, सप्लाई विभाग के लोगों ने और समाज के लोगों की मिलीभगत पकड़ी गई है,उनको सजा दिलाने तक सक्रिय रहकर उन सभी की जिम्मेदारियां तय करते हुए जेल भेजना होगा।मामला अनंत कल के लिए न लटक जाए इसलिए प्रयत्नपूर्वक न्यायालयों से इन पर जल्द से जल्द निर्णय सुनाने पर ज़ोर देना चाहिए।विश्वास मानिए जैसे ही सौ-पाँच सौ लोगो को कारावास की सजा हुई अपने आप नियंत्रण मे आ जाएगा।जन-विश्वास की बहाली के लिए मोदी-योगी को यह करना ही होगा।

कानूनी कार्यवाही के दौरान भी कई बार वे चतुराई-पूर्वक कमजोर धाराएं लगवा देते हैं।कोशिश करके सरकारी पक्ष कमजोर पैरवी करते हैं।परिणाम यह होता है की जल्द ही यह सफेदपोश सामान्य-जन पर रौब गालिब करता हुआ दिखता है।इससे जनता का विश्वास सरकार से कम होता है।उसे लगने लगता है की कभी कुछ नही हो सकता।इसलिए एक सीधी व्यवस्था विकसित करनी होगी।यह नहीं होना चाहिए जिम्मेदारियों को तय करते समय सारे अधिकारियों, समाज ,सरकार के घटकों गिरोह के सदस्यों को चिन्हित करके उन के ऊपर उनका साथ देने वाले लोगों तक का समूल नाश करने का प्रयत्न करना चाहिए।यह बड़ा उपकार करने वाला काम होगा।यूरोपियन तर्ज पर इस-पर खूफिया एजेंसियो का निर्माण भी करना चाहिए।जो केवल इस तरह की गिरोहबंदी पर ही नजर रखे।यह सारे कदम समाज को विकास के परम पर ले जायेंगे।ध्यान रहे अगर तनिक भी कमजोर पड़े तो वह लोग मिलकर कचूमर भी निकाल लेंगे।उनमें से कमजोर कड़ी खोज लेते हैं।उस कमजोर कमजोर कड़ी के सहारे ही यह ऊपर क्रिमिनल तक पहुंच जाते हैं।वर्तमान सरकार को ईमानदारी,सतर्कता व विजिलेन्स से केवल 4 महीने का सक्रिय योगदान करने की जरूरत है।उसके बाद चीजे खुद परवान चढ़ने लगेंगी।हर विभाग के ऐसे सिंडिकेट,ऐसे गैर जिम्मेदार, जनता को लगातार लूटने वाले व्यक्तियों,गिरोहों पर कड़ी दंडात्मक कार्यवाही हो जाए।उन्हें कानून के शिकंजे में लेकर सजा दिलाने तक एक्टिव रहकर समाज को मुक्त कराने का प्रयास किया जाए ,तो निश्चित ही देश प्रदेश की जनता योगी-मोदी के प्रति कृतज्ञ रहेगी।नहीं तो परिवार वादी, घरेलू पार्टियां,जेबी पार्टियां और कंपनी-नुमा राजनीतिक दल इन्हें अपनी कमाई का जरिया बनाए रखने के लिए प्रयत्नशील रहेंगे।यह सभी गिरोह उनके ही संरक्षण में पनपे थे।वह कभी जनता को इन से मुक्त नहीं होने देंगे।मोदी और योगी की सरकार है,दोनों ही त्यागी-सन्यासी है।इस समय सारे लूट-खसोट,गलत रिवाजों,गिरोहबंदी,लाबिंग को,सिंडिकेट को,वे खत्म कर सकते है।यह एक अनुकूल समय आ गया है।अगर आज नही हुआ तो कभी नही होगा।समाज के अन्यान्य घटकों को भी आगे आकर FIR कराना चाहिए।उनका तब तक पीछा करना चाहिए ,उनको तब तक लपेटना चाहिए जब तक कि यह सिंडिकेट गिरोह समाप्त ना हो जाए,कई बड़े मगरमच्छ एक जब जेल की सीखचों के भी पीछे होंगे तो कानून व्यवस्था का राज कायम होगा।देश भर मे इसी का अनुकरण होने लगेगा।

 Writer- Pawan Tripathi

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