तू डाल-डाल वे पात-पात

मोदी ने कहा रिश्तेदारों/भाई/भतीजो को सत्ता से दूर रखो तो मंत्रियों ने मॉल काटने का नया रास्ता निकाल लिया।अमूमन देखने में आया है। सत्ता में पहुंच गए भाजपाई पदाधिकारी या मंत्री विभाग बाहरियों को प्रश्रय देते दिखते हैं।उन्हें प्रशिक्षित स्वयंसेवक,भाजपा या संबंधित संगठनों का पुराना कार्यकर्ता सरकार या मुनाफे वाली जगह के लिए पसंद नहीं आता। प्रायःयह भी देखा गया है कि वह कार्यकर्ताओं से मिलेंगे,खूब अच्छे से चाय पिलायेंगे,खाना खिलाएंगे,बहुत अच्छा व्यवहार करेंगे,हा हहुहु करेंगे, लेकिन कमाऊ स्थानों पर उन्हें कतई न पहुंचने देंगे।पुराने जमे हुए कांग्रेसी,सपाई, बसपाई और अधिकतर मुसलमान है।उनको यही पसन्द है।उन ठेके पट्टे,सप्लाई ,दूकान,मकान,पदो पर, तमाम तरह के वर्क परमिट, तमाम तरह के इलेक्शन और काम धंधे वाली पैसा पैदा करने वाली जगहों पर वह कार्यकर्ताओं को कतई नहीं पहुंचने देते।बाकायदा इसके लिए पूरा जतन करते है।उनके इर्द गिर्द बाहरी लोग लोगों का जमावड़ा है।यह जमावड़ा अमूमन रात के अंधेरे में होता है।दिन के उजाले में नहीं।दिन के उजाले में उनके आसपास तो कार्यकर्ता दिखते हैं या वह कोशिश करके यह दर्शाते हैं। लेकिन रात में वही सपाई ,बसपाई ,कांग्रेसी ,जमाने के कार्यकर्ता जम जाते है। यह दिल्ली और लखनऊ दोनों के मंत्रिपद-धारित लोगों के आस पास है।दिल्ली में लुटियंस का जमावड़ा है लखनऊ में भी पुराने लोग ही काबिज किये जा रहे है।कोई देखने-सुनने वाला नही है।

हमने सूची बनाई है।नए/पुराने ठेको,कमीशन वाली जगहों का यही हाल है।लगभग हर विभाग में 80 प्रतिशत काम उन्ही को मिल रहा है।उनकी पहुच कितनी गहरी है इससे अंदाजा लगा सकते है कि बाकायदा नियमावली /बीट्स/शर्ते ही इस तरह बनाई जाती है कि कार्यकर्ता उसमे सेट न हो। विज्ञापन इस तरह डिजाइन करवा ले जाते हैं कि उनके बाहरी चहेतों(माल देने वालों) को ही काम मिले।दिल्ली के सभी विभागों का यही हाल है।रेल,उड्डयन,भूतल परिवहन,और पेट्रोलियम तो आमादा ही है वित्त मंत्रालय की तो जैसे कार्यकर्ताओ से घनघोर दुश्मनी हो।
केंद्र और राज्य दोनों ही एक रास्ते पर हैं।लगभग हर विभाग में जो पुराने काम है। जो नए काम है उनमें भी यह बाहरी लोग स्थापित किये जा रहे हैं।उनमें पुराने कांग्रेसी स्टेप लिस्ट कार्यकर्ताओं को भी या मुस्लिमों को दिए जा रहे। जिनका संघ से संबंधित संगठनों के किसी भी व्यक्ति से कोई लेना देना नहीं है । अथवा उन्होंने नए तरीके से इधर संपर्क बना लिया हो तो मैं नहीं कह सकता उन्हीं लोगों को किसी न किसी तकनीकी तौर पर काम ऐलान कर दिया गया है। यह कार्यकर्ताओं को हतोत्साहित करने वाला होता है । लेकिन समस्या यह है की पदों पर पहुंच गए पुराने भाजपाई नेताओं का यह हाल क्यों है। वह ऐसा क्यों करते हैं । इसको समझना बहुत आसान है।उन कारणों का विश्लेषण करिए तो अजीब बात निकल कर के आती है।

नंबर 1-बाहरी लोगों को रात में पैसे का बंटवारा करना आसान होता है। और बदनामी भी नहीं होती कार्यकर्ता और स्वयंसेवक के साथ यह संभव नहीं है।
नंबर-2-पहाड़ियों के साथ डील करना आसान होता है। वह मनचाहा आदर देते हैं। सम्मान भी देते हैं। और उन्हें काम करना आता है।
नंबर 3- बाहरी आपको संसाधन अवेलेबल कराने में आपकी तरह तरह की मनसा पूरित करने में ज्यादा सक्षम होते हैं। और उनसे आप लड़की से लेकर के धन-दौलत, रुपया,बंगला,कार सब मांग सकते हैं और वह देते भी हैं।
नंबर 4-कार्यकर्ता व्यर्थ ही बराबरी का व्यवहार करता है। यह व्यवहार सत्ता में पहुंच गए नेताजी को पसंद नहीं आता तो वह उसे दूर करने में ही फायदा समझते हैं।
नंबर 5- महत्वाकांक्षी संघर्ष-कार्यकर्ता धन-संपन्न और विचारों की पकड़ वाला होगा तो आप से आगे बढ़ सकता है। तो उसे कतई स्टैब्लिश ना होने दो।
नंबर 6- रुपए का आबाध प्राप्ति,बिना किसी रिस्क के।
नंबर 7- संगठन और विभिन्न अनुषंगी लोगों में इमानदार छवि बनी रहती है। जबकि माल खुद काट रहे होते हैं।,कार्यकर्ताओं से हमेशा डर बना रहता है।अगर कैडर पैसा देंगे तो पूरे संगठन को पता लग जाएगा।एक तो पैसा ही नहीं देंगे यदि दिया तो सभी के बीच खबर चली जाएगी।बिना पैसे का कोई काम करने की आदत तो है नहीं है।
नंबर 9- संगठन पर सीधी पकड़ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि ज्यादातर लोगों के काम ना हो काम हुआ भी तो किसी ऐसे माध्यम से हो जिससे किसी बड़े को ओब्लाउज किया जा सके। कार्यकर्ता को सीधे फायदा पहुचाने का कोई फायदा नहीं दिखता।
नंबर 10 -कार्यकर्ता और स्वयं से हमेशा संगठन के काम में रहते हैं। सन्गठन हित-राष्ट्र हित उसके लिए आवश्यक होता है। व्यक्तिगत काम में लग नहीं पाते। व्यक्तिगत गिरोहबंदी में प्रशिक्षत कार्यकर्ता सहयोगी नहीं होता।बाहरी हमेशा अपना स्टाइलिश शुरू प्ले कर के तमाम अनाप-शनाप गंदे कृत्य भी कर लेता है।उसका लाभ उठाने के लिए बाहरियों को प्रश्रय देना आसान है।संगठन के मदद से सत्ता में तो पहुंच सकते हैं,माल हमेशा बाहरियों के मदद से काटा जाता है। इसलिए टेक्निकल बीड बनाकर के बाहरियों को ठेके दो,सप्लाई का काम दो, लाभ वाले पदों पर नियुक्त करवाओ और उसमें से बड़ा हिस्सा लेकर डकार लो।सन्गठन को भनक भी न लगने दो। संगठन को पता भी नहीं लगेगा इमानदार भी बने रहोगे।
अकेले बेचारा क्या कर लेगा मोदी।

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