कल रात का भयानक स्वप्न

बीच चौराहे पर मजमा लगा हुआ था..!!! भीड़ अक्सर उत्सुक्ता जगाती है.!! मै भी किसी तरह धक्का-मुक्की करते हुए भीड़ के बनाए घेरे के केन्द्र मे पहुंचना चाहता था..!!

आखिर हो क्या रहा है..??

काफी मसक्कत के बाद जब वहां पहुंचा तो देखा कि एक बंदा बड़ी बेरहमी से किसी भले इन्सान को कॉलर से पकड़ कर खुरदुरी सड़क पर घसीटे जा रहा था..!!

हे राम…

पब्लिक फिर भी तालीयां पीट रही थी..ऐसा लग रहा था जैसे ये हिन्दुस्तान ना हो..इजिप्ट का “तहरीर चौक” हो..!!

पीछे एक पहलवान सा दिखने वाला बंदा, एक गंजा और वैस्ट-इंडिज का कोई नागरिक सा दिखने वाला..तीनो छाती कूटते , चले जा रहे थे..!!

हाय..हमाए मालिक ने कछु ना करो..यो नासपिटो..हमाए मालिक ने घसीट-घसीट ही माअ डारेगो..!!!

रै कोई तो बचावो…

एक बात अजीब थी..भरी गरमी मे भी उस गरीब ने मफलर बांध रखा था..!! जैसे रेल्वे स्टेशनो पर अक्सर कोई मानसिक विक्षिप्त भरी दोपहरी मे भी कंबल ओढ़े रहता है..!!

मुझसे ये तकलीफ ना देखी गई..मैने बड़ी हिम्मत जुटाकर, उस वहसी, खुंखार दिखने वाले बंदे से घसीटने का कारण पूछ ही लिया..!!

बात कुछ ना भाई साहब..आधी रात ने..मुने बुला कर पूरे दो करोड़ के नोट गिनवाए इस हरामखोर ने..और बाद मे GPL कर दियो…पाणी ना पूछा..!!

इससे पैले भी हमारे बड़े भाई साहब ..जो दरजे के हरामी थे..उनको भी ऐसो ही हाल कर दियो थो..!!

जब पूछो तो …कागद को पुलिंदा हाथ मे लहरा के कै दे…जे रहो सबूत..!!

आज मेरे कनै भी ढेर कागद धरां हैं याकी सबरी कारिस्तानी का…नंगी वाली विडियो भी धरी ..

याय तो घसीट-घसीट मारूंगो ..आज..!!

सबका बदला लेगा .. भाईसाहब का ये “कैपल”

उस गरीब के पिछवाड़े से लत्ते का एक लीरा भी नहीं बचा..जो था वो बस आगे के सामान को ढकने लिए था..ऊपर से जेठ की दुपहरी मे सड़क भी तप कर तवे सी हो रखी थी..!!

रहण दियो भाई साहब…दया करो गरीब पे..

मैने एक बार फिर फरियाद दोहराई..!!

आप बीच मे ना पड़ो जी..

तभी मौका लगते ही.. मफलर बंधा वो बंदा सरपट दौड़ लगाने लगा.. पीछे-पीछे वो खुंखार..हाथ मे झोला लिये…

कागद के पुलिंदे ..हवा मे उड़ते चले जा रहे थे…और वो तीने कारिन्दे.. बेतहाशा उन कागदों को इकठ्ठा करने मे जुट पड़े..!!

Pawan Acharya

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