मै हुनरमंद हूं बड़े से “आचार्य” सरनेम के साथ

कॉलेज से निकलने के बाद, बेरोजगारी का साया मुझ पर भी छाया था..!! मैने भी आठ-दस सरकारी नौकरियों के फार्म भर दिये थे..!! अधिकतर उसमें RRB के थे, कोई RRB गौरखपुर, RRB सिकंदराबाद, RRB अजमेर..और भी कई..!! एग्जाम देने जाओ तो घर वालों से पैसे मांगो, टिकट के, रहने खाने पीने के..!!

पहली बार लखनऊ गया तो देखा , ट्रेन मे वही एग्जाम देने वाले खचाखच भरे हुए थे..!! तब मुझे पहली बार पता चला कि इनको रेल्वे बोर्ड, फ्री टिकट मुहैया करवाता है, सौ की पत्ती जेब मे डाली और चले एग्जाम देने..!! घूमने का घूमना हो जायेगा..पास हो गये तो सरकारी नौकरी..!!

वैसे भी उनका कोटा ज्यादा होता था..!! तो उनके सैलेक्ट होने की प्रयिकता अत्यधिक थी बनिस्बत उसके, जिसके नाम के पीछे प्रकांड पंडित वाला बड़ा सा “आचार्य” लगा हो..!!

खैर..पापा ने ये बात मुझसे बहुत-बहुत पहले भांप ली थी..एक दिन मुझे बिठा कर कायदे से अपने सरनेम के बारे मे समझा दिया..!! क्या करता है सारा दिन टीवी देखता है..शाम को टैंपो पकड़ कर यमुना किनारे जाकर बैठ जाता है..!!

कुछ सीखना चाहता है तो मै तेरी हैल्प करूं..??

मैने तपाक से हां बोल दिया…खाली बैठे मेरे दिमाग मे भी, शैतान ने कन्सट्रक्शन शुरु कर दिया था..!!

मथुरा रिफाईनरी मे पापा ने एक छोटी सी पेटी-कॉन्ट्रेक्ट की कंपनी..“अमृत स्ट्रक्चर निर्माण” (ASN)जो कि पंजाब की कंपनी थी, उसमे मेरे लिये वॉलन्टियर वर्कर के लिये बात कर ली..!!

लड़के को हाथ चलाना सिखाओ..पैसा कुछ नहीं चैये..!!

ASN मे आठ-दस सरदार भाई वर्कर थे..एक फोरमैन और एक मालिक का बेटा..!!

“सल्फर ट्रीटमेंट प्लांट” को रिफर्बिस करने का ठेका मिला था उनके..!! उस समय वो लोग एक चिमनी मे फिल्टर इंस्टॉलेशन का काम कर रहे थे..चिमनी की हाईट होगी.. लगभग चालीस मीटर..!!

सुबह नो बजे सेफ्टी-बैल्ट बांधकर..खाने का डब्बा, पानी की बोतल लेकर, टट्टी-पेसाब करके ऊपर चढ़ो…क्योंकि फिर चार-छ: घंटे तक नीचे आने का तो सवाल ही नहीं..!!

मुझे ये पहले दिन ही भयंकर , रोमांच पैदा करने वाला लगा..!!

ऊपर पहुंच कर मुझे प्लेटफॉर्म पर एक हाथ मे बड़ी सी टॉर्च पकड़ा कर बिठा दिया गया..!! चार बंदे,चिमनी के अंदर लटक कर बड़ी सी स्टेनलैस स्टील की फिल्टर प्लेट लगा रहे थे..!!
चार घंटे तक मै टॉर्च पकड़ा कर बैठा रहा..!! लंच टाईम हुआ..सबने वहीं प्लेटफॉर्म पर बैठ कर खाना खाया..!!!

लंच से पहले जो बंदे मुझे बात-बात पर झिड़क रहे थे..लंच के दौरान मित्रवत हो गये..!!

लंच के बाद जो फोरमैन साहब थे उनसे मैने कहा..

“पाजी , हुण मैनु जाण दियो अंदर”

पाजी ने कुछ सैकंड तक मुझे घूरा.. फिर एक मुस्कान के साथ बोले…“वड़ जा ..जवाना..!!”

मैने फटाक से सेफ्टी-बैल्ट बांधी और घुस गया चिमनी के भीतर..!! अंदर, बंदो ने मुझे जो चीज सबसे पहले सिखाई..वो थी ..“पाना” कैसे पकड़ा जाता है..दूसरे हाथ के अंगुठे को “रिंग स्पैनर” पर कैसे टिका कर रखना है..जिससे कि वो सीधा..नट-बोल्ट मे जाकर सटीक बैठे..ताकि फटाफट ज्यादा से ज्यादा बोल्ट टाईट हो सके..!! हाथ की ताकत के अंदाजे से ,नट का टाईटनिंग “टोर्क” कैसे सैट किया जाये ..ये सिखाया..!!

शाम के साढ़े छ: बज चुके थे..फोरमैन साहब बोले..

मुण्डया..आजा हुण बाहर..!!

मै पसीने से लथ-पथ, काला-पीला, कपड़े डस्ट से सने हुए.. चिमनी से बाहर निकला..!!

फोरमैन साहब ने मेरी पीठ थपथपाई..

चल..थल्ले चलिये..!!

नीचे आकर ..बातचित चल रही थी..फोरमैन साहब बोले..

“इंजिनियर दी डिग्री तो तेरे कोळ हैगी, हुण हुनर दी डिग्री तेनू खुद बणाणी पैगी”

मैने गरदन हिला कर हामी भरी…!!

जेब मे पड़ी गेटपास को टटोला..और चल दिया रिफाईनरी गेट की तरफ..चेहरे पर अजीब सा ”संतोष” और होठों पर मुस्कान लिये”

पापा ड्यूटी से ऑफ हो चुके थे.. लेकिन वो गेट पर ही मेरा इंतजार कर रहे थे..!!

उस दिन मैने गांठ बांध ली…डिग्री तब तक एक कागज का टुकड़ा भर है..जब तक बंदे मे हुनर ना हो..!!

इसी हुनर को मैने देश-विदेश मे नौकरी करते हुए तराशा…जम कर मशीनों के साथ खेला.. हाथ-पैर, चेहरा और कपड़े काले किये..!!

सत्तरह साल हो गये…आज भी…मैनेजर के ओहदे को झोले मे डालकर , घुस जाता हूं मशीनो के भीतर…लेट जाता हूं फर्श पर…

अच्छा लगता है मुझे…खुशी मिलती है…

मै हुनरमंद हूं बड़े से “आचार्य” सरनेम के साथ…..
Pawan Acharya.. 👍

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