अपन तो बने ही थे हथौड़ा चलाने के लिये

“अमृत स्ट्रक्चर निर्माण” (ASN) मे मैने लगभग बीस दिन वॉलन्टियर की तरह काम किया..!! उसके बाद मथुरा रिफाईनरी के एक एक्स्ट्रा टरमिनल मे मैने “रिज़ोम इन्जिनियर्स प्रा़ लि. नामक एक कन्सट्रक्शन कंपनी मे तीन महिने काम किया..!! ढाई हजार तनख्वाह थी..लड़-झगड़ कर मिले टोटल चार हजार..तीन महिने के..!!

इस बीच पापा का प्रोमोशन-ट्रांसफर आ गया , मेहसाणा (गुजरात)
तेरह साल बाद पापा के बाजु से तीन फीतीयां हटकर , पहली बार कंधे पर “स्टार” लगा था ..!! हम सब बहुत खुश थे..!!

क्यों इतना समय लगा..??

कारण वही था नाम के पीछे लगा.. बड़ा सा “आचार्य”

मै और मेरी बहन अक्सर मजाक करते पापा से…

“पापा लगता है तीन फीतीयों मे ही रिटायर हो जायोगे…”

लाल जूते..लाल बैल्ट नसीब होगी या नहीं..??😂

पापा एक्सप्रेसनलैस हो जाते..!!

खैर…हर ढाई-तीन साल मे हमे बौरिया-बिस्तर उठा कर नई जगह जाने की आदत तो थी ही..पहुंच गये मेहसाणा..!!

शुरु का एक सप्ताह तो नया शहर..नया राज्य..नयी भाषा देखने-समझने मे निकल गया..!! अच्छा लग रहा था सब कुछ..!!

फिर मेरे ऊपर वही डिप्रेशन हावी होने लगी..

जोब…. नौकरी…रोजगार…!!

एक दिन यूहीं बजार मे घूमते हुए एक बोर्ड पर नजर पड़ी…

“नौकरी माटे मळो”

मेरा “एड्रीनलिन” लेवल ने जंप शूट किया…

तुरंत पहुंच गया..मैडम बैठी थी…

मैने अपनी क्वालीफिकेशन बताई..!!

“गुजराती आवड़े छे..??”

नहीं मैडम.. अभी..दस दिन पहले ही आया हूं..इससे पहले गुजरात कभी नहीं देखा.. हॉस्टल मे कुछ गुजराती बैचमेट्स थे .. इसलिये थोड़ी बहुत समझ लेता हूं..!!

मैडम ने 150 रु रजिस्ट्रेशन फीस लेकर..मुझे एक शोरूम भेजा इंटरव्यू के लिये..वर्कशॉप इन्चार्ज के लिये..!!

शॉ-रूम था..“काईनेटिक लूना” का….

“राजेन्द्र ऑटो सेल्स एण्ड सर्विस”

बिपिन भाई पटेल.. शॉ-रूम के मालिक ने इंटरव्यू लिया..गुजराती स्टाईल वाली हिंदी और टूटी-फूटी अंग्रेजी मे..

मै ताबड़तोड़, फर्राटे मे अंग्रेजी मे जवाब दिये जा रहा था..!!

बिपिन भाई ने बोला कल से आ जाओ…बैकयार्ड मे बना वर्कशॉप दिखाया.. फिर बोले पन्द्रह सौ रुपये दूंगा…!!

और हां..पहले महिने की तनख्वाह मेरे पास रिजर्व(डिपॉजिट) रहेगी..जब एक साल पूरा हो जायेगा तब ये डिपॉजिट मिलेगा .. मल्लब..बारहवें महिने की तनख्वाह डबल मिलेगी..

बोलो मंजूर….

“नहीं”

बिपिन भाई के शब्द पूरे होने से पहले ही मैने जवाब दे दिया..और राम-राम कहकर वहां से चला आया…

तीन-चार दिन बाद जावेद नाम का लड़का मुझे खोजते हुए CISF कोलोनी आया..!!
बोला पवन भाई…बिपिन भाई मिलना चाहते हैं.. अहमदाबाद से कोई साहब भी आये हैं..!!

मै पहुंचा शॉ-रूम..!! वहां कोई साहब से बिपिन भाई ने मिलवाया (नाम याद नहीं) .. काईनेटिक फिनकॉर्प लिमिटेड का रिजनल मैनेजर था..!! जो काईनेटिक कंपनी के टू-व्हीलर फाईनेंस करती थी..!!

बिपिन भाई बोले..लड़का तेज है.. “अंग्रेजी पण सरस बोले छे”

साहब ने मुझे फाइनेंस एक्जीक्युटिव रख लिया..!! बेटा अब ताबड़तोड़ काईनेटिक लूना, काईनेटिक होंडा बेचो..फाईनेंस करो..!!

दो हजार तनख्वाह..और हर फाईल पर पचास रु कमीशन..!!

मुझे मामला ठीक लगा..जब तक अपने प्रोफेशन की नौकरी नहीं मिलती तब तक यही सही..!!

मै और जावेद मेहसाणा जिले के कौने-कौने मे जाकर “लूना” बेचने का काम करते..!!

“मोदी जी” के गांव “वड़नगर” मे अक्सर काईनेटिक की नई बाईक “चैलेंजर” का कर्टेन क्योस्क लगा कर बैठ जाते..!!

पहली पगार आई सैंतीस सौ रुपये..कमीशन के साथ..!!

मोटा-भाई की तो मौज हो गई..!! कुछ दिन खुशी-खुशी मे निकल गये.. लेकिन मुझे ये सब मिथ्या लगने लगा..!!

अपन तो बने ही थे हथौड़ा चलाने के लिये…

एक दिन एक भाईसाहब, अपनी पत्नी के लिये “लूना” खरीदने आए..!! पेशे से वकील थे, लेकिन किसी कंपनी मे अकांउट्स और लीगल काम देखते थे..पत्नी टीचर थी..!! नाम था “अरविंद जी ठाकोर”..!! उत्तर गुजरात मे ठाकोर अपने नाम की पीछे, “जी” लगातें हैं..!!

अरविंद जी, तय करके ही आए थे कि लूना खरीदनी है, तो मुझे अपनी मार्केटिंग स्किल दिखाने की कोई जरूरत नहीं पड़ी..!! फटाफट फाईल बनाकर अपने कमीशन के पचास रु पक्के कर लिये मैने..!!

लगभग एक घंटे की मुलाकात मे , मृदुभाषी अरविंद जी मित्र बन गये..!! बातों-बातों मे उन्होने मेरी क्वालीफिकेशन पूछी..!!मैने कहा फ्रेस मैकेनिकल इंजिनियर हूं..!!

तो यहां क्या कर रहे हो..??

कुछ जोब मिल नहीं रहा था..तो सोचा यही काम कर लेता हूं..!!

“सी वी” रखा है..??

मैने फटाक से, ड्रोअर से सी वी निकाल कर उनको थमा दिया..!!

अरविंद जी, लूना लेकर चले गये.. मुझे थौड़ी सी आशा जगी.. लेकिन अगले ही पल खयाल आया कि , पहली मुलाकात मे कौन, किसी के लिये इतनी माथा-पच्ची करेगा..!! और शाम होते-होते मै भूल गया..!!

अगले दिन सुबह-सुबह ही मेरे लिये एक फोन आया..!!

हैलो..मिस्टर पवन..दिस इज सैबस्टीयन..कॉलिंग फ्रॉम “नेपच्यून इंजिनियरिंग” …मि. अरविंद रेफर्ड योर नेम फॉर मार्केटिंग एग्जिक्यूटिव पोजीशन, एण्ड आवर “एम डी” विलींग टू मीट यू, एज सून एज पॉसीबल…कैन यू मैनेज टू कम राईट नाऊ..??

“दो सैकंड का पिन ड्रॉप साईलेंस”

हैलो.. मिस्टर पवन..यू देअर..??

आफकोर्स सर..विल बी देअर इन ट्वंटी मिनिट्स”

मुझे मालूम था..वो कंपनी कहां पर थी..क्योंकि नौकरी ढूंढने के चक्कर मे..मै मेहसाणा के दोनो इंडस्ट्रीयल एरिया (GIDC फेज वन एण्ड टू) के कई बार धक्के खा चुका था..!!

लूना उठाई.. बिपिन भाई बोले..किधर..??

बिपिन भाई..एक मुर्गा फंसा है.. खोपचे मे लेकर आता हूं अभी..!! “चैलेंजर” चैये उसको..!!

चैलेंजर का नाम सुनते ही , बिपिन भाई के चेहरे पर “हायना” जैसी मुस्कान दौड़ गई..!!

पवन आचार्य की गाडी पार..!!😂

एम डी साहब..मि. राजेश पंचाल ..एक युवा इंजिनियर थे..उम्र लगभग चालीस को लगती हुई..दस सालों मे ही, अपने दो भाईयों के साथ मिलकर.. अथाह मेहनत से, एक मशीनरी मैन्यूफैक्चरिंग कम्पनी खड़ी कर ली थी..!!

उनको बस ऐसा बंदा चैये था, जिसकी कम्यूनिकेशन स्किल तगड़ी हो, अंग्रेजी पर विशेष पकड़ हो..फर्राटे दार बोलता हो..!!

पंद्रह मिनट के इंटरव्यू मे ही पवन आचार्य की नौकरी तय हो गई..!! ट्रेवलिंग जॉब थी…छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड का एरिया कवर करना था..!! तनख्वाह..तीन हजार..पच्चीस रु डेली ट्रेवलिंग अलाऊंस अलग से..!!

पवन आचार्य के मन मे..पटाखे फूटने लगे..!! एक बार घुस जाऊं बस.. फिर तो तगड़ी ग्रिप बना ही लूंगा..!! आधे घंटे मे ऑफर लेटर मिल गया..!! दो दिन मे जोइनिंग को बोला गया..!!

वापस आकर.. बिपिन भाई को बोला..दूसरा बंदा ढूंढ लीजीये..!!

“मनै खबर हती..तू टकवानो नहीं..चल कांय नई.. बेस्ट ऑफ लक..!!आवतो रैजे..!!”

राम-राम बोलकर सीधा घर..!! खबर सुनते ही..पापा सबसे ज्यादा खुश होए..!! बोले…पूरी इमानदारी से , जी तौड़ मैहनत करना..अपने मालिक का कभी बुरा मत सौचना..!!

पक्का..!! मम्मी-पापा के पैर छुए..!!

अपने दम पर नौकरी हासिल की थी..!! खुशी ही अलग थी..!!

पहले दिन मुझे..मशीनरीज के लिफलेट, टेक्निकल डिटेल्स पकड़ा दी गई..बॉस बोले ..बैठ कर पढ़ो…समझो… हम क्या बनाते हैं..कुछ समझ ना आए तो पूछो..पूरी डिजाईन टीम से मिलवा दिया..!!

दो दिन ही बीते थे..शाम के लगभग पांच बजे होंगे..बॉस ने केबिन मे बुलाया..!!

पवन, ये विवेक जैन साहब हैं, प्रॉजेक्ट मैनेजर हैं, इनको कल “रायगढ़” जाना था..वहां हमने “जिंदल” मे “फ्लाईएस ब्रिक्स मेकिंग” प्लांट लगाया है.. दो सेंसर खराब हो गये हैं, विवेक जी की कल की टिकट बुक है..लेकिन कुछ काम आ गया और ये नहीं जा पायेंगे..!! इनकी जगह आप जाओ..!! दो-चार दिन रुकना है.. फिर.. छत्तीसगढ़ के कुछ एस्टीम्ड कस्टमर्स की लिस्ट दूंगा..उनसे मिलकर प्लांट की डिटेल समझानी है..!!

लेकिन मै तो ..प्लांट के बारे मे कुछ नहीं जानता…सर..??

बॉस मुझे तुरंत शॉप-फ्लॉर पर ले गये..अगले तीन घंटे तक वहां रखे..प्लांट के बारे मे..बारीक से बारीक चीज समझाई..!!

मुझे पता है पवन..आप मैनेज कर लोगे..और वैसे भी हमारी टीम हैं वहां पर..आपको तो सिर्फ, “जिंदल” के साहब लोगों को उन बातों के लिये कन्विंस करना है..जो अपने लड़के समझा नहीं पायें..!!

“गुड लक”

मैने हां मे गरदन हिला दी..!!

तीसरे दिन शाम को..मै रायगढ़ पहुंचा..!!

बढ़िया होटल मे ..रहना-खाना फ्री..!! लाले को..एलीट क्लास वाली फीलींग आने लगी..!!

अगले दिन जिंदल पहुंच कर..अपनी टीम के साथ मै..अपनी टीम के साथ ..जुट गया..!! “जयंती भाई रावळ” फॉरमेन थे हमारी नेपच्यून कंपनी के..!! पढ़े-लिखे नहीं थे..लेकिन मैकेनिकल, फेब्रिकेशन और हाईड्रॉलिक्स के मास्टर थे..!!

मैने जम कर काम किया..जयंती भाई का दिल जीत लिया..!!

मेरा फीड बैक जयंती भाई ने फोन पर ही बॉस को दे दिया था..!! ये लड़का अब , मार्केटिंग नहीं इंस्टोलेशन का काम करेगा..!!

लगभग..दस दिन रायगढ़ मे गुजारने के बाद..वापस लौटे हम लोग..!! बॉस बहुत खुश थे..!!

फिर प्लांट लगाने, सर्विस मेन्टेनैन्स का जो सिलसिला शुरु हुआ तो अगले चार साल तक अनवरत चलता रहा..!!

जिंदल मे तीन प्लांट, टिस्को, बिड़ला विस्कोस से लेकर कई प्राईवेट एन्टरप्रन्योर के प्लांट लगाए..!!

मै खुद ही टीम लीड करता था.. शुरुआत मे टीम बड़ी होती थी..फिर धीरे-धीरे..छोटी होती चली गई..!! जब नौकरी छोड़ी..तब सिर्फ एक बंदे के साथ अकेला प्लांट खड़ा कर देता था..!!

नेपच्यून इंजिनियरिंग कंपनी, राजेश पंचाल सर और जयंती भाई रावळ, बाद मे जुड़े दिनेश भाई सुथार, राकेश पटेल भाई ने मुझे खांटी, हथौड़ा छाप इंजिनियर बनाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी..!! उनका मै आज भी आभारी हूं..!!

To be continued…..

 

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating / 5. Vote count:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: