एक गांव मे एक गरीब किसान रहता था

मेरे अंडर एक तमिल लड़का काम करता है, सुरेन्द्र..!! दो साल पहले जब मै यहां आया तो, उसको हिंदी मे अक्सर एक लाईन बोलते सुनता था..!!

“एक गांव मे एक गरीब किसान रहता था”

बस इतना ही था, उसका हिंदी ज्ञान..!! कालांतर मे वो काफी अच्छी हिंदी बोलना और समझना सीख गया..!!

ये पंक्ति हम हिंदी माध्यम शिक्षित , लोगो ने कहीं न कहीं प्राथमिक कक्षाओं मे अवश्य पढ़ी होगी..!!

गंभीरता से सोचिये..!! ये पंक्ति आई कहां से ..??

आजादी के आस-पास वाकई मे ये परिस्थिति थी..!! किसान वाकई गरीब था..!! इतना गरीब कि, “राधा रानी” को फसल की ज्वारी का तीन-चौथाई तो , सुख्खी लाला को सूद मे देना ही पड़ता..बिरजु चाहे जितना हाथ पैर मार ले..!!

सुख्खी लाला को इससे मतलब न था कि राधा ने कैसे डोलचे भर-भर , खेत की सिंचाई की होगी..!! कैसे एक बैल की जगह अपने जवान बेटे को हल मे जोत दिया होगा.??

मदर इंडिया फिल्म हकिकत मे उस जमाने मे किसान की परिस्थिति को भली-भांती परिभाषित करती है..!!

उस जमाने मे, सिंचाई के लिए सिर्फ और सिर्फ बादलों कि राह देखनी होती थी..खेत जोतने के लिये आप के पास एक अदद बैल की जोड़ी (सुडोल कद-काठी वाले) होने ही चैये..!!

नतीजतन…उत्पादकता..पेट की आग शांत करने भर की…ना के बराबर..!!

समय बदला..देश मे “हरित क्रांती” हुई..!! शाष्त्री जी के आह्वान पर देश की जनता ने एक समय का उपवास धर लिया..!!

देश का किसान..देश का भाग्य विधाता बन कर उभरा..!!

शाष्त्री जी ने तो बाकायदा, प्रधानमंत्री आवास मे सब्जियां उगाई..!!

मै किसान नहीं हूं.. लेकिन किसान की व्यथा मैने अपने मित्र “राज यादव” की आंखो मे देखी है..जो पिछले कई वर्षों से किसानी कर रहा है..!! उससे हाथ मिला कर कोई देखे..ऐसा लगेगा जैसे आपने किसी पत्थर की शिला से हाथ मिला लिया है..!!

दो वर्ष पहले फरवरी महीने मे, उसके खेत पर जाना हुआ..ओलावृष्टी से पचास प्रतिशत से ज्यादा , गेहूं और सरसों की फसल जमीदोज़ हो गई थी..!!

“राज..ये तो सारी फसल खराब हो गई..??”

अब..??

अब क्या..दाने छोटे निकलेंगे..या फिर..तूड़ा बनेगा..!!
भैंस चर लेगी…!!

राज के चेहरे पर मुस्कान थी..और आंखे..??

आंखे ढेर सारी कहानियां सुना रही थी..!! वो कहानियां अगले कई दिन तक मेरे मन-मस्तिष्क मे घूमती रही..!!

गुड़गांव और NCR मे आपको ढेरों , मैहनतकश किसान मिल जायेंगे, इत्ती मैहनत कि शाम को पांच बजे से ही यारो की मंडली लेकर ठेके के “हाते” मे घटिया चुटकलों, शायरियों और ठहाको की मैहनत करते नजर आ जायेंगे..!!

मैहनत करते हुए इतने निढाल हो जाते हैं कि बिचारों को ड्राईवर , सस्ती सी “फॉर्चयूनर” मे पटक कर घर पहुंचाता है..!!

क्या करें..बी एम डब्ल्यू हर गरीब किसान थोडे न खरीद सकता..??

एंबियंस मॉल के “किसान बाजार” मे यही मैहनतकश किसान आपको खेती के साजो-सामान खरीदते नजर आ जायेंगे..!!

कित्ती मैहनत करतें हैं बापड़े..!! अब ऐसे किसान को पूरा, “समर्थन मूल्य” ना दे सरकार..तो क्या बिचारे शांतीपूर्ण आंदोलन भी नहीं कर सकते क्या.??

बिचारों को..आठ-दस दुकाने जलाने का भी हक नहीं..??

अपने ही भाईयों पर गोली चलाने का हक नहीं..??

राज का क्या है..वो तो अमीर किसान है..ऐसी ना जाने कितनी फसलें वो ओलावृष्टी मे यूं…यूं…यूं …करके उड़ा सकता है..!!

ओलावृष्टी पर वो मुस्कुराता है..वो थोड़े ना है..सच्चा किसान..!!

नहीं तो ..आज अपने ऐसी फार्म-हाऊस मे बैठने की बजाय..किसान आंदोलन मे नारे बुलंद ना कर रहा होता..??

कुछ भी कहो…

“ये गोरमिंट बिक गई है”
.
.
.

छोटू…एक बाजरे की रोटी..लषण की चटनी के साथ”

Writer – Pawan Acharya jee

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