ये हैं इज़रायल

मैं तीन बार इज़रायल गया हूँ. तीनों बार अलग-अलग रास्तों से. पहली बार लंदन से गया था. दूसरी बार पेरिस से. लेकिन तीसरी बार मुझे जाने का अवसर मिला, पड़ोसी राष्ट्र जॉर्डन से.
राजधानी अम्मान से, रॉयल जॉर्डन एयरलाइन्स के छोटे से एयरक्राफ्ट से तेल अवीव की दूरी मात्र चालीस मिनट की हैं. मुझे खिड़की की सीट मिली और हवाई जहाज छोटा होने से, तुलना में काफी नीचे से उड़ रहा था. आसमान साफ़ था. मैं नीचे देख रहा था. मटमैले, कत्थे और भूरे रंग का अथाह फैला रेगिस्तान दिख रहा था.
पायलट ने घोषणा की, कि ‘थोड़ी ही देर में हम नीचे उतरने लगेंगे’. और अचानक नीचे का दृश्य बदलने लगा. मटमैले, कत्थे और भूरे रंग का स्थान हरे रंग ने लिया. अपनी अनेक छटाओं को समेटा हरा रंग..!
रेगिस्तान तो वही था. मिट्टी भी वही थी. लेकिन जॉर्डन की सीमा का इज़रायल को स्पर्श होते ही मिट्टी ने रंग बदलना प्रारंभ किया. यह कमाल इजरायल का हैं. उनकी मेहनत का हैं. उनके जज्बे का हैं.
रेगिस्तान में खेती करनेवाला इज़रायल आज दुनिया को उन्नत कृषि तकनीकी निर्यात कर रहा हैं. रोज़ टनों से फूल और सब्जियां यूरोप को भेज रहा हैं. आज सारी दुनिया जिसे अपना रही हैं, वह ‘ड्रिप इरीगेशन सिस्टम’, इज़रायल की ही देन हैं.
इज़रायल प्रतीक हैं स्वाभिमान का, आत्मसम्मान का और आत्मविश्वास का..!
मात्र अस्सी लाख जनसँख्या का यह देश. तीन से चार घंटे में देश के एक कोने से दूसरे कोने की यात्रा संपन्न होती हैं. मात्र दो प्रतिशत पानी के भण्डार वाला देश. प्राकृतिक संसाधन नहीं के बराबर. ईश्वर ने भी थोड़ा अन्याय ही किया हैं. आजू-बाजू के अरब देशों में तेल निकला हैं, लेकिन इज़रायल में वह भी नहीं..!
इज़रायल राजनीतिक जीवंतता और राजनीतिक समझ की पराकाष्ठा का देश हैं. इस छोटे से देश में कुल 12 दल हैं. आज तक कोई भी दल अपने बलबूते पर सरकार नहीं बना पाया हैं.
पर एक बात हैं – देश की सुरक्षा, देश का सम्मान, देश का स्वाभिमान और देश हित, इन बातों पर पूर्ण एका हैं. इन मुद्दों पर कोई भी दल न समझौता करता हैं, और न ही सरकार गिराने की धमकी देता हैं. इज़रायल का अपना ‘नॅशनल अजेंडा’, जिसका सम्मान सभी दल करते हैं.
14 मई, 1948 को जब इज़रायल बना, तब दुनिया के सभी देशों से यहूदी (ज्यू) वहां आये थे. अपने भारत से भी ‘बेने इज़रायल’ समुदाय के हज़ारों लोग वहां स्थलांतरित हुए थे.
अनेक देशों से आने वाले लोगों की बोली-भाषाएं भी अलग-अलग थी. अब प्रश्न उठा कि देश की भाषा क्या होना चाहिए..? उनकी अपनी हिब्रू भाषा तो पिछले दो हजार वर्षों से मृतवत पड़ी थी. बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे. इस भाषा में साहित्य बहुत कम था. नया तो था ही नहीं.
अतः किसी ने सुझाव दिया कि अंग्रेज़ी को देश की संपर्क भाषा बनाई जाए. पर स्वाभिमानी ज्यू इसे कैसे बर्दाश्त करते..? उन्होंने कहा, ‘हमारी अपनी हिब्रू भाषा ही इस देश के बोलचाल की राष्ट्रीय भाषा बनेगी.’
निर्णय तो लिया. लेकिन व्यवहारिक कठिनाइयां सामने थी. बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे. इसलिए इज़रायल सरकार ने मात्र दो महीने में हिब्रू सिखाने का पाठ्यक्रम बनाया. और फिर शुरू हुआ, दुनिया का एक बड़ा भाषाई अभियान..! पाँच वर्ष का.
इस अभियान के अंतर्गत पूरे इज़रायल में जो भी व्यक्ति हिब्रू जानता था, वह दिन में 11 बजे से 1 बजे तक अपने निकट की शाला में जाकर हिब्रू पढ़ाता था. अब इससे बच्चे तो पाँच वर्षों में हिब्रू सीख जायेंगे. बड़ों का क्या..?
इस का उत्तर भी था. शाला में पढ़ने वाले बच्चे प्रतिदिन शाम 7 से 8 बजे तक अपने माता-पिता और आस पड़ोस के बुजुर्गों को हिब्रू पढ़ाते थे. अब बच्चों ने पढ़ाने में गलती की तो..? जो सहज स्वाभाविक भी था.
इसका उत्तर भी उनके पास था. अगस्त 1948 से मई 1953 तक प्रतिदिन हिब्रू का मानक (स्टैण्डर्ड) पाठ, इज़रायल के रेडियो से प्रसारित होता था. अर्थात जहां बच्चे गलती करेंगे, वहां पर बुजुर्ग रेडियो के माध्यम से ठीक से समझ सकेंगे.
और मात्र पाँच वर्षों में, सन 1953 में, इस अभियान के बंद होने के समय, सारा इज़रायल हिब्रू के मामले में शत प्रतिशत साक्षर हो चुका था..!
आज हिब्रू में अनेक शोध प्रबंध लिखे जा चुके हैं. इतने छोटे से राष्ट्र में इंजीनियरिंग और मेडिकल से लेकर सारी उच्च शिक्षा हिब्रू में होती हैं. इज़रायल को समझने के लिए बाहर के छात्र हिब्रू पढने लगे हैं..!
ये हैं इज़रायल..! जीवटता, जिजीविषा और स्वाभिमान का जीवंत प्रतीक..! ऐसे राष्ट्र में पहली बार हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी राजनयिक दौरे पर जा रहे हैं. हम सब के लिए यह निश्चित ही ऐतिहासिक घटना हैं..!
@अजय जी पांडेय
साभार- पंकुल सिन्हा

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