ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान

जिन्नाह ने द्विराष्ट्र सिद्धांत के आधार पर भारत का विभाजन करवाया। इस सिद्धांत के अनुसार सिर्फ धर्म यह निर्धारित कर सकता है कि कोई इन्सान भारतीय है या पाकिस्तानी। क्या किसी भी महान देश की नागरिकता की कसौटी इतनी सरल हो सकती है? निःसंदेह, यह सिद्धांत एक प्रथकतावादी दिमाग से उपजे अवसरवाद का उत्कृष्ट उदाहरण है।
विभाजन के समय ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान पर मुस्लमान होने के कारण दबाव डाला गया कि वे पाकिस्तानी सेना का चुनाव करें। इसके बदले उन्हें इसका आश्वासन भी दिया गया कि उन्हें सेना प्रमुख भी बनाया जायेगा। उन्होंने पाकिस्तानी सेना में मिले अवसर को तो ठुकराया ही, साथ ही अपने अदम्य साहस एवं बलिदान से यह सिद्ध कर दिया कि उपरोक्त सिद्धांत असल में कितना उथला था।
दिसम्बर 1947 में ब्रिगेडियर उस्मान झंगर में अपनी टुकड़ी का नेतृतव कर रहे थे जब अपरिहार्य कबीलाई हमले के कारण युद्धनीतिक रूप से महत्वपूर्ण वह चौकी दुश्मन के हाथ चली गयी। उस्मान ने प्रतिज्ञा ली कि जब तक झंगर की पुनर्प्राप्ति नहीं हो जाती वे बिस्तर पर नहीं सोयेंगें।
दुश्मन के साथ इस अविश्वसनीय रूप से प्रतिकूल युद्ध में उस्मान झंगर की पुनर्प्राप्ति करने में सफल रहे। तिलमिलाए पाकिस्तान ने अपना सैन्य बल झंगर पर कब्ज़ा करने के लिए झोंक दिया परन्तु उस्मान के नेतृत्व में झंगर की प्रतिरक्षा अभेद्य रही। महीनो चले संघर्ष में दुश्मन की भीषण गोलाबारी में ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान वीरगति को प्राप्त हुए, और उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से अलंकृत किया गया।
उस्मान आजीवन अविवाहित रहे, और अपने वेतन का अधिकांश हिस्सा गरीब बच्चों की शिक्षा हेतु दान देते रहे।
एक ऐसे महावीर जिन्हें भारतीयता पर गर्व था, और भारत को उन पर सदा गर्व रहेगा।

General V.K. Singh

Post Link

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating / 5. Vote count:

As you found this post useful...

Follow us on social media!

We are sorry that this post was not useful for you!

Let us improve this post!

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: