बचा लिजिये, हमारे संस्थागत सामाजिक ढांचे को

मै ईंग्लैंड मे अक्सर घर बदल देता था कभी किसी के साथ पी जी मे, तो कभी खुद का लेकर, किसी के साथ शेयर कर लेता था..!! पांच साल मे कुल ग्यारह बार मकान बदलें..!! कारण ये कि कोई एग्रीमेंट नहीं करता था, फर्निश्ड मकान मिलते थे..!! नया ठिकाना, नये लोग..!!जहां किसी से मनमुटाव हुआ, अपने दोनो थैले उठा के चल देता था..!!

एक बार मेरे साथ एक गुजराती बुजुर्ग , घर शेयर करने आए..!! सीनियर सीटीजन थे..!! मैने पूछा , आप इस उमर मे अकेले..???

जवाब मिला..“बाहिड़ी ए घर मा थी काढी मुक्यो छे..!!”

मैने पूछा , ऐसे-कैसे..?? मकान उसके नाम था क्या..??

जवाब मिला .. नहीं..मारा नामे..!!

तो फिर वो आपको , आपके ही घर से कैसे निकाल सकती है..??

बेटा..कानून..“यू के” का कानून..!! जरा सी बहस हुई, बीबी ने ठोक दिया पुलिस को फोन..और इल्जाम लगा दिया कि , इसने मुझ पर हाथ उठाया..!! बस , फिर पुलिस कुछ नही सुनती..!!

सबसे पहले तो आप, “एज इट इज” सिचुयेशन मे घर छोड़ो, आधी रात को भी, चाहे बाहर बर्फ पड़ रही हो..!! भले , आप मकान के मालिक हो..महिला ने कह दिया तो बस कह दिया..!! कानूनी कारवाही तो बाद मे चलती रहेगी..!!

बाद मे पता चला , ऐसे कानूनो की वजह से वहा की आधे से ज्यादा आबादी, “विवाह” करने से बचती है..!!

हमारे देश मे भी ऐसे कानूनो, धाराओ की बाढ आ चुकी है..!! अनगिनत..झूठे-सच्चे डोमैस्टिक वायलेंस, दहेज प्रताड़ना के केश अदालतों मे पेंडिग पड़े हैं..!!

सभी कानून और समाज महिलावादी होंगे तो समाज का नितिगत ढांचा , ढह सकता है..!! ईंग्लैंड और अन्य योरोपियन देशो मे , इन्ही कानूनो के कारण, “विवाह” रूपी संस्था बिखर गई है..!! वहां आधे से ज्यादा लोग विवाह करने की बजाय , “लिव इन” मे रहने को ज्यादा तरजीह देते हैं..!!

नतीजा , ढेरों ,“सिंगल पैरेंट” बच्चे..! जो बारह साल की उमर तक पहुंचते-पहुंचते हाथों मे सिगरेट और कैनेबीस का धुआं उड़ाते हुए सड़को पर देखे जा सकते हैं..!!

ये माहोल हमारे भारत देश मे भी बेतरतीब कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ रहा है..!! संस्कार कहां से प्रमोदित हों आखिर..संयुक्त परिवार रहे नही..!!!

सारा दोष, वामपंथी सोच और मैकाले शिक्षा पद्धति का है..!!

माता-पिता अपनी धुन मे, रुपया जोड़ने मे व्यस्त हैं, बच्चे क्या कर रहें हैं पता नहीं..!! और आग मे घी का काम, आधुनिक गैजेट्स कर देंगे..!!!

देंखे कब नींद खुलती है..??

जल्दी जागिएगा…कहीं स्टेशन निकल ना जाए..!!

बचा लिजिये, हो सके तो..हमारे संस्थागत सामाजिक ढांचे को..!!!

“प्लीज”

Writer – Pawan Acharya

Reference- Facebook

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