नो स्मोकिंग इन क्लोज्ड प्रिमाइसेस

30 मार्च 2007 को मै पहली बार ईंग्लैंड पहुंचा था..!! उन दिनो वहां एक कैम्पेन चल रहा था..!!

“नो स्मोकिंग इन क्लोज्ड प्रिमाइसेस”

अंग्रेज सरकार ने कानून बनाया था या नहीं, ये मुझे नहीं पता, लेकिन हर जगह इसका प्रचार हो रहा था कि , 1 जुलाई से , आप ऐसी जगह सीगरेट ना पियें जो तीन दिशा मे दीवारों से घिरी हो..!!

“यू कैन नोट स्मोक इन ए प्लेस विच इज सराऊंडेड बाई थ्री साईड वॉल्स”

मल्लब..पब, रेस्टैरोंट्स, क्लब, या ऐसी कोई भी जगह जहां पहले आप आराम मे सुट्टे लगा सकते थे , एक जुलाई के बाद नहीं लगा पायेंगे..!!

अगर आप को तलब लगी है तो बाहर जाईये…खुले आकाश मे धुंए के छल्ले बनाईये..!! बारिस आ रही हो या बर्फ पड़ रही हो..
हमारी बला से..!!

होर्डिंग्स मे, सड़कों पर , टीवी हर जगह इसके विज्ञापन दिखाई देते थे..!! विज्ञापन भी ऐसे नहीं कि जो लोगो को कानून या सरकार का खोफ पैदा करतें हो, बल्कि ऐसे विज्ञापन जो हंसते-हंसते , बात करके लोगों को जागरूक करतें हों..!!

लेकिन जो बात गोर करने वाली थी , वो थी कि लोगों का कोई विशेष ध्यान नहीं था, ना ही आपस मे लोग इस विषय पर बात करतें थे..!!

मेरे मन मे एक गहन जिज्ञासा थी..!! वो आगे बताऊंगा..!!

बहरहाल..वो तारीख भी आ गई..!!

मै एक ऐसे पब/रेस्टोरैंट मे पहुंचा जहां पहले जा चुका था..!!

कमाल था…. बेमिसाल..!!

सारे स्मोकर्स बाहर खड़े हो कर सीगरेट पी रहे थे..हल्की बारिस भी हो रही थी..!!

पहले जो रेस्टोरैंट , धुँए से पटा रहा था वहां आज एक भी इन्सान सिगरेट नहीं पी रहा था..!!

नियम/कानून सरकार ने बनाया हो या नहीं.. लेकिन इसे वहां की जनता ने फलित कर दिखाया था..!!

अच्छा मेरी जो जिज्ञासा थी वो ये थी कि, क्या वाकई लोग इस कानून को मानेंगे या नहीं..??

क्या अंतर है मेरे देश मे और इस देश मे..??

लगभग बीस बरस पहले दिल्ली की स्टेशन और चलता ट्रेनो मे ये कानून लागू किया गया था ..तब मै कॉलेज मे था..!!

उस जमाने मे मै भी स्मोकर था.. जबरदस्त वाला..!!

ट्रेन मे लोग आराम से बीड़ी-सिगरेट सूट रहे थे..!!

दिल्ली स्टेशन पर उतरा तो देखा, कि रेल्वे स्टाफ खुद ही धुंए उड़ा रहा है..!! तो नियम कानून तो गया पाडे की ांड मे..!!

रही बात जागरूकता की…वो तो हममे कभी थी ही नहीं..!!

जागरूक होते तो शायद एक हजार साल गुलाम ना हुए होते..!!

आज भी कई लोग, ट्रेनो मे आपको सिगरेट पीते दिख जायेंगे..!!

देश के प्रति, देश के लिये, देश की खातिर छोटे से काज के लिये भी हमारी स्व-इंद्रियां “कोमा” मे चली जाती हैं..!!

ना जाने कौनसा “हार्मोन” हमारे भीतर जनरेट होता है कि जो हमे फोर्स करता है कि , वो काम जरूर करो..जिस पर निषेध है या फिर गैर कानूनी है..!!

ये तो भला हो हमारे प्रधान सेवक जी का और सोशल मिडिया का, जो दिन-रात प्रयास रत हैं लोगों को जागरूक करने मे..!!

इस राष्ट्र को विश्व गुरु बनाने का खिताब दिलाना चाहतें हैं..!!

आप भी जुट जाईये, छोटी-छोटी मुहिम मे..!! चिड़िया की भांती अपनी चोंच मे पानी भरकर , धधकती आग पर गिराने का कार्य अनवरत कीजीये..!!

“भारत-वर्ष ऐसे ही विश्व-गुरु नहीं बन सकता, उसके लिए ऋषि “धधीच” बन कर अपनी हड्डियों की आहूती देनी पड़ेगी..!!
.
.
मन में राखु तो मोरा मन जले, जो कह दूं तो मुख जल जाए,
जैसे गूंगे को सपना भया, समझा समझा, पछताय…!!!

Reference – Facebook

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating / 5. Vote count:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: