मेरा गांव by दार्शनिक मनीष

गौर से बैठो और निहार लो
इत्मिनान दो बदले प्यार लो
बस दो पल तो यहा गुजार लो
कुछ यादों को पल मे संवार लो

कुल कुनबा कुटुम्ब है पास बुलाये
रिश्ते है नाते है सब आस लगाये
गुजरे वक्त यूं कुछ एहसास दिलाये
लौट आओ गाव की पगडंडियां बुलायें

तेरा गांव से शहर आना जाना
हो जाता है तू अपनो से बेगाना
मां के हाथो का निवाला खाना
शहरो मे है ये सब अफसाना

आ ले सुध पीपल कुवें बाग के
ठंडे छाव की रिश्तों के भाव की
गर्व करेगा झूम उठेगा बोल उठेगा
यह मिट्टी है मेरे गांव की मेरे गांव की

गांव अब गांव कहां रह गये हैं
दिलों के भीतर शहर हो गये हैं
हम दोपहर दो पहर सो गये हैं
संबंध सारे कड़वे जहर हो गये हैं

दार्शनिक मनीष

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