इसलिये बुखार मुझे पसंद है

फीवर होना भी कभी-कभी सुकून देता है . सोये रहो थर्मामीटर का सहारा लेकर , कोई टोकने वाला नही होता. दलिया-खिचड़ी भी राजभोग से कम नही लगते. चार साल बाद ‘प्रॉपर फीवर’ हुआ है. कल शाम से मामला 102 और 104 डिग्री के बीच में घूम रहा है. बड़ा इंतजार था इस बुखार का ..तरस गया था कि ताप चढ़े और बुखार की नीम बेहोशी की हालत में आधे-अधूरे सपने देखूँ . बुखार का नशा .. मेरा फेवरेट नशा रहा है बचपन से .

बचपन के जितने भी बुखार याद है .. सारे दादाजी की गोद में ही बीते. जबरदस्ती खिलाये गये सेब , दूध-ब्रेड और कड़वी दवाओं की यादें ताजी है आजतक. जब भी बुखार आता है तो मैं खुद को दादाजी के पास महसूस करता हूँ इसलिये बुखार मुझे पसंद है . बुखार का चढ़ना .. फिर उतरना .. फिर ठंडा पसीना आना और इसी क्रम का लगातार चलते रहना किसी एडवेंचर से कम नही लगता था. ठीक हो जाने पर बड़ा ‘miss’ करता था बुखार को. सबसे ज्यादा डरावने और विचित्र सपने बुखार की बेहोशी में ही देखे है . कौन सी कड़ी , कहाँ जुड़ती थी .. समझना मुश्किल था लेकिन मजा बहुत आता था.

कल रात को और आज दिन में भी बिना हाथ-पैर के ढ़ेरों डरावने सपने देखें , सबमें डर था. एक सपने में तो मांडव के रानी रुपमती के किले से नीचे गिर गया .. जब नींद खुली तब सोचा कि वहाँ क्योँ गया गिरने .. तब याद आया कि जब 12th में था तब गया था वहाँ और उसी दिन एक लड़का गिर गया था नीचे. एक सपने में ओंकारेश्वर की नर्मदा नदी में डूबते डूबते बचा. जब बाहर निकलने के लिये हाथपाँव मार रहा था तभी नींद खुल गयी . एक बार वहाँ डूबते हुए बचा था .. वही कल फिर देखा. बस इन्हीं सपनों के लिये बुखार का बड़ी शिद्दत से इंतजार रहता है.

छोटे शहरों के लोग ऐसे भी एन्जॉय कर सकते है 😂😂
Ashish Retarekar

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