नाश्ते की टेबल पर अध्यात्म चर्चा

(मां सुबह से शिवपूजन की तैयारी में व्यस्त है, बेटा कॉलेज और पिता ऑफिस जा रहा है। मां मेरा नाश्ता दे दीजिए और आपको भी तो हमारे साथ ही ऑफिस निकलना है फिर देर क्यों कर रही हो।)

मां – ये लो तुम दोनों का फलाहार।

बेटा – पापा, एक बात समझ नहीं आयी, एक तरफ़ तो माँ को 20 साल हो गए आई टी फील्ड में जॉब करते हुए और दूसरी तरफ़ पूर्ण पुराने ज़माने की मां ओ की तरह पूजा पाठ।

पापा -आधुनिकता और भारतीय संस्कृति का जबरदस्त मिक्सर है तुम्हारी मां। सब जल्दी आ जाना शाम को शिवरात्रि के पूजन की तैयारी करना है।

(दोनों हँसते हैं)

मां – फलाहार करो और जूस पियो। दोनो याद रखना आज हमें कुछ भी बाहर का तलभुना नहीं खाना है। आती जाती श्वांस में श्वांस में शिवो$हम जपना मत भूलना। श्वांस लेते समय शिवो$ और छोड़ते समय *हम*। ओके।

बेटा और पापा – ओके

बेटा – मां शिवो$हम का मतलब तो शिव ही मैं ही हूँ हुआ, लेकिन हम तो इंसान है तो शिव कैसे हुए?

मां – बेटे यह बताओ इस ग्लास में क्या है?

बेटा – जल (पानी)

मां – नदी और समुद्र में क्या है?

बेटा – जल

मां – बादलों में क्या है? और तुम्हारे भीतर भी क्या है?

बेटा – बादल में भी जल है और मुझमें भी जल है।

मां – क्या इस रूम में हवा में जल है?

बेटा – हां है, वाष्प रूप में जल है। जब ठंडी फ्रीज़ का पानी ग्लास में डालो तो आसपास की हवा ठंडी होकर ग्लास में जल की बूंद रूप में चिपक जाती है।

मां – बेटा यह शरीर ही शव है और इसके भीतर शिवतत्त्व ही भरा हुआ है। संसार ही श्मशान है क्योंकि यहां सब का मरना निश्चित है। पुर्वजों की फ़ोटो अल्बम में देखो सब थे लेकिन अब नहीं है। हम भी एक दिन नहीं रहेंगे। तो हम शिवतत्व रूपी सागर की एक बूंद मात्र हैं।

इस श्मशान रूपी संसार में स्वयं के शरीर को शव समझ के आज साधना की जाती है। इसके भीतर जो अमर आत्मा है वो अमर शिव का ही एक अंश है। जैसे ग्लास में पानी है वैसे ही इस शरीर रूपी ग्लास में आत्मजल है। जिस दिन यह टूटा जल जल मे मिल जाएगा।इस आत्मबोध को स्थिर करने केलिए हम लोग शिवो$हम जपेंगे।

बेटा – मां शिव के त्रिशूल का क्या मतलब है।

मां – संसार के शूल(कष्टों) को दूर हम स्वयं कर सकते हैं, यदि शिव की तरह हम भी त्रिशूल(उपासना, साधना, आराधना) नियमित करें। जीवन मे धारण करें तो हम सच्चिदानंद स्वरूप आनन्दमय रहेंगे।

बेटा – और गंगा और चन्द्रमा को कैसे धारण करें?

मां – अच्छी पुस्तकों के स्वाध्याय से ज्ञान गंगा सदैव सिर पर विराज मान रहेंगी। जटाओं अर्थात संसार की उलझन में भी स्थिर रखेंगी। चन्द्रमा मन का प्रतीक है, स्वाध्याय का निरन्तर चिंतन मनन अर्थात स्वाध्याय का पाचन हमारा मन शीतल और स्थिर रखेगा। नियमित ध्यान से तृतीय नेत्र – विवेक दृष्टि मिलेगी।

पापा – अच्छा ये बताओ गले में सर्प धारण क्यूँ?

मां – सांसारिक परिस्थितियों से यदि क्रोध रूपी सर्प भीतर फुंकारे तो उसे विवेकपूर्वक वश में कर लें। उसकी गहराई समझ उसका बाद के शमन कर दो।

बेटा – हम जब स्वयं शिव है तो डमरू हमारे सन्दर्भ में क्या होगा?

मां – वैज्ञानिक सिद्ध कर चुके हैं कि यह संसार एक कम्पन और एक ध्वनि मात्र है। पूरे ब्रह्मांड में जो नाद गूंज रहा है वो भीतर भी है। भीतर के नाद से शक्ति श्रोत से जुड़ना ही डमरू धारण है।

बेटा – रुद्राक्ष का क्या अर्थ है हमारे सन्दर्भ में?

मां – रुद्राक्ष की खासियत यह है कि यह ख़ास तरह का स्पंदन करता है और बाह्य परिस्थितियों की ऊर्जा से प्रभावित नहीं होने देता। अतः स्वयं को रुद्राक्ष बनाओ, बाह्य कुरीतियों और Peer pressure से प्रभावित न हो। साथ मे दूसरों को सन्मार्ग दिखाओ।

शिवलिंग का पूजन अर्थात स्वयं हम जिसका अंश है उनके निराकार शिव का पूजन। जल निराकार है वैसे ही शिव निराकार है।

विभिन्न प्रोसेस से जल से विद्युत पैदा कर सकते हो। इसी तरह विभिन्न साधनाओं से स्वयं के भीतर शिवतत्त्व जो प्रसुप्त अवस्था मे है उसे जागृत कर शक्तिसम्पन्न बन सकते हो।

पापा – अरे बाते करने में वक्त का ध्यान नहीं रहा, पहले मुझे ऑफिस छोड़ना, फिर आदित्य को कॉलेज फिर तुम ऑफिस जाना। हां लौटते वक्त बेलपत्र और फूल ले लेंगे। शाम को रुद्राभिषेक भी तो करना है।

(अरे जल्दी करो,मेड को आवाज देते हैं सेरेना दरवाजा बंद करो। हम तीनों जा रहे हैं।)

🙏🏻श्वेता चक्रवर्ती
डिवाइन इंडिया यूथ असोसिएशन

तीनों साथ साथ भजन गुनगुनाते हैं

अमर आत्मा सच्चिदानद मैं हूँ,
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं।

अखिल विश्व का जो परमात्मा है,
सभी प्राणियो का वो ही आत्मा है,
वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ।
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥

जिसे शस्त्र ना काटे ना अग्नि जलावे,
गलावे ना पानी, ना मृत्यु मिटावे,
वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ।
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥

अजर और अमर जिसको वेदों ने गाया,
यही ज्ञान अर्जुन को हरी ने सुनाया,
वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ।
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥

अमर आत्मा है, मरण शील काया,
सभी प्राणियो के भीतर जो समाया,
वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ।
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥

है तारो सितारों में प्रकाश जिसका,
जो चाँद और सूरज में आभास जिसका,
वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ।
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥

जो व्यापक है जन जन में है वास जिसका,
नहीं तीन कालो में हो नाश जिसका,
वही आत्मा सचिदानंद मैं हूँ,
शिवोहं शिवोहं शिवोहं शिवोहं॥

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