उनकी बहु, नहीँ उनकी पत्नि की बेटी

अंतरा की नई – नई शादी हुइ थी। उसकी और उसके पति पुनीत की लव मेरेज थी और वो दोनो अब हनीमून से लौट आए थे। शादी मे ली तक़रीबन 1महीने की छुट्टी मे अब 10 दिन ही शेष थे और क्योंकि अंतरा एक पढ़ी लिखी और नौकरीपेशा लड़की थी सो उसे और पुनीत को अब बस कुछ ही दिन पुनीत के घर मे रहकर mumbai जाना था….वही अपनी नई दुनिया बसानी थी।
जिस दिन से अंतरा ने अपने ससुराल मे क़दम रखा था उसकी सासुमा ने उसे उसकी माँ जो कि पास के ही शेहेर मे रहती थी, की कमी महसूस नही होने दी थी…पुनीत उनका इकलौता बेटा था और वो एक बड़े संयुक्त परिवार और घर का हिस्सा थे। सभी के अपने अपने पोर्शन्स थे तो साथ भी थे और स्वतंत्र और अलग भी…. इतना प्यार…दुलार…और लाड़ तो शायद उसे अपनी माँ से भी नही मिलता था जो पुनीत की माँ ने कुछ ही दिन मे उसे दिया था…जहाँ शुरु मे अंतरा सास बहु के खराब रिश्तों की अनगिनत कहानियाँ सुनकर और ये सोचकर परेशान और आशंकित थी कि पुनीत की पसंद होने की वजह से शायद उसके ससुराल मे और खासकर उसकी सास से उसे प्यार नही मिलेगा वही माँ ने तो उसे अपनी बेटी ही बना लिया था। एक बार पुनीत को किसी बात के लिये कुछ की पर अंतरा के कई बार देर तक सोते रहने….ठीक से कुछ खाना ना बना पाने और ऐसी बहुत सी छोटी छोटी गलतियों को नज़रंदाज़ कर जाती….जिन चीजो पर अक्सर नई बहु को ढेरों उलाहने मिल जाते है वही वो एक शब्द भी नही कहती….यहाँ तक की घर मे मौजूद दूसरी महिलाओ के समक्ष हमेशा उसकी तारीफ करती और उसकी गलती भी समय रहते ढक लेती और सुधार देती…बहुत खुश थी अंतरा अपनी सास रूपी माँ को पाकर और बस कुछ ही दिन मे उनमें आपसी प्यार, सम्मान और समझ का एक अनूठा रिश्ता बन गया था।
जैसे जैसे अंतरा के जाने के दिन पास आ रहे थे माँ मुरझा सी रही थी। बार बार उनकी आँखे भर आती…और लगता जैसे वो बहुत कुछ कहना चाहती है पर कुछ बोल नही पा रही थी। अब शादी को तक़रीबन 20 दिन बीत चुके थे और अंतरा और पुनीत के मुम्बई जाने मे बस 4 दिन शेष थे और अब तक अंतरा ने सबकुछ अच्छा ही देखा था…माँ उसके मुम्बई जाकर नई गृहस्ती ज़माने की चिंता को समझ पा रही थी और उसे यथासम्भव सलाह और सहायता भी कर रही थी..पर एक रात हुए वाक़ये ने माँ के जीवन के सबसे बड़े और भयानक सच को अंतरा के सामने उजागर कर दिया था…
एक दिन रात का समय था और डाइनिंग टेबल पर खाना लगभग लग चुका था और अंतरा के ससुर जी और पुनीत टेबल पर बैठ चुके थे….माँ और अंतरा खाना सर्व कर रहे थे और जैसे ही पापाजी ने पहला कौर मुँह मे डाला तो जोर से माँ पर चील्लाये और वो जैसे ही पास गई उनपर ही खाने की थाली फैक दी……माँ की पूरी साड़ी पर सबज़ी और दाल गिर गई थी….उनका हाथ गरम दाल पड़ने से जल गया था और मुँह से आवाज़ नही निकल रही थी….जलने के दर्द से ज्यादा तो पापाजी के तानो और अपशब्द उन्हे भेद रहे थे..तार तार हो रहा था उनका सम्मान…
अंतरा के तो जैसे पैरो तले ज़मीन ही खिसक गई थी…..जो हो रहा था वो उसकी समझ से परे था…बस इतना समझ पाई थी कि आज दाल मे माँ नमक डालना भूल गई थी और ये सब उसके फलस्वरूप हुआ था……उसे तो यकीन ही नही आ रहा था की हमेशा गम्भीर और शांत रहने वाले पापाजी इतना गुस्सा कर रहे थे और इतने अपशब्द माँ को कह रहे थे….उससे भी ज़्यादा हैरानी की बात ये थी कि पुनीत ये सब शांति से देख रहे थे और मूक थे….इतनी छोटी सी बात के लिये किसी के साथ उसके ही घर मे ऐसा दुर्व्यवहार हो सकता है?…क्या ये गलती इतनी बड़ी थी?….क्या माँ जैसी व्यक्ति जो इतनी सरल…सौम्य…और प्यार बाँटने वाले स्वभाव की थी और जिनका शायद पूरा जीवन अपने घर और परिवार कॊ समर्पित रहा था उम्र के इस पड़ाव पर इस व्यवहार के लायक थी?…यहाँ तक की उनके बेटे ने भी ना उनके पक्ष मे कुछ कहा था और ना किया था….क्या माँ का सम्मान कोई मायने नही रखता था उसके लिये या आदी हो चुके थे वो इस सब के?….या फ़िर पिता कॊ आजीवन माँ का सम्मान ना करते पा बेटे ने भी इसे स्वीकार कर लिया था..
प्रश्न ही प्रश्न थे…और दुख और हैरानी ने अंतरा कॊ झक्जोर दिया था…
खाना तो अब क्या खाना था और जब पापाजी और पुनीत वहाँ से चले गए तो अंतरा ने तुरंत माँ के जले हाथ कॊ ठंडे पानी मे रखा…. फ़िर बर्फ लगाई …उन्हे मरहम लगाया और जैसे माँ की आँखो से अनवरत आँसू बह रहे थे वो भी रोने लगी……उस रात तो नही पर अगले दिन जब वो दोनो अकेली थी…तब माँ ने उसे वर्षों से खुद्पर हो रही घरेलू हिंसा और सालों तक हुए उनके सम्मान…उनकी आत्मा और शरीर पर हुए घावों की कहानी सुनाई तो अंतरा का मन रो पड़ा…पापाजी ने गत 25 वर्षों के उनके और माँ के वैवाहिक जीवन मे माँ कॊ किसी और चीज़ की कमी नही होने दी पर अपने गुस्से और पुरुषत्व के चलते कभी उन्हे सम्मान नही दिया…और बचपन से बड़े होते तक पुनीत ने भी ये सब देखकर इस सब से समझौता कर लिया था…आज सक्षम थे अपनी माँ का साथ देने के लिये फ़िर भी चुप थे….
हैरान थी अंतरा माँ की इतने सालों की पीड़ा भरी कहानी सुनकर और उससे भी ज़्यादा इस बात से कि उनके जैसी अच्छे महिला के साथ ऐसा अमानवीय व्यवहार एक संयुक्त परिवार मे सालों से हो रहा था….पुनीत की असम्वेद्ना या अकर्मण्यता पर भी गुस्सा आ रहा था और पापाजी के लिये जो सम्मान उसके मन मे था अब समाप्त हो चुका था…
दो दिन बीते और अब अंतरा और पुनीत के मुम्बई जाने का समय आ गया था….जब taxi आई तो पूरा परिवार उन्हे विदा करने के लिये खड़ा था..पापाजी ने जब अंतरा कॊ शगुन देना चाहा तो उसने मना कर दिया…उसके इस व्यवहार से सब हैरान थे तभी जब पुनीत ने सारा सामान देखा तो पूछा, “ये एक्ट्रा suitcase किसका है अंतरा”….
जब अंतरा ने कहा की ‘माँ का’ तो पूरा परिवार सकते मे आ गया। उसने आगे कहा, ” माँ हमारे साथ जाएँगी पुनीत…ये घर उनके लायक नही है..वो अब हमारे साथ रहेंगी”…पापाजी माफ कीजिए पर मैं अपनी माँ के सम्मान के साथ और समझौता नही करूँगी…मेरी माँ ये बिहेवियर डेसेर्वे नही करती…अब वो और नही सहेंगि…
पूरे परिवार के सामने हुए इस खुलासे से पापाजी का सिर अब शर्म से झुक गया था..किस हक से माँ कॊ रोके ये उनकी समझ मे नही आ रहा था..उनकी बहु..नहीँ उनकी पत्नि की बेटी ने अपनी माँ के सम्मान की रक्षा के लिये क़दम उठा लिया था….पुनीत का हाथ भी अपनी माँ के कंधे पर था और सारा परिवार अब उन्हे जाते देख रहा था।
किसी भी व्यक्ति का सम्मान शायद उसके लिये सबसे बड़ी सम्पत्ति होता है…किसी भी चीज़ का आभाव या कमी एक बार सहनीय होती है पर अपने सम्मान पर हुइ चोट असहनीय होती है….शारीरिक घाव एक बार भर जाते है पर मन पर हुइ चोट कभी कभी आजीवन रहती है…किसी भी रिश्ते मे सम्मान का स्थान सबसे ऊपर होता है और यदि अपने ही घर मे और अपनो से ये ना मिले तो उससे अधिक दुख की बात नहीँ है।
यू तो हर व्यक्ति मे इस बात की समझ स्वयम ही होनी चहिए की हर रिश्ते की मर्यादा ना लाँघे पर कई बार कुछ घरो मे स्त्रियों के साथ वर्षों तक दुर्व्यवहार होता है…सब मूक दर्शक बनकर उसे देखते है….अपने बच्चे भी कभी कभी साथ नहीँ देते पर जो अंतरा ने किया वो वाकई सराहनीय था….जिस सास ने उसे सिर्फ बेटी कहा ही नहीँ माना भी था उनके प्रति उसने अपना फ़र्ज बाखूबी निभाया और अपनी माँ कॊ वो सम्मान लौटाया जिसकी वो हमेशा से हकदार थी।

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