“जल रहा है आदमी “-ज्ञानेश्वर उपाध्याय जी

रक्त पिपासु बेरहम दिल हो गया है – आदमी
बिन धुंआ और आग का जल रहा हर आदमी
मजहब, लालच, स्वार्थ, पर मर रहा हर आदमी
जिंदगी मुश्किल बनाता जा रहा हर आदमी
धैर्य, शक्ति, आसवान भूल गया आदमी
कर्म योग धर्म योग भूल रहा आदमी
चित्त, चिंता शक्ति अपना खो रहा है आदमी
भ्रम जाल झूठ बाते कर रहा है आदमी
मातृ भक्त पितृ भक्त खो रहा है आदमी
जन्म भूमि को भी अपने भूक रहा आदमी
तर्क शक्ति अर्थ शक्ति झेल रहा आदमी
आदमी के साथ अब तो खेल रहा आदमी
राग रंग द्वेष में पल रहा है आदमी
भेष भाषा आजकल बदल रहा है आदमी
खड़े है ऐसे मोड़ पे की क्या करेगा आदमी
सोच अगर सोच लो तो बात है आदमी
आदमी तू आदमी से प्यार करे आदमी
छोड़ इस जहां को एक दिन जायेगा हर आदमी
कहे ज्ञानेश्वर अब तो बनो आदमी से आदमी
दर्द जो ना दे किसी को वही तो है “सच्चा आदमी”

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