परंतु पहले किसकी पूजा करूं , पितामह.?

जब खैरात मे मिले “खांडवप्रस्थ” को पांडवों ने एक बेहतरीन राज्य ,”इंद्रप्रस्थ” मे कनवर्ट कर दिया तो ज्ञानेश्वर श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को “राजसूय” यज्ञ करने की सलाह दी..!! लेकिन उसे करने से पहले “जरासंध” का वध करना आवश्यक था..!!

जो कि अठ्ठानवे राजाओं को हराकर, उन्हे कैद करके बैठा था..!! उसे मात्र दो राजाओं को और हराना था..!! इस प्रकार वो, सौ राजाओं का शीष , बली-स्वरूप भगवान शंकर को चढ़ाता और अमरत्व का वरदान उनसे प्राप्त कर लेता..!!

श्री कृष्ण ने ब्राह्मण स्वरूप मे अर्जुन और भीम के साथ जाकर ,जरासंध को मल्लयुद्ध के लिये ललकारा, कि वो तीनो मे से किसी एक को चुन ले युद्ध के लिये..!!

जरासंध वीर था , उसने भीम को चुना..!!

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भीम के साथ उसका प्रलयंकारी मल्लयुद्ध हुआ..भीम ने उसे चीर कर दो पाटो मे , विपरीत दिशा मे फेंक दिया..!!

विपरीत दिशा मे फेंकने का आईडिया भी , गोवर्धन-धारी का ही था..!!

और वो दिन आया …जब युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ सम्पन्न किया और राज्याभिषेक की तैयारी की गई..!!

इस समारोह मे भारत-वर्ष के सभी महाराजाओं, रथियों-महारथियों, ऋषियो-मह्रषिंयों, आचार्यों को आमन्त्रित किया गया..!!

राज्याभिषेक से पहले भीष्म-पितामह ने युधिष्ठिर से आह्वान किया कि वो , पधारे हुए अतिथियों का सत्कार करें, अलग-अलग उनकी पूजा करें..!!! उनकी चरण-धुली धोए..!!

युधिष्ठिर ने कहा……परंतु पहले किसकी पूजा करूं , पितामह.?

जो सर्वश्रेष्ठ हो..!!

तो पहले आपकी पूजा करूं या महर्षि व्यास की..??

ना ही मेरी और ना ही महर्षि व्यास की, आज आप धर्म के प्रतिबिंब हैं राजन, आपकी आंखो को तो ये देख लेना चाहिये था कि इस सभा मे ही नहीं, पूरे त्रिलोक मे “यदुवंश शिरोमणी वासुदेव श्री कृष्ण” के अतिरिक्त किसी और की पूजा तो हो ही नहीं सकती..!!

और मै ये इसलिये नहीं कह रहा हूं कि ये मुझे प्रिय हैं, ये मै इसलिये भी नहीं कह रहा हूं कि मै इनका भक्त हूं..!!
क्या आप ये नहीं देख रहे कि भारत-वर्ष के इन जगमगाते मुगुटों के बीच मे ये ऐसे प्रतीत हो रहें हैं जैसे तारों के बीच मे चन्द्रमा..!!

और जब चन्द्रमा के दर्शन हो रहे हों, तो तारों की ओर कौन देखता है..??

जैसे अंधकार की चुनरी औढ़ कर सोई हुई धरती , सूर्य के सुभागमन से जाग उठती है, और वायुहीन स्थान वायु का स्पर्श होते ही जीवित हो उठता है, सांस लेने लगता है…वैसे ही “देवकीनंदन” के इस राज्य सभा मे उपस्थित होने से ये राज्य सभा जगमगा भी रही है और सांस भी ले रही है..!!

तो क्या इनके यहां होते हुए स्वयं महर्षि व्यास, अग्रपूजा के लिये आगे बढ़ सकतें हैं..???

महर्षि व्यास ने, “ना” मे गरदन हिला दी..!!

ये यहां है, और इनके होते हुए, कोई और पूजनीय हो ही नहीं सकता……यदि किसी को कोई आपत्ती हो तो, अवश्य बोल सकता है..!!

“मुझे आपत्ती है”

शिशुपाल ने हुंकार भरी..!!!

युधिष्ठिर के आदेश पर जब नकुल “वासुदेव श्री कृष्ण” की पूजा कर रहे थे तो शिशुपाल ने हुंकार भरी..

“नकुल..ये तुम किसकी पूजा कर रहे हो..??”

प्रिय शिशुपाल..ये तुम क्या कह रहे हो..?? युधिष्ठिर ने कहा..!!

तुम चुप रहो..और तुम ये ना समझना कि ये राजे-महाराजे, ये महारथियों का समुदाय तुम से डर कर तुम्हारे राजसुय यज्ञ मे भाग लेने आया है..!! अर्रररे..हम तो ये सोच कर आये थे कि धर्म का अर्थ , तुम हम सबसे अधिक जानते हो, इसलिये तुम्हे सम्राट बन जाने दें.!!

परंतु तुमने इस “ग्वाले” की अग्रपूजा करके, सारे राज-समाज को अपमानित किया है..!!

शिशुपाल..अगर एक शब्द और मुंह से निकाला तो जान से मार डालेंगे..!! भीम और अर्जुन ने एक साथ गर्जना की..!!

युधिष्ठिर ने भीम और अर्जुन को ये कहकर शांत कर दिया कि शिशुपाल हमारे अतिथि हैं..!!

महाराज ठीक कह रहें हैं..प्रिय अर्जुन अतिथेय की मर्यादा का उल्लंघन ना करो..!! वासुदेव ने कहा..!! तुम बोलते रहो शिशुपाल.. क्योंकि ये तुम्हारे ही बोलने का दिन है..!!

वासुदेव श्री कृष्ण के चेहरे पर हमेशा की तरह मुष्कान थी..!!

अर्रररे..बोलूंगा क्यों नहीं..क्या मै तुझसे डरता हूं..मै तो ये भी नहीं मानता कि तू मेरे मामा वसुदेव का पुत्र है..और तुझको तो ये स्थान ग्रहण करने का अधिकार ही नहीं है..!!

स्वर्गिय महाराज कंस के दास, नंद के पुत्र का मुख्य अतिथि के स्थान पर बैठना, हम सबका घोर अपमान है..!!!

इससे पहले कि “बलदाऊ” का गुस्सा चरम पर पहुंचता, वासुदेव ने इसारा करके उन्हे शांत रहने को कहा..!!

ये भीष्म-पितामह तो सठिया गये हैं..इनकी आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा भी ढोंग है ढोंग..!!

शिशुपाल कन्टिन्यूड विथ हिज नोन सैंस..यदि ये प्रतिज्ञा ना भी करता तो ये वीर्यहीन, ये निसहाय, ये नपुन्सक ब्रहमचारी ही रहता..!!

शिशुपाल..यदि ये मेरे प्रिय युधिष्ठिर के राजसुय यज्ञ का समारोह ना होता और तू अतिथि ना होता तो मै तेरी जीभ काट लेता..!! इस बार भीष्म-पितामह की अग्नी धधक उठी..!!

पूरी सभा मे बैठे अतिथियों के मन मे शोले धधकने लगे..!!

देयर वाज फायर..यू नो..बट ओनली वन परसन वाज स्टिल स्माईलिंग.. एण्ड गैस..हू वाज इट..??

“ज्ञानेश्वर श्री कृष्ण”

ये आपका अपमान नहीं कर रहा पितामह, ये मेरा अपमान कर रहा है..इसे बोलने दीजीये..!! श्री कृष्ण ने पितामह को शांत किया..!!

इस नपुन्सक ने प्रस्ताव रखा, और “शापित पांडु” के पुत्रों ने झट से उसे स्वीकार भी कर लिया..!!ये उचक्का उस स्थान पर बैठ गया जहां बैठने का साहस कोई भी दास पुत्र नहीं कर सकता..!!

ये कह कर …शिशुपाल स्टैप्ड फॉरवर्ड, टोवार्ड्स हिज डैथ.

ना ये ऋतुज है, ना राजा और ना ये आचार्य..तो फिर नंदगांव की गायों का दूध दोहने वाले इस ग्वाले को किस दृष्टी से तुमने पूजा के योग्य मान लिया .. युधिष्ठिर..???

“आप सुन रही है ना बुआ…अब मै क्या करूं..?? श्री कृष्ण ने मन ही मन कहा..!!!

शिशुपाल..यदि तू अब भी चुप ना हुआ तो .. तेरी जिव्हा आगे बोलने मे तेरा साथ नहीं देगी…बलदाऊ अत्यंत क्रोधित हो चुके थे..!!

इसे बोलने दीजीये..दाऊ..!! आप भूल गये कि मैने बुआ को क्या वचन दे रखा है..!!! सौ अपराधों तक मै इसे अवश्य क्षमा करूंगा….. श्री कृष्ण ने कहा..!!

तुम्हे क्षमा करना हो तो करो , मै नहीं कर सकता ..इसने पितामह का अपमान किया है ,बुआ कुंती का अपमान किया है, इसने तुम्हारा अपमान किया है..और तुम इसे दंड देने बजाय.. यहां खड़े-खड़े मुस्करा रहे हो..??

मस्करा नहीं रहा हूं दाऊ..गिन रहा हूं..!! यदि तुम्हे और कुछ कहना हो तो कह डालो शिशुपाल..क्योंकि अभी तुम तीन अपराध और कर सकते हो..!!

कृष्णा वाज ओन हिज वे….ऑफ प्रोमिस टू हिज बुआ..!!!

अर्रररे..तु मुझे क्या डराता है मायावी…और तू तीन अपमानो की बात करता है ..मै यहीं खड़े-खड़े तीन सौ बार तेरा अपमान करूंगा..!!और तेरा मान ही क्या है रे….जो मै तुझे अपमानित करूं..!!

गिन…ये हुआ ..अठ्ठानवे….तू एक तुच्छ चोर है..ये हुआ निन्यानवे…तुने महाराज कंस का नमक खाया और उन्ही का वध कर डाला..तू कृत्घ्नविरूपी है…ये हुआ पूरे सौ..!!

शिशुपाल’स इनिंग वाज ओवर..!!!!

बस अब रुक जाओ शिशुपाल…. सदा आनंदमयी मुस्कान वाले श्री कृष्ण की त्योंरियां चढ़ गई..!!

अर्रररे…तू तो एक बहुरुपिया है..!!!जो राजाओं के वस्त्र पहन कर इस सभा मे आ बैठा है..!!! शिशुपाल डिड नॉट स्टॉप्ड हिम सैल्फ..!!!

दैन सडनली देयर वाज ए मिरेकल..!!!

दी वासुदेव टर्न्ड इन टू सुदर्शन-धारी..!!!

सुदर्शन चक्र चला और शिशुपाल का शीष…धड़ से अलग कर के ही लौटा…!!

सुदर्शन चक्र से वासुदेव की तर्जनी उंगुली से रक्त की धार फूट पड़ी..!!

वहीं खड़ी “यज्ञ-उत्सर्जित” द्रौपदी ने अपने आंचल को फाड़ कर ज्ञानेश्वर के पट्टी बांद दी..!!

“आज मै तुम्हारा ऋणी हो गया द्रौपदी..समय आने पर एक-एक धागे का ऋण उतारूंगा”

“दिया दंड श्री कृष्ण ने,किया खंड अभिमान,
आंचल चीरे द्रौपदी , बांध दिये भगवान..!!!

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