पता नहीं क्यूँ घबराहट सी लग रही थी … इसलिये घर चला आया

अमित और संध्या का विवाह हुये दो साल होने को आ गये …..

अमित अब सुधर चुका है…. सुधर चुका है मतलब अब हर महीने लडकिया नहीं बदलता …. संध्या ने सारी बुराईयाँ जानते हुये भी अमित को अपनाया …. बदले में अमित ने दिया भरोसा कि भले ही वह उसके जिंदगी की पहली लड़की ना हो पर आखरी जरूर होगी ….

और वाकई में अमित ने अपना वचन निभाया भी। ….

लेकिन कहते हैं दिल जो है जरा सी फिसलन भरी राह पर भी खुद को संभाल नहीं पाता …. लाख रोकने की कोशिश करो फिसल जाता है …. न चाहते हुये भी उसके कदम उन गीली राहों की ओर बढ ही जाते हैं ….

और दिल के सामने तो नैतिकता, विश्वास, वचन जैसे बड़े-बड़े शब्दों ने घुटने टेके हैं ….

दिमाग कब दिल पर विजय पा पाया है..?

अमित को कोई पसंद करने लगी है …. यह जानते हुये भी की वह विवाहित है ….अमित उस लडकी का मन न पढ पाये इतना भी अनाड़ी नहीं हुआ है ….

मर्द लाख दूसरों को वफादारी की नसीहत दे, मौका लगते ही चौके के लिये स्ट्रेट ड्राइव लगा ही देता है …. और अमित तो सदा से यही करता आया है ….

अमित ने संध्या को धोखा देने की ठान ली है … साथ ही खुद को यह समझा लिया है कि आखिर जब मैं संध्या को हर खुशी दे ही रहा हूँ तो इस थोड़ी ऐश मौज से -जिसके बारे में संध्या को कभी पता भी नहीं चलेगा- कर ही लूँ तो किसी को क्या दिक्कत है? ….

हम ना कभी एक दूसरे को कॉल करेंगे … ना मैसेज करेंगे … ना कोई सवाल करेंगे … सिर्फ मिलेंगे और अलग होते ही भूल जाया करेंगे की शर्त के साथ इस रिश्ते की शुरूआत हो चुकी है। ….

अमित नयी लड़की के साथ फिल्म देखने निकल पड़ा है …. स्क्युरिटी चेक को पार करते ही दोनों एक दुसरे का हाथ थाम लेते हैं …. शादी हो जाने के बाद भी इस स्थिति में खुद को ला लेने को अमित किसी उपलब्धि से कम नहीं समझता … वह सोचता है कि यह कोई नयी बात तो नहीं ….

लेकिन जैसे जैसे कदम आगे बढ रहे हैं अमित असहज सा हो रहा है …. हर निगाह जो उसपर से गूजर रही है वह जैसे कोई सवाल सी करती हो …. हर आँख में जैसे उसके लिये नफरत सी हो …. हर निगाह में जैसे तिरस्कार सा हो …. हर आँख जैसे संध्या की ही आँख हो ….

दोनों अपनी टिकट के अनुसार अपने सीट पर बैठ जाते हैं। …..

चारों तरफ अँधेरा है सिर्फ फिल्मी परदे की धुंधली सी रोशनी है …

अमित ने जानबूझकर कॉर्नर टिकट लिया है ताकी फिल्म के दौरान कभी साँसे गर्म हो जाये तो अगल बगल कोई है यह सोचना ना पड़े …. और शादी के बाद अगर किसी और के साथ आये हैं तो इन सब बातों के अलावा और औचित्य ही क्या …. स्वाद बदलना ही तो प्रथामिकता है ….

फिल्म चलती जा रही अमित के कान में लडकी की फुसफसाहट के साथ साथ ….

हाथ और होंठ भी अपने काम में मग्न है ….

लेकिन दिल जैसे अपने फैसले से अब खुश सा नहीं लग रहा …. वह जैसे शरीर को छोड़ एकांत में चला जा रहा है …. उसे संध्या की याद आ रही है …. उसे दिये हुये वादे याद आ रहे हैं …. संध्या की आँखे मन से हट ही नहीं रही ….

हाथ और होंठ भी अब ठहर गये ….

अमित अपनी सीट पर निढाल सा पड़ा है ….

लडकी सीने पर सर पूछती है …. अच्छा यह बताओ अगर तुम्हारी पत्नी भी यह सब करे और तुम्हें पता चले तो क्या बर्दाश्त कर पाओगे? ….

अमित के पास कोई जवाब नहीं है ….

उसे अब उस लडकी का स्पर्श चुभ सा रहा है ….

वहाँ का अँधेरा डरावना लग रहा है ….

वहाँ की हवा जैसे गायब सी हो गयी …. दम घुटने लगा ….

– चलो मुझे निकलना है काम है….
– लेकिन फिल्म तो पुरी होने दो?…

-नहीं, जाना जरूरी है ….
-पर एकदम से क्यूँ? ….

– कोई खास बात नहीं, बस जाना जरूरी है …..
– ठीक है,चलो!!

दोनों थियेटर से बाहर निकल रहे हैं …

लडकी के कहने के बाद भी अमित धीरे नहीं चल रहा ….

अब लडकी पिछे छुट रही है ….

अमित उससे बहुत आगे निकल गया है ….

पार्कींग से गाड़ी निकाल वह सड़क पर बेतहाशा गाड़ी भगाये जा रहा है….

मेन सड़क पर ट्राफीक की वजह से रूकना ना पड़े इसलिये गल्लीयों से निकल रहा है ….

आज वह अपने जीवन की सर्वश्रेष्ठ ड्राइविंग कर रहा है। ….

रास्ते में हर साड़ी वाली महिला देख उसकी बेचैनी और बढती सी जा रही है ….

वह वर्षों की दूरी पल भर में पूरी करना चाह रहा है ….

घर आ गया है। …

दरवाजे की घंटी की आवाज सुन संध्या ने दरवाजा खोला …

अमित परेशान है इसकी गवाही उसकी आँखे और चेहरा दे चुके ….

वह सोफे पर बेफिक्र सा पड़ा है … संध्या पानी लेकर आती है …

आज जल्दी क्यूँ आ गये? …परेशान से क्यूँ हो? ….किसी ने कुछ कहा क्या?…. इन जैसे लाख सवाल करने पर भी अमित सिवाय उसे गले लगाने के कुछ और ना कर पाया ….

हर वक्त बोलते रहने वाले के पास आज एक शब्द भी नहीं है ….

– पता नहीं क्यूँ घबराहट सी लग रही थी … इसलिये घर चला आया …

– अब ठीक हो?
– हाँ, अब बिलकुल ठीक हूँ ….

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