कल और काल का बोध जीवन को नई दिशा देता है

हिंदी में कुछ शब्द बहुत ही अनूठे हैं। यदि इनमें निहित अर्थ को हम आत्मसात कर लें तो जीवन में क्रांति हो सकती है। इन शब्दों का प्रयोग हम प्रायः करते रहते हैं, परंतु इनके अर्थ एवं महत्व से वंचित रह जाते हैं। हिंदी में भूत एवं भविष्य में आने वाले दिन के लिए ‘कल’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। यह संयोग नहीं अपितु तर्कसंगत है कि भूत और भविष्य के लिए समान शब्द का प्रयोग किया गया है। ऐसा असाधारण अद्वितीय प्रयोग किसी अन्य भाषा में नहीं है। मन का आस्तित्व कल में ही होता है- भूत हो या भविष्य। वर्तमान में तो मन कांपने लगता है।

अपने को जीवित रखने के लिए यह मन की चतुराई है कि मन ‘कल’ में ही स्थिर रहता है और सघन हो जाता है। इससे कोई भेद नहीं होता कि मन भूत में है या भविष्य में। परिणाम तो एक जैसा होता है, भूत-भविष्य के अंधकार में खोकर वर्तमान के उजाले से वंचित रहना। प्रायः मन भूत और भविष्य में पेंडुलम की तरह डगमगाता रहता है। हिंदी में मृत्यु को काल भी कहते हैं। जिस मनुष्य का मन ‘कल’ में निवास करता है, वह काल का शिकार हो जाता है और जो मनुष्य वर्तमान में रहता है वह कालातीत हो जाता है। कल और काल का बोध हमारे जीवन को नई दिशा प्रदान करता है और जीने की कला सिखाता है। इससे जीवन ऊर्जा भूत-भविष्य के जंजाल से मुक्त रहती है और मनुष्य स्वयं को भूतकाल के पछतावे एवं भविष्य की आशंकाओं से स्वतंत्र पाता है।

‘अमन’ शब्द को हम व्यक्तियों, समुदायों, राज्यों, देशों के बीच शांति के लिए प्रयोग करते हैं। अमन शब्द की संरचना पर ध्यान दें तो यह मन शब्द का विलोम है। मन के न होने की स्थिति को अमन कहते हैं। अमन शब्द का प्रयोग हम मूलतः बाहरी शांति के लिए करते हैं। अमन शब्द मनुष्य की आंतरिक शांति की कुंजी है। अमन यानि मन के न होने की अवस्था ही चित्त को शांत कर सकती है। मन की क्रीड़ा हमारी पीड़ा का कारण है। जिसमें मन न रहा, यानि शांत हो गया, वह अमन को प्राप्त हो गया। अमन में प्रतिष्ठित हमारी मनोदशा ही हमें सृजनता के नए आयाम देती है।

अमन की दशा ही हमें वर्तमान में केंद्रित रखती है। मन का गतिशील रहना ही मन को जीवित रखता है। ठहराव में मन मृतप्राय हो जाता है। इसलिए अ-मन यानी शांति। मौन होना कोई बाहरी घटना नहीं है। यह एक आंतरिक बोध है। लोग कुछ भी नहीं बोलकर मौन व्रत रखते हैं, परंतु मन चलायमान रहता है और अंदरूनी संवाद जारी रहता है। अमन की स्थिति में मौन फलीभूत होता है। यह अतिशयोक्ति नहीं कि हमने अपने साधु-संतों को मुनि भी कहा है। मन के मौन होने को ही मुनि कहते हैं।

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