मुसीबतों और चमत्कारों की राह

“जीवन एक चुनौती है। यदि आप सोचते हैं कि जीवन सुगम है और यह आदर्श है, तो या तो आपको गलतफहमी है या फिर आप मनोरोग के शिकार हैं।”

हर दिन बाधाएं आती हैं। ऐसा कोई इंसान नहीं है, जिसके साथ सुबह जागने पर शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक या आध्यात्मिक रुप से कुछ गड़बड़ न हो। इस तथ्य को स्वीकार करें कि आपके सामने बाधाएं आने वाली हैं। वे हर एक के सामने आती हैं। लोग कहते हैं, “मैं ही क्यों?” लेकिन जरा बताएं, आप ही क्यों?

“आपके लक्ष्य की राह हमेशा सुगम नहीं रहने वाली। बाधाएं उत्पन्न होंगी और समस्याएं सामने आएंगी, लेकिन आपको याद रखना है कि आप किस लक्ष्य का पीछा कर रहे हैं…बड़ी तस्वीर को न भूलें और छोटी दुर्घटनाओं या छोटी असफलताओं को अपनी राह न रोकने दें।

लोग चुनौतियों से जो सबसे बड़ी चीज हासिल करते हैं, वह भौतिक नहीं, अांतरिक होती है। सबसे बड़ा लाभ वह होता है, जो वे बनते हैं। जब आप किसी चुनौती का सामना करते हैं और फिर उस चुनौती से उबरते हैं, तो खुद पर आपका विश्वास बढ़ जाता है, अपनी योग्यताओं में आपका विश्वास बढ़ जाता है और आप किसी दूसरी बड़ी चीज को भी कर सकते हैं। बाधाओं से उबरना शायद सबसे बड़ा उपहार है — उस चीज से कहीं अधिक बड़ा, जो आपको मिलती है। क्योंकि यह एक ऐसी चीज है, जो आपसे कभी नहीं छीनी जा सकती।

एक बार जब आप निराशाओं, चुनौतियों, उतार-चढ़ावों आदि की श्रृंखलाओं के पार आ जाते हैं, तो आप हमेशा बेहतर हो जाते हैं, क्योंकि इस प्रक्रिया में आपको जबर्दस्त आत्मविश्वास हासिल होता है।

अगर आपने अपने जीवन में कभी किसी ऐसी चीज का सामना किया है, जिसमें आपके पास उबरने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था, तो आपको ऐसी शक्तियां हासिल करते हैं, वे आपके चरित्र का निर्माण करती हैं और आपको पहले से भी ज्यादा बड़े व्यक्ति में रुपांतरित कर सकती हैं। शिशु को जन्म देने वाली महिलाएं यह बात अच्छी तरह जानती हैं। बच्चे को पालने और उसकी देखभाल करने के लिए मांओं को मजबूत होने की जरुरत होती है। उन्हें धैर्य, सहनशक्ति, संकल्प और शारीरिक सहनशक्ति की जरुरत होती है। प्रसव पीड़ा और जन्म देने का अनुभव उन्हें मातृत्व हेतु आवश्यक शक्तियां व गुण देकर तैयार करता है, ताकि वे उस काम को अच्छी तरह कर सकें । सबसे मुश्किल समय के दौरान शक्ति बनाए रखने के कारण ही हममें से कोई लोग अपनी मांॅ को हीरो मानते हैं ।

“जब आप सचमुच कदम बढ़ाकर चुनौती को अंगीकार करते हैं और फिर उससे उभर जाते हैं, तो आपका वह हिस्सा कहता है, “हे भगवान, आपने यह कर दिया!” आप वहां बैठकर बस यह नहीं कह सकते, “मैं खुद से प्रेम करता हूं।” आत्मसम्मान अर्जित किया जाता है।”

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