एक छोटे से स्कूल की ‘बड़ी’ टीचर

बड़े बड़े शहरों में छोटी मोटी बाते होती रहती है- शारुखान के इस डॉयलाग को अगर उलटा करके देखे तो मतलब कई बार छोटे छोटे शहरो में बड़ी बड़ी बाते हो जाती है, बड़े फैसले ले लिए जाते है,ऐसे फैसले जिसके बारे में हम और आप सोचते ही रह जाते है |नेहा मिश्रा ने भी देवास के अपने छोटे से स्कूल में ऐसा हि एक फैसला लिया जिसे लेने से पहले अकसर नामी स्कूल भी दस बार सोचते है|

नेहा ने अपने स्कूल में उन स्पेशल बच्चो को एड्मिसन दिया जिनके लिए बाकि स्कूलों के दरवाजे हमेशा के लिए बन्द कर दिए जाते है, हालाकि नेहा का स्कूल “स्पेशल स्कूल ” नही है लेकिन वो मानती है की इन बच्चो को स्पेशल कह देने भर से ही हमारा कर्तब्य खत्म नही होता है, उन्हें मुख्यधारा में शामिल करने के लिए उन्हें मुख्यधारा के स्कूल में जगह देनी होगी.

आइये पढ़ते है नेहा के जिंदगी की कहानी:

मेरा नाम नेहा मिश्रा है मै बनारस की रहने वाली हु, मै वहा एक छोटा सा स्कूल चलाती हु वैसे तो मेरा स्कूल उन बच्चो के लिए है जिन्हें सोसायटी ‘नार्मल’ कहती है , लेकिन पिछले तीन सालो से मै उनसे डील कर रही हु , जिन्हें “स्पेशल चाइल्ड” कहा जाता है हुआ कुछ यु था कि एक दिन मेरे पास एक बच्ची आयी जिसे बाकि के स्कूलों ने एड्मिसन नही दिया . उसकी जीभ थोड़ी मोटी थी जिसके वजह से उसे बोलने में दिक्कत होती थी वो ठीक से बोल नही पाती थी. कही भी एड्मिसन न मिलने के बाद वो हमारे स्कूल आयी तब मैंने एक फैसला लिया मुझे इन पेरेंट्स की मदद करनी है | इस बच्चे को एड्मिसन देना है मै खुसकिस्मत हु कि भगवान ने मुझे एक राह दिखाई मैंने ऐसे बच्चे को भी एड्मिसन देने का फैसला लिया जिन्हें स्कूल मना कर देते है सिर्फ इसलिए की वो दिब्याग या आटिस्टिक है. मै ऐसे बच्चो को एड्मिसन देती हु मै उनके लिए काम कर रही हु मुझे बहुत खुशी है.

जिस बच्ची को मैंने एड्मिसन दिया था उस पर मेहनत करने में दो साल लग गये अब वो सात साल की हो गयी है और अब वो पूरी वर्णमाला बोलने लगी है|उसका डिक्सन साफ हो गया है जब पिटिईम में उसके पैरेंट्स आते है तो अपने बच्चे का प्रोग्रेस देखकर उनके आँखों में आंसू आ जाते है इस बच्ची के बाद मेरे पास एक और ओटीस्तिक बच्चा आया. पहली बच्ची कोइतना आगे ले जाने के बाद मुझे ऐसा लगा जब मै इस बच्चीपर काम कर सकती हु तो दुसरे बच्चे पर क्यू नही किया जा सकता जो की गूंगा था | यह बच्चा बोल नही पाता है, सब समझता है पर उसका हाथो पर काबू नही है यह मेरे लिए एक बड़ी जिम्मेदारी थी. उस बच्चे को बाकि के बच्चो के साथ क्लास में बैठाना है और सबसे जरुरी बात की इसके लिए टीचर को तैयार करना है. उसके पेरेंट्स ने बताया था कि जहा उसकी बड़ी बेटी पढ़ती है, वह इस बच्चे का एड्मिसन हुआ था, लेकिन बच्चा दिन भर खिड़की के पास दिन भर बैठा रहता था, यह तक की सुसु-पोट्टी भी उसी में कर देता था, टीचर उसकी तरफ ध्यान ही नही देती थी| मुझे लगा एड्मिसन लेने के बाद, मै इसके साथ न्याय नही कर पाई तो बात वही की वही रह जाएगी|इसी तरह एक बच्चा 9 साल का है लेकिन दिमाग 4 साल के बच्चे जितना है.

उसे भी ओटिज्म है मैंने उसके माता-पिता को बताये बिना ही उसे ऐनुवल फंक्शन में डांस के लिए तैयार किया उसे एकदम बिच में खड़ा किया और जब उसका पर्फोर्मेन्स पूरा हुआ तो मैंने उसके पेरेंट्स को स्टेज पर बुलाया ताकि वो अपने दिल की बात बोल सके. उस बच्चे के माता-पिता ने रोने के अलावा कुछ नही कहा. मुझे लगता है की यही मेरी कमाई है|

इस कहानी से यही शिछा मिलता है की यदि हम कुछ भीं करने के लिए ठान ले तो बिलकुल कर सकते है यदि हम हिम्मत न हारे तो. कुछ भीं करते समय बहुत सी कठिनाईयों का सामना करना पण सकता हैं उस बिच हमे अपनी दृढ़ता को बनाये रखना होगा|तभी हम हमारे मन्जिल को प्राप्त कर सकते है.
 

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