ऐसे इमानदारो से भगवान् ही बचाए

7-8 साल पहले की बात है , फैक्ट्री में एक गार्ड था, फैक्ट्री में ही रहता था । एक दिन रात को 8 बजे गेट पर कुछ हंगामा हुआ तो जाकर देखा उस गार्ड ने एक लेबर का कॉलर पकड़ रखा है और उसे खींचते हुए ऑफिस की तरफ ले जा रहा है । उससे पहले उस लेबर को वो चार-पाँच चांटे टिका चुका था । पूछने पर बोला .. भैया ये अपनी पुरानी चप्पल के बदले नया सेंडल पहनकर जा रहा था । मेरी नज़र पड़ गयी । अब इसको ‘ बाबूजी’ (एमडी) के पास ले जा रहा हूँ । उस लेबर को तीन चार चांटे ऑफिस में भी पड़े । गार्ड के तगड़े नंबर बन गये ।

सुबह मालिक के फैक्ट्री आने का टाइम था साढ़े दस बजे और हर महीनें सुबह दस – साढ़े दस के बीच में एक दो बार इस गार्ड को कभी छत पर वेस्ट में दो-तीन जोड़ी जूते मिलते, तो कभी किसी मशीन के पीछे स्लीपर – सैंडल मिलती , तो कभी गोडाऊन में कोई कार्टन फटा हुआ मिलता और ये बंदा वो जोडियाँ लेकर मालिक के सामने पहुँच जाता । कभी रात वाले गार्ड की नौकरी खा जाता तो कभी स्वीपर की । बड़ा वाला ईमानदार बन चुका था वो मालिक की नज़र में ।

एक संडे को जब फैक्ट्री बंद थी तब मशीनों में कुछ मेंटेनेन्स के काम से मैं दो तीन बन्दो को लेकर दोपहर में फैक्ट्री पहुँचा । मुझे देखकर वो फैक्ट्री के सामने वाले कबाड़ी के यहाँ से भागता हुआ आया । मैंने पूछा वहाँ क्या कर रहा था ? बोलता है ..भैया बस ऐसे ही बैठा था , चाय पी रहा था । वो कबाड़ी फैक्ट्री के बिल्कुल सामने ही था तो मेरी भी राम-राम होती थी उससे । शाम को घर आते समय मैंने उससे जाकर पूछा तो उसने बताया कि .. आपका गार्ड 70 किलो लोहा बेचकर गया है ।

साल में तीन चार बार वो गाँव भी जाता था । इंदिराजी और सोनियाजी की रायबरेली का था वो । ट्रेन उसकी हमेशा रात की होती थी.. 11 बजे की शायद । एक बार मैं नाइट में रुका हुआ था तो दस बजे इसने दो बैग लाकर गेट पर रखे । पूछ लिया मैंने .. किधर ? बोला ..गाँव जा रहा हूँ । जब वो बाकि सामान लेने ऊपर गया तब मैंने उसका एक बड़ा बैग खोल दिया । बैग में उसी कम्पनी के तीन जोड़ी जूते और तीन चार जोड़ी स्लीपर रखे हुए थे । वो जूते चप्पल मैंने टेबल पर सजाकर रख दिये । वो दस मिनिट बाद नीचे आया बाकि के सामान के साथ तो नजारा देखते ही उसके होश उड़ गये।

‘भैया गलती हो गयी । अब दोबारा कभी नही होगा । बाबूजी को मत बताना । बेटी का का स्कूल छूट जायेगा । नौकरी चली जायेगी ।’ मैंने बोला .. ये सब बैग में भर और जा। मैं किसी को कुछ नही बता रहा लेकिन तुने दोबारा कभी ‘ईमानदारी’ और ‘चोरी पकड़ने’ वाला ड्रामा किया तो उस कबाड़ी को भी बुलाकर ऑफिस में पेशी करवा दूँगा ।

अगले चार साल तक जब तक उसने काम किया …फिर कभी ईमानदारी वाला ड्रामा नही खेला । जो जितना ईमानदारी का ढिंढोरा पीटता है वो उतना ही बड़ा बेईमान निकलता है ।

IAS मैडम अब जिंदगी में कुछ भी करें लेकिन कैमरे के सामने दो ईंटे तोड़कर ईमानदारी का ड्रामा तो बिल्कुल नही करेगी ..इसकी पुरी ग्यारंटी है । 

Reference – Ashish Retarekar7 January at 00:57 · 

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