आपकी बिटिया अमेरिका मेंं है – Motivational Story

आ गई मेरी बिटिया..रुक रुक वहीं रुक, ज़रा तेरी नज़र तो उतारनें दे”अम्मा नें आँखों में आए खुशी के आँसू पोछते हुए कहा..फिर नमक मिर्च ऊपर से नीचे घुमाते हुए जाने क्या क्या बोलती हुई बाहर चली गई.. दिव्या के भी आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे,मन तो कर रहा था दौड़ कर अम्मा के गले लग जाए लेकिन उफ्फ ये रिवाज हर बार बेड़ियों में बाँध लेते हैं।अम्मा नमक मिर्च बाहर गली के कोने में फेंक कर आई फिर आरती उतरी तब जाकर दिव्या उनके गले लग पाई।माँ बेटी का मिलन देखकर बाबा के भी कब से रुके आँसू बह निकले,पूरे दो साल बाद जो मिल रहे थे अपनी बिटिया से।फिर गला साफ करते हुए कहा”सारा प्यार यहीं दरवाजे पर ही लुटा दोगी या बिटिया को अंदर भी ले चलोगी”।तो अम्मा और दिव्या दोनो मुस्कुराकर अंदर चले गए।

अंदर जाकर दिव्या नें घर को यूँ निहारा जैसे बरसों बाद बिछड़ा बच्चा अपनें घर लौटा हो।आँसू रुक नहीं रहे थे।उसका बस चलता तो घर की एक एक चीज़ को गले से लगा लेती।तभी अम्मा नें कहा”जा बिटिया नहा आ,इतनें लंबे सफर के बाद लौटी है,फिर खाना खाएँगे”हाँ अम्मा कहती हुई अपनें कमरे की ओर बढ़ गई।कमरे में पहुँचकर फिर आँसू अविरल बहनें लगे,अम्मा बाबा नें उसका कमरा वैसा ही रखा था जैसे वो छोड़ गई थी,कुछ भी इधर से उधर ना हुआ था।उसकी अलमारी पर चिपका अमेरिका का नक्शा जिसपर उसनें बड़ा सा दिल बना रक्खा था,मानो उसे मुँह चिढ़ा रहा था।उसने झट से बढ़कर उस नक्शे को फाड़कर डस्टबीन में डाल दिया और वैसे ही जाकर शॉवर के नीचे खड़ी हो गई।मानो शरीर के मैल के साथ मन में छुपी घुटन को भी बहा देना चाहती हो।

नहा कर आई तो देखा अम्मा नें गर्म गर्म पास्ता परोस रखा था थाली में”ये क्या अम्मा, और क्यों”उसनें आश्चर्य से पूछा”देख ना बिटिया तेरे बाबूजी जाने क्या क्या खरीद लाए हैं बाज़ार से कहते हैं तुम्हारी बिटिया अब दाल चावल थोड़ी खाएगी,दो साल से अमरीका में है,जबर्दस्ती ये सब बनाना सीखा है हमनें”अम्मा नें बाबूजी की शिकायत करते हुए कहा तो ,उसको हंसी आ गई, जानें कितनें सालों बाद यूँ खिलखिलाकर हंसी होगी,घर आकार सबकुछ कितना हल्का हल्का सा लग रहा था,बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोककर कहा”अम्मा तुम तो हमको दाल चावल ही दो,ये सब खाने थोड़े ही आए हैं हम,और हाँ आज हम आप दोनो के बीच में सोएगेंं ,जैसे बचपन में सोते थे”दिव्या नें दाल चावल थाली में परोसते हुए कहा,तो अम्मा नें उसकी बलाएँ लेते हुए कहा”मैं ना कहती थी,हमारी बिटिया कभी ना बदलेगी”।

रात को इतनें सालों बाद अम्मा बाबूजी के बीच सोकर ख़ुद को कितना सुरक्षित महसूस कर रही थी वो,उनके सो जाने के बाद वापस से आँसुओं नें अपनी जगह ले ली और मन बचपन की गलियों में पहुंच गया,जब वो अक्सर बाबूजी से कहती” बाबूजी हम ना बड़े होकर अमेरिका जाएँगे”,तो बाबूजी कहते अरे बिटिया हमको छोड़कर इतनी दूर जाओगी,फिर हम कैसे रहेंगे तुम्हारे बिना?तो वो अपनी बाँहे उनके गले में ड़ालकर कहती “हम आपको और अम्मा को भी लेकर जाएँगे”तो बाबूजी बढ़कर उसका माथा चूम लेते।बचपन की ये बाते जाने कब उसका सपना बना गई, और पढ़ाई में अव्वल दिव्या नौकरी कर अमेरिका जाने का सपना देखनें लागी।छोटा सा मध्यवर्गीय परिवार था उनका ,अम्मा बाबूजी,भैया और वो।बाबूजी नें कभी पैसों को उनके सपनों के आड़े ना आने दिया।लेकिन भैया की एक्सिडेंट मेंं हुई अचानक मौत नें पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया।दिव्या नें भी अपने सपनें की तिलांजलि दे दी।और यहींं भारत में रहकर नौकरी करनें का फैसला लिया।

लेकिन होनी को तो कुछ और ही मंजूर था।बुआजी उसके लिए एक रिश्ता लेकर आई।लड़का अमेरिका में रहता था,माँ बाप नहीं थे चाचा चाची नें पाला पोसा था।बाबुजी को लगा भगवान नें उनकी बिटिया का सपना पूरा करने के लिए ये रिश्ता भेजा है,और उन्होनें दिव्या को भी समझा बुझा कर मना ही लिया।शादी से पहले अंशुमन से ज्यादा बात नहीं हो पाई थी क्योंकि जब यहाँ दिन होता तो वहाँ रात।पैंकिग करते समय जब वो अपने सर्टिफिकेटस् भी रखनें लगी,तो बाबूजी नें कहा अब इनकी क्या जरूरत बिटिया ,बेकार में वजन बढ़ेगा,और पिर वो हजारों सपने आँखों में लिए अमेरिका आ गई। लेकिन उसे क्या पता था ये हसीन सपनें किसी डरावनी हकीकत में तब्दील होनें वाले हैं।अंशुमन एक प्रकार की मानसिक बिमारी से ग्रसित था,शायद उसनें बचपन में बहुत गरीबी देखी थी,इसलिए अब केवल पैसे कमाना और उसे जमा करना ही उसके जीवन का ऐकमात्र उद्देश्य था,वो अपने कमाए पैसे को बिल्कुल खर्च नहीं करना चाहता था,दिव्या से भी शादी इसलिए की,ताकि घर की साफसफाई के लिए मुफ्त में एक नौकरानी मिल सके।आफिस जाते समय वो मेनड़ोर में ताला लगा जाता था।घर में सिर्फ जरूरत भर का सामान था,खाना भी वही बनता जो वो कहता,वरना दिव्या की खैर नहीं, वो भी सीमित जितना जिंदा रहनें के लिए आवश्यक था।दिव्या के माँ बाबा से भी महीनें म़े केवल एक बार बात करवाता वो भी सिर्फ दो मिनट के लिए,अपने सामनें बिठाकर, ताकि दिव्या अपना दु:ख ना कह सके।दो साल से दिव्या उसके चंगुल से भागने की असफल कोशिश करती रही,करती भी क्या सारे दरवाजे खिड़कियां अंशुमन नें बंद कर रखे थे।आखिर एक झरोखे को तोड़कर किसी तरह पड़ोसी को अपनी व्यथा बताई।उस पड़ोसी नें साहयता का आश्वासन देकर पुलीस को ख़बर की,तब जाकर पुलीस नें उसे अंशुमन के चंगुल से छुड़वाया,और फिर उन्होनें ही उसके भारत आने की व्यवस्था की।”अम्मा के करवट बदलनें से अतीत से वर्तमान में आ गई।सोंच तो रक्खा था आते ही अम्मा बाबूजी को सबकुछ सचसच बता देगी।लेकिन उनके चेहरे की खुशी और संतोष कि उनकी बिटिया खुश है,नें उसे कुछ कहनें नहीं दिया।

कुछ दिन रहकर जाते समय चुपचाप अपनें सर्टिफिकेटस् बैग में रख लिए।अम्मा बाबूजी उसे छोडने एयरपोर्ट आए थे।उनके जाते ही दूसरे गेट से बाहर आ गई,और खुद से कहा”इतना काबिल बनूंगी कि आपको इस बात का कभी भी दुख ना हो कि आपकी बिटिया दुखी या कमजोर है,बस कुछ दिन और इस भ्रम में रह लीजिए कि आपकी बिटिया अमेरिका मेंं है,और खुश है”।कहती हुई दिव्या बढ़ गई अपना भविष्य ख़ुद सवारने।

मेरे विचार:

हर चमकनेंं वाली चीज़ सोना नहीं होती। इसलिए रिश्ता तय करनें से पहले,ठीक तरह से छानबीन कर लेना बहुत जरूरी है,जरूरी नहीं कि हर बार धोखा ही मिले..लेकिन सबकी किस्मत दिव्या की तरह अच्छी हो और बचकर निकलने का मौका मिले ये जरूरी तो नहीं।

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