भाभी, ननद और सासू माँ

” बहु साक्षी बहु कहाँ हो तुम ,पता नहीं काम छोङ कर कहाँ चली जाती हो” साक्षी की सासुमाँ ने आवाज लगाई तो साक्षी अपना नाश्ता छोङकर उठने लगी तो उसकी ननद ने उसका हाथ पकङकर बैठा दिया और बोली ” पहले आप नाश्ता कीजिए ” साक्षी बोली ” दीदी माँ जी गुस्सा करेंगी, मुझे जाने दीजिये ” तो उसकी ननद सुजाता बोली ” मैं माँ से बात करती हूँ आप बैठिए”।

सुजाता नीचे जाकर अपनी माँ से बोली ” माँ कम से भाभी को नाश्ता तो चैन से करने दिया करो, सुबह सबसे पहले उठतीं हैं और सबसे बाद में नाश्ता करती हैं तब भी आप शोर मचाती रहती है” ।

“तू बङी आई भाभी की हितैषी, उसके लिए माँ से लङ रही है” सुजाता की माँ बोली ।

” माँ मैं लङ नहीं रही, जायज़ बात कर रही हूँ, जब से शादी हुई है कभी प्यार से बात की है आपने भाभी से,उम्र में मुझ से छोटी है…शादी पहले हो गई तो क्या उन्हे भी तो प्यार और सम्मान चाहिए ,भाभी में भी अपनी बेटी देखिए आपने सारी जिंदगी उनके साथ ही रहना है”सुजाता ने तो बोल दिया ये सब…लेकिन माँ कहाँ चुप रहने वाली थी” उसके साथ क्यों रहना है ; हाथ पैर सलामत है हमारे, बनाकर खा सकते है…पता नहीं चार दिन नहीं हुए घर में आए सब पर जादू कर दिया है इस लङकी ने…मेरे बच्चे भी मेरे खिलाफ हो गए हैं “।

साक्षी की शादी को अभी दो ही महीने हुए थे उसके पति विमल और उसकी ननद सुजाता दोनों बहुत अच्छे थे, ससुर जी थे नहीं लेकिन सासुमाँ बहुत तेज थी और बहु पर हुक्म और रौब जमाना अपना अधिकार समझती थी,बहु ही काम करे…. बेटी को काम को हाथ भी नहीं लगाने देती थी ; सुजाता बेशक माँ के डर से काम नहीं करती थी लेकिन भाभी से हमदर्दी पूरी रखती थी और उसका साथ जरूर देती थी।

शाम को सुजाता को देखने लङके वाले आने वाले थे ,नाश्ते के बाद साक्षी तैयारियों में लग गई और जिद करके सुजाता भी हाथ बंटाने लगी; शाम को लङके वाले आए उन्हे सुजाता पसंद आ गई …मुँह मीठा करके लङके वाले चले गए तो सुजाता बोली ” देखा माँ आपने भाभी के शुभ कदम उनके आते ही मेरा रिश्ता तय हो गया…नही तो कब से आप कोशिश कर रही थी ” अरे ऐसा कुछ भी नहीं है जो काम जब होना होता है तभी होता है ।

सुजाता की शादी हो गई…उसका ससुराल अच्छा था सब लोग अच्छे थे…सुजाता का स्वभाव अच्छा होने के कारण वो सबको अच्छी लगती थी और मायके भी कम ही जाती थी।

साक्षी और उसके पति माँ का बहुत ध्यान रखते थे और बहुत सेवा करते थे लेकिन वो कभी खुश नहीं होती थी,एक दिन सासुमाँ ने जानबूझकर अपना पैर गलीचे में उलझा लिया और सुजाता को फोन कर दिया ” मेरी तबियत बहुत खराब है मिलने आजा ” सुजाता के आते ही शिकायतों का पिटारा जो खुला तो फिर…” बहु मेरा ध्यान नही रखती, अपने में मसत रहती है ..मेरी तो किस्मत खराब है …मैं तो बोझ बन गई हूँ बहु बेटे पर ” सुजाता बोली ” माँ भाभी को दोष मत दो…मैं उन्हे बहुत अच्छी तरह जानती हूँ वो खुद खाएं न खाएं आपको खिलाएंगी भी और आपका ध्यान पूरा रखेंगी,भाई सेवा करें न करें …माँ ये जो झूठ सच बोलकर भाभी को नीचा दिखाने की कोशिश करती है अगर यही सब मेरी सासुमाँ मेरे साथ करें तो …मेरी मम्मी जी मेरी ननद से ज्यादा मुझे प्यार करती है क्योंकि उनका मानना है मै उनकी बहु नहीं बेटी हूँ और माँ आप भी उनसे कुछ सीखिए जिससे भाभी आपकी बेटी बन सके और मैं भी निश्चिंत होकर ससुराल में रह सकूँ ” तभी साक्षी आई और दीदी कहकर उससे लिपट गई तो सासुमाँ को अहसास हो गया जो मेरी बेटी से इतना प्यार करती है अगर मैं भी अच्छी बन जाऊं तो मेरा जीवन स्वर्ग बना देगी।

तभी बङे प्यार से सासुमाँ बोली ” तुम दोनों ननद भाभी बाते करो मैं चाय नाश्ता लाती हूँ, बहु तुम्हारी पसंद के पकौङे और सुजाता की पसंद का हलवा बनाती हूँ ” नहीं नहीं माँ जी आपकी चोट तो सुजाता बोली ” भाभी तुम चिंता न करो बस पकौङे और हलवे का मजा लो और माँ बहु नहीं साक्षी बेटी कहो” ।

सासुमाँ ने नाश्ता तैयार करके आवाज लगाई ” साक्षी बेटी आ जाओ नाश्ता तैयार है और मेरी बङी बेटी सुजाता को भी ले आना “।

How useful was this post?

Click on a star to rate it!

Average rating / 5. Vote count:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

%d bloggers like this: