पितृ दिवस #पर पिताजी को समर्पित मेरी कविता

#पितृ दिवस #पर पिताजी को समर्पित मेरी कविता🌹🙏 ……………………………. पिता! उस बूढ़े बरगद के समान होता है। जो हर हाल में अपनी जड़ को, जमीन में जमाए अपनी संतान को पितृत्व की छाया में पल्लवित और पुष्पित करता है। और नित नवीन संस्कारों से आगे बढ़ने की राह दिखाता है। ठीक उसी तरह जैसे एक … Read more

सुनो तुम……….!!!

( मेरी खुद की चुनिंदा, पसंदीदा कविताओं से एक कविता…. मेरी लिखी हुई) सुनो तुम……….!! तुम्हारे बायें हाथ की हथेली पे मेरे नाम की जो हल्की सी लकीर है…. उसे खुरच कर काश….. अपने साथ ला पाती !! अपने बदन की खुश्बू जो तुम्हारे कमरे में छोड़ आई हूँ- और जिसे दीवारों ने ओढ़ रखा … Read more

पता ही नहीं चला

*पापा की परी* ससुराल जाते ही, सारा काम सीख जाती है l कभी हाथ जला, कभी बाजू जली, कभी उंगली कटी, कभी अंगूठा कटा, कभी पट्टी बांधे, कभी बैंडेड लगाए, कभी सिरप पिए, कभी दवाई खाए, कभी सिर को बांधे, बिना थके, बिना रुके, काम करती जाती । पापा की परी ससुराल जाते ही, सारा … Read more

बुद्धिजीवी

बुद्धिजीवी …………….. बुद्धिजीवी! जी हाँ! बुद्धिजीवी। बुद्धिजीवी का मतलब बुद्धि के बल पर जीने वाला। ये होते हैं बड़े ही एक्टीव, पर सेलेक्टिवनेस के साथ। जब जी चाहा, हो गए एक्टिव। नहीं तो शयन मुद्रा में, चले गए लम्बे विश्राम के लिए। चाहे शहर की गलियों में, दंगे-फसाद हों या फिर रक्तपात हो,आगजनी हो, लूटपाट … Read more

जी हाँ ! पत्रकार। बिकाऊ नहीं राष्ट्रवादी – रोहित सरदाना जी को मेरी श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित ये छोटी सी कविता

जाने-माने राष्ट्रवादी पत्रकार रोहित सरदाना जी को मेरी श्रद्धांजलि के रूप में समर्पित ये छोटी सी कविता💐💐🙏🙏 ……………………………………………………. जी हाँ ! पत्रकार। बिकाऊ नहीं राष्ट्रवादी, पूरी तरह से विशुद्ध राष्ट्रवादी। जो डरता नहीं था बल्कि, आँखों में आँखें डालकर। झूठ का पर्दा हटाकर, सच का आईना दिखाता। राष्ट्रवादी कभी मरा नहीं करते, वो तो जिन्दा … Read more