क्या लिखूँॽ कैसे लिखूं ? किस तरह लिखूं?

 

_सोचता हूँ कि क्या लिखूँॽ कैसे लिखूं ?और फिर किस तरह लिखूं?_

वैसे सोचने को बहुत कुछ है, परन्तु आज के भौतिकता प्रधान युग में भला आदमी अपनी रोजी रोटी के अलावा कुछ कहाँ सोचता हैॽ सोच की सारी परिधि बस रोजी–रोटी, घर गृहस्थी की आवश्यकता, पत्नी बच्चों की नित नयी नयी फरमाइशों में सिमट कर रह गयी है। घूम–फिर कर आदमी के सारे सोच का एकमात्र केन्द्रबिन्दु उसके और उसके परिवार के भरण–पोषण , अधिक से अधिक सुख–सुविधाओं के जुटानें में ही निहित रह गया है I

भला किसे फुर्सत है कि समाज–देश के बारे में भी इमानदारी से कुछ सोचे, और सोचना शुरू भी करे तो घर–परिवार, नातेदार–रिश्तेदार कहेंगे कि भैया जी सठिया गये हो, अरे बेमतलब के काम में माथापच्ची क्यों करते हो भाई ! देश–धर्म गया चूल्हेभाड़ में, अपनी गगरी में पिसान हो तो दूसरे भी पूछते हैं, अपनी तिजोरी में धन हो तो दूसरे भी कर्ज देने में अपनी शान समझते हैं और तुम हो कि चले हो देश–समाज की सोचनेॽ आप कौन सी अग्नि परीक्षा दोगे कि आप वास्तव में देश–समाज की भलाई सोच रहे हो , लोग इसी बात को कह कह कर न जाने कितना पैसा देश का बाहर भेज दिया Iअगर उस तरह सोच रहे हो तो ठीक है I

अरे भाई कुछ सोचना ही है तो यह सोचो कि अपने बाल बच्चों के लिए तुम क्या सोच रहे होॽ सभी अपना–अपना सोच रहे हैं और तुम पगलाये हो भाई जो दूसरों की सोच रहे होॽ अरे यह कलयुग है कलयुग। अब न कोई दधीचि है और न भगीरथ। खाओ–पीओ मौज मनाओ ही आज का आदर्श है। लाईफ को इंज्वाय करिए ना, व्यर्थ के पचड़े में मत फँसिए। ना भाईǃ नाǃ जिस समाज की सोचने की बात करते हो उस समाज को अपने बारे में सोचने दो, तुम्हारे बारे में तो कोई नहीं सोचता, तुम क्यों इस पचड़े में पड़ते होॽ अच्छा है कि अपने बारे में सोचो।

चलो भाईǃ कुछ अपने ही बारे में सोचते हैं। सोचने के लिए वक्त चाहिए और अब वक्त ही किसी के पास कहाँ रह गया हैॽ सारा वक्त तो हर कोई ,बस पैसा, पैसा, पैसा। सोच का केन्द्रबिन्दु पैसा और उसकी सारी परिधि में बस पैसा। पैसे के लिए आदमी झूठ प्रपंच रचता है। पैसे के लिए तन–मन समर्पित कर रहा है । सब कुछ गँवा करके,आत्मा गिरवी रखने के बाद भी इंसान के पैसे की भूख मिटती ही नहीं। बस और बस केवल पैसा। पैसा मानो पैसा न होकर भगवान् ही हो गया है।

परमात्मा की बात तो छोड़िए वह तो कब का तिरोहित हो चुका, जब आत्मा ही नहीं तो परमात्मा कैसाॽ जब स्व का ही बोध नहीं तो परम् का बोध कैसे होॽ सोचता हूँ यह अर्थ ही अनर्थ कर रहा है। सारे फसाद की जड़ यह पैसा ही है। न दिन को चैन न रात को नींद। अच्छा होता यह पैसा न होता। पैसे ने आदमी का सुख–चैन छीन लिया है।

हम पैसा किस लिए कमाते हैंॽ पैसे की जरूरत ही क्या हैॽ आप कहेंगे भाई साहब पैसे से रोटी मिलती है, पैसे से आदमी को तन ढकने का कपड़ा मिलता है, आवास पैसे से ही बनाया जा सकता है, फिर आदमी पैसा क्यों न कमाएॽ पैसा ही तो वह साधन है, जिससे हम आराम की जिन्दगी जी रहे हैं। पैसा न होता तो रोटी कपड़ा और मकान कैसे मिलताॽ हारी–बीमारी में भी पैसा ही काम आता है। जीवन को सरल और सहज तो यह पैसा ही बनाता है। इस लिए भैया पैसा कमाओ, पैसा बनाओ और पैसे के बारे में सोचो।

पैसे की सोच में सोच–सोचकर जमाना पागल हुआ जा रहा है। पैसा खाना, पैसा पीना, पैसा ओढ़ना, पैसे का ही बिछौना। पैसे की बीवी, पैसे के बेटी–बेटा, पैसे के रिश्ते और पैसे से इज्जत। पैसा नहीं तो कुछ भी नहीं। पैसा नहीं तो कोई झूठे भी हाल–चाल नहीं पूछता।

इस पैसे की महिमा भगवान् से भी बड़ी होती जा रही है। सृष्टि का मालिक भले भगवान् हो, परन्तु मनुष्य के पैसे ने भगवान् को भी नतमस्तक कर दिया है। अब भगवान् भी पैसे वालों पर कृपा करते हैं। बेचारे निर्धन की कहीं कोई पूछ नहीं। सुनता हूँ– पैसा नहीं तो न्याय नहीं। वकील की फीस नहीं तो घर जाइए। पैसे वाला अपराधी नहीं ठहरता। देश में घोटाले दर घोटाले हो रहे हैं, पर पैसे की माया ने ऐसा जाल बिछाया है कि किसी पैसे वाले को आज तक सजा नहीं मिली। पैसे पर न्याय बिकता है। पैसा है तो सत्य और न्याय भी बिकने को खड़े हैं। पैसा फेंको तो आपके सात खून माफ है। इसलिए भैया कुछ भी करो पर पैसा जरूर कमाओ।

अर्थ ने जीवन के अर्थ को बदल दिया है। पैसा नहीं है तो आपका जीवन निरर्थक है। जीवन का अर्थ तो अब पैसा हो गया है। जब अर्थ ही प्रधान हो गया है तो क्यों निरर्थक की सोचें, क्यों न जीवन को सार्थक करने वाले अर्थ की बातें की जाये।

जरा ठहरें और पुनर्विचार करें।
पैसे के महत्व से इन्कार तो नहीं किया जा सकता पर पैसा ही सब कुछ नहीं है। पैसे से जीवन की साधन–सुविधायें तो खरीदी जा सकती हैं पर जीवन नहीं, दवाएँ तो खरीदी जा सकती हैं पर स्वास्थ्य नहीं, पैसे से रोटी तो खरीदी जा सकती है पर भूख नहीं। अर्थ की भूख ने पेट की भूख, आत्मा की भूख को निगल लिया है। अर्थ की चक्की में जीवन का सार प्रेम बुरी तरह से पिस रहा है। अर्थोपार्जन के चक्कर में पति के पास पत्नी के लिए, माता–पिता के पास अपने प्यारे बच्चों के लिए, बेटे–बेटियों के पास अपने वयोवृद्ध माता–पिता के लिए फुर्सत नहीं। इस अर्थ ने जीवन को ही निरर्थक बना दिया है।

जरा सोचिए यह पैसा क्यों और किस लिएॽ किस सीमा तकॽ
अब वक्त आ गया है कि हमें मिल–जुलकर अर्थ के अनर्थ को मिटाकर जीवन के अर्थ को सार्थक करने वाली एक सुन्दर और टिकाऊ समाज व्यवस्था बनानी चाहिए। जिसमें प्यार हो, एक दूसरे का सहकार हो, संवेदनाएँ हों, जीवन को रसमय बनाने वाले सार्थक और सुरुचिपूर्ण व्यवहार हों।

*जीवन परमात्मा का दिव्य उपहार है, उसे एकमात्र अर्थ के इर्द–गिर्द रखकर निरर्थक नहीं बनाया जाना चाहिए।*

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