मानवता

एक दिन *मानव* पैदल वापस घर आ रहा था। रास्ते में बिजली के एक खंभे पर एक कागज चिपका दिखा। मोटे अक्षरों में लिखा था – *कृपया पढ़ें !!*

फुरसत में था, तो पास जाकर देखा , तो लिखा था, *”इस रास्ते पर मैंने कल एक ₹ 50 का नोट गंवा दिया है। मुझे ठीक से दिखाई नहीं देता। जिसे भी मिले कृपया इस पते पर दे सकते हैं।”*

यह पढ़कर उस पते पर जाने की उत्कंठा हुई क्योंकि महज 50 के एक नोट के लिए खंभे पर इश्तहार लगाना कुछ अजीब लगा।

पता एक गली के आखिर में बनी एक टूटी सी झोपड़ी का निकला। वहाँ जाकर आवाज दी तो एक बहुत दुबली वृद्धा लाठी के सहारे धीरे-धीरे बाहर आई।

उसने बताया कि वह अकेली रहती है। उसके घर में और कोई नहीं है और उसे ठीक से दिखाई भी नहीं देता।

मानव ने कहा, “माँ जी, आप का खोया हुआ ₹ 50 का नोट मुझे मिला है। उसे देने आया हूँ।”

यह सुनते ही वह वृद्धा रोने लगी।

वृद्धा बोली, “बेटा! अभी तक करीब 50-60 लोग मुझे ₹ 50 – ₹ 50 रुपए मेरा खोया नोट बताकर दे जा चुके हैं। मै पढ़-लिख नहीं सकती। आँखों से दिखाई भी नहीं देता। पता नहीं कौन मेरी इस हालत को देख मेरी मदद करने के लिए लिखकर चिपका गया है।”

बहुत कहने पर वृद्धा ने पैसे तो रख लिए, लेकिन मुझ से विनती की, ‘बेटा! मैं भिखारन नहीं हूँ। वह मैंने नहीं लिखा है। किसी ने मुझ पर तरस खाकर लिखा होगा। जाते-जाते उसे फाड़कर फेंक देना।

उसने उसे तो हाँ कहकर टाल दिया, पर उसकी अंतरात्मा ने उसे सोचने पर मजबूर कर दिया कि उन 50-60 लोगों से भी माँ ने यही कहा होगा। किसी ने भी नहीं फाड़ा। उसका हृदय उस अज्ञात दयावान व्यक्ति के प्रति कृतज्ञता से भर गया जिसने इस वृद्धा की सेवा और मदद का यह उपाय ढूँढा।

सहायता के तो बहुत से मार्ग हैं, पर इस तरह की सेवा उसके हृदय को छू गई। उस अकेली वृद्धा की जिंदगी के लिए इससे अच्छा कोई उपाय नहीं है।

अंततः मानव ने उस कागज को फाड़ा नहीं क्योंकि वो *मानव* था।

*हृदय में दयालुता हो तो दीन दुःखी बेसहारा की सहायता करने के बहुत मार्ग हैं।*

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