पता ही नहीं चला

*पापा की परी*
ससुराल जाते ही,
सारा काम सीख जाती है l

कभी हाथ जला,
कभी बाजू जली,
कभी उंगली कटी,
कभी अंगूठा कटा,
कभी पट्टी बांधे,
कभी बैंडेड लगाए,
कभी सिरप पिए,
कभी दवाई खाए,
कभी सिर को बांधे,
बिना थके, बिना रुके,
काम करती जाती ।

पापा की परी ससुराल जाते ही,
सारा काम सीख जाती है।

सास की फटकार,
नंदो के तानों से,
रिश्तेदारों के की नजरों से,
अपने मायके की इज्जत बचाती,
3 खंभों की रस्सी पर, चलना सीख जाती है।

पापा की परी ससुराल जाते ही,
सारा काम सीख जाती है ।

जिस बेटी को फूलों सा संभाला था,
किचन में जाने से रोका था,
डरती थी कि —
कहीं हाथ ना जल जाए, कहीं चोट ना लग जाए, आज वही बेटी गोल-गोल रोटीयां,
स्वादिष्ट खाना बनाना सीख गई,
कुछ सास ने,
कुछ यूट्यूब ने
और
कुछ बढ़ते परिवार ने,
उसे सब कुछ सिखा दिया,
रुकने नहीं दिया ।

पापा की परी ससुराल जाते ही,
सारा काम सीख जाती है

बच्चों की परवरिश करते हुए,
उनके सपनों के पीछे भागते हुए,
उनकी खुशियों को पूरा करते हुए,
उनके मनपसंद जीवनसाथी के साथ उसका घर बसाते हुए,

कब पापा की परी की,
जीवन की शाम हो गई
पता ही नहीं चला !!!!
पापा की परी
कब बूढ़ी हो गई
पता ही नहीं चला !!!!
-डॉ. भूपिंदर कौर

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