तुम उजड़ जाओ…और तुम बसे रहो

सफर में सामने की बर्थ पर एक सरदारजी बैठे थे। सरदारजी से दोस्ती हुई, विभिन्न मुद्दों पर बातें होने लगीं, राजनीति, समाज, राज्य होते हुए बात धर्म तक पहुंची। बातचीत में सरदारजी ने गुरुनानक देव से संबंधित एक रोचक कहानी सुनाई, जो अत्यंत प्रेरणादायी होने के साथ गहरे अर्थों वाली है।

कहानी कुछ इस तरह है, एक बार गुरु नानकदेव अपने शिष्य के साथ घूम रहे थे, घूमते हुए वे एक गांव में पहुंचे। गांव वालों को पता चला कि गुरुदेव आए हैं, तो वे दौड़ पड़े। बच्चों, जवानों, बूढ़ों, महिलाओं ने उनके स्वागत में पलक पांवड़े बिछा दिए, गांव के बाहर उनके ठहरने की उत्तम व्यवस्था की गई, शानदार भोजन बनाया गया। ग्रामीणों ने उनसे धर्म चर्चा की, उनके बताए रास्ते पर ही चलने का संकल्प लिया। उनकी धर्मभीरुता, सरलता से गुरुदेव अत्यंत प्रसन्न हुए। अगले दिन उनकी यात्रा आगे बढ़ी, ग्रामीणों ने रुंधे गले से उन्हें विदा किया।

बाहर निकलकर गुरुदेव ने पलटकर गांव की ओर देखा और अपना दाहिना हाथ दिखाकर कहा ” उज़ड़ जाओ “, और वे आगे बढ़े। साथ चल रहे शिष्य को बड़ा आश्चर्य हुआ, वे सोचने लगे कि गुरुदेव ने यह उल्टा काम क्यों किया, इतने सच्चे, भले लोगों को वरदान की जगह श्राप दे दिया….

शिष्य विचारमग्न हो गए, विचारों के घोड़े दौड़ाने के बाद भी उन्हें इसका रहस्य समझ में नहीं आया, परन्तु वे अपने गुरु को जानते थे, वे यह तो समझ गए कि इसमें कोई न कोई गंभीर बात है, उन्होंने सोचा जब समय आएगा, तो इस संबंध में चर्चा अवश्य की जाएगी।

गुरु नानकदेव घूमते हुए दूसरे गांव पहुंचे, बाहर उन्होंने डेरा डाला, सामान्यतया वे जिस गांव के बाहर पहुंचते थे, तो ग्रामीण उनका स्वागत अवश्य करते थे, परन्तु वह गांव अनोखा था, वहां रहने वालों को पता चल गया कि गुरु नानकदेव पधारे हैं, उसके बाद भी वे उनसे भेंट करने नहीं गए। ठहरने और भोजन आदि की व्यवस्था करना दूर, किसी ने उन्हें पानी तक नहीं पिलाया। शांतचित्त गुरुनानक देव शिष्य के साथ गांव के बाहर ठहर गए। महात्मा थे, इसलिए स्वागत नहीं किए जाने से भी वे प्रसन्न ही रहे, जो कुछ पास में था, वह पा लिया।

अगले दिन उन्होंने वहां से प्रस्थान किया, बाहर निकले, पलटकर गांव की ओर देखा और दाहिना हाथ दिखाकर कहा ” तुम यहीं बसे रहो “…यह सुनते ही साथ चल रहे शिष्य से रहा नहीं गया। उन्होंने बड़ी विनम्रता से कहा, एक बात समझ में नहीं आई। जिन गांव वालों ने आपका स्वागत किया, जो सच्चे लोग थे, उन्हें आपने वरदान की जगह उजड़ जाने का श्राप दे दिया, और इस गांव के लोग, जिन्होंने पानी के लिए भी नहीं पूछा, उन्हें बसे रहने का वरदान दे दिया, ऐसा क्यों ?

प्रश्न सुनकर गुरु नानकदेव मुस्कुराए, उन्होंने कहा अच्छे लोगों का एकत्रीकरण और दुष्टों का फैलाव अच्छा नहीं होता…उस गांव के लोग सीधे सच्चे हैं, धर्म के रास्ते पर चलने वाले हैं, यदि वे एक ही जगह रह जाएंगे, तो धर्म भी वहीं सिमटा रह जाएगा, उनका बिखरना आवश्यक है, क्योंकि उनके चारों ओर बिखरने से अच्छाई, धर्म भी उनके साथ चारों ओर बिखरेगा, वे लोग फूलों की सुगंध की तरह हैं, वे जिधर जाएंगे अपनी सुगंध साथ लेकर जाएंगे, जिससे समाज को लाभ होगा, दूसरों को इनके बताए रास्ते पर चलने की प्रेरणा मिलेगी, इसलिए उन्हें उजड़ जाने कहा।

दूसरी ओर इस गांव के लोग दुष्ट हैं, इन्हें अतिथि की सेवा करना भी नहीं आता, ऐसे लोगों का एक जगह रहना ही उचित है, क्योंकि इस स्थिति में दुष्टता सीमित हो जाएगी, एक ही जगह रह जाएगी। यदि ये लोग चारों ओर बिखरेंगे, तो इनके साथ इनकी दुष्टता भी बिखरेगी, लोग धर्म का रास्ता छोड़ इनके बताए अधर्म के रास्ते पर चलने लगेंगे, जिससे समाज की हानी होगी…इसलिए इनसे कहा कि तुम यहीं बसे रहो…

सरदारजी द्वारा बताई गई इस कहानी को मैंने अपनी भाषा में लिखा है, हो सकता है मूल भाषा कुछ और हो, परन्तु भाव वही है। कहानी सुनकर मैं विचारों में खो गया। सोचने लगा कि वास्तव में महान आत्माओं की बातें भी महान ही होती हैं। इस कहानी में कितना बड़ा संदेश छिपा है…

इस संसार में अच्छे और खराब का अनुपात बराबर है, जिनता अच्छा है,उतना ही खराब है, रत्ती भर भी कम या अधिक नहीं है, यहां जितना शुभ है, उतना ही अशुभ भी है, जितनी आशा है, उतनी ही निराशा भी है और जितना सुख है, उतना दुख भी है, यह सृष्टि के आरंभ से है और अंत तक ऐसा ही रहेगा …ऐसा क्यों है ? इसकी चर्चा फिर कभी। वर्तमान प्रसंग के अनुसार संसार में अच्छे और खराब का बराबर अस्तित्व है …फिर भी हमें चारों ओर खराब दिखाई देता है, अच्छा बहुत कम दिखता है…

क्यों ? ऐसा क्यों ?

ऐसा इसलिए कि अच्छाई एक सीमित दायरे में रहती है, अच्छाई कुछ जगहों में ही अटक जाती है और खराबी बिखरी हुई रहती है। अच्छाई है, पर उसका प्रसार नहीं हो पाता, दिखाई नहीं देती या दिखाई नहीं जाती, इसलिए दूसरों को प्रेरणा नहीं मिल पाती, इसके विपरीत खराबी को प्रसार के विभिन्न माध्यम मिल जाते हैं, और वह सरलता से अपने प्रभाव का विस्तार कर लेती है …

अतः जो चाहते हैं कि अच्छाई अधिक से अधिक दिखाई दे, वे उसे बसाकर न रखें, वे उसे विभिन्न माध्यमों से बिखराएं, अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाएं, ताकि वह दिखाई दे और लोग उससे प्रेरणा लेकर अच्छा बनने का प्रयास कर सकें ….

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