क्रोध मत करो

*क्रोध मत करो*

एक गांव में एक बूढ़ा अपनी चौपाल पर बैठा बैठा लोगों को समझाया करता था कि यदि जीवन में सुखी और सफल होना चाहते हो तो कभी क्रोध मत करना।

एक दिन पास के गांव का एक व्यक्ति उधर से गुजरा। उसने बूढ़े की शांति और सादगी की बात सुन रखी थी। उसे भी उससे मिलने की उत्सुकता हुई। वह बूढ़े के पास जाकर बैठा और बोला, “मुझे कोई ऐसा सरल सा सूत्र बताएं कि जीवन सफल हो जाए”।

बूढ़ा बोला, “बस एक काम करना – किसी पर क्रोध मत करना।”

राहगीर ने थोड़ा कम सुनने का नाटक किया। उसने कहा, “क्या कहा? मैंने सुना नहीं।”

बूढ़ा थोड़ा जोर से बोला, “क्रोध मत किया कर।”

राहगीर बोला, “थोड़ा ठीक से एक दफा और बताइए।”

बूढ़ा तमतमा कर बोला, “क्रोध मत किया कर।”

राहगीर ने लगभग बहरे की तरह जैसे ही पुन: दोहराने को कहा, बूढ़े ने छड़ी उठाई और उसकी खोपड़ी पर दे मारी। और बोला हजार दफे कह दिया है कि क्रोध मत किया कर, क्रोध मत किया कर, पर समझता ही नहीं है।”

*जो उपदेश दिया जाता है उस पर यदि स्वयं अमल नहीं किया जाता तो वह निरर्थक है।*

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