गरीब by दार्शनिक मनीष

धूप में जलता हुवा पथरीले रास्तो पर उम्मीदो के पंख लिये चलता… मैं एक गरीब हूं मेला जब आता है लोकतंत्र का सौदा होता है हमारे उम्मीद हमारे सपनों का,एक मत के बूते पर उज्जवल भारत का सपना देखता …मैं एक गरीब हूं सरकारी फाईलों मे कैद है हक हमारा,हमारे हिस्से की रोटी सरकारी बाबुओं

वो मिट्टी का घरौंदा झट से बिखर गया

#प्रद्युम्न_की_याद_में_मेरे_द्वारा_मेरे_द्वारा_रचित_छोटा_सा_भाव-: वो मिट्टी का घरौंदा झट से बिखर गया वो मां का दिल था खौफ से शिहर गया सुबह जब स्कूल से आई सहमी सी खबर और पिता से बोला कि प्रद्युम्न भगवान के घर गया, रौंद दिया बचपन को उसके रेत दिया अरमान फांसी दो अब हत्यारे को हम सबकी है फरमान मिट्टी के

हां मै युवा हूं

शीर्षक से देश की युवा के मन भाव प्रदर्शित करने का मेरा एक छोटा सा प्रयास-: मत दो मुझे एक दिन का दुलार दो मुझे एक छोटा सा रोजगार कहने को तो है योजना हजार क्या आंकड़े बतायेगी सरकार,, उड़ते हौसलों के पंख को कटते देख फिर भी गर्व से कहता हूं “हां मै युवा

हां पुरुष ही हूं मैं

एक छोटी सा मेरा भाव समस्त पुरुष प्रजाति को समर्पित___ रशिक भी हूं मैं,पथिक भी हूं मैं नारी के सम्मान का भार उठाता श्रमिक भी हूं मैं__ जब बात होती है नारी के अस्मिता और रक्षा की तो वही रक्षा करने वाला वटवृक्ष भी हूं मैं__ पिता की छाया हूं पुत्र रूपी साया हूं पति

गौरव दिया भारत के सम्मान को

महिला क्रिकेट विश्व कप फाईनल तक पहुंची भारतीय महिला टीम को समर्पित मेरी एक रचना-: वर्ल्ड कप नही जीता फिर भी जीता दिल हिंदुस्तान का मान बढ़ाया शान बढ़ाया गौरव बढ़ाया हिंदूस्तान का, नारी शक्ति को करता नमन शीश झुका मै करता प्रणाम् यत्र नारी पुज्यंते की है परंपरा देश को मिला उसका परिणाम् कोमल

नोट से ही मान मिले

मूड मे आया लिख दिया-: पैसा ही सब मीत जग की यही रीत ना मोह ना माया धन ही सब काया ना अपना ना पराया जितनी भारी है जेब परिवार ने उसी पर ही अपार प्रेम लुटाया बुआ पूछे सैलरी चाची भी पूछे हाल कोई सुधि ना लेत है जब जेब रहे कंगाल मिश्रा भी

गरीब के दर्द

गरीब के दर्द को शब्दों से परिभाषित करने का मेरा एक रचना-: धूप में जलता हुवा पथरीले रास्तो पर उम्मीदो के पंख लिये चलता… मैं एक गरीब हूं मेला जब आता है लोकतंत्र का सौदा होता है हमारे उम्मीद हमारे सपनों का,एक मत के बूते पर उज्जवल भारत का सपना देखता …मैं एक गरीब हूं

शिष्य वही है जो अपने, गुरु का सदैव मान बढ़ाये

गुरु पुर्णिमा के अवसर विश्व समेत मेरे सभी गुरूजनों के सम्मान मेरे द्वारा रचित एक कविता-: हम गीली मिट्टी है गुरू एक कुम्हार मिट्टी से घड़ा बना जीवन दिया संवार, वास्तविकता से आपने ही परिचय करवाया भला कौन बुरा क्या इसका आभाष कराया, आदि हो या अनंत हो आप से है परिभाषित आप के मार्ददर्शन

घर के बड़े बुजुर्ग आदरणीय दादा जी को समर्पित

तुम लौट आओ बाबा, तुम्हारी कुर्सी अब भी खाली है, माँ रख देती है सुबह का ताज़ा अखबार ,  और भूल जाती है कि चूल्हे पे चढ़ा आई है चाय का पानी, खौलता रहता है पानी, बरसती रहती हैं आँखें…. तुम लौट आओ बाबा, अब दूध वाला भी नहीं पूछता कि बाबूजी कहाँ हैं और

वर्षा ऋतु के आगमन पर एक मेरी छोटी सी रचना

देखो काली घटा छाई है खुशी की सौगात लाई है फूल कलीयां भी मुस्कुराई है धरती की अग्न को मिटाई है इंद्रधनुषी रगं की छटा को देखो काली छायी घोर घटा को देखो बादल कर रहे है सिंह गर्जना मोर बनी है वन में नृत्यांगना वर्षा ऋतु देखो कितनी सुहानी है इसलिये तो ये ऋतुओं

जी एस टी के आगमन पर मेरी एक छोटी सी रचना

जी एस टी के आगमन पर मेरी एक छोटी सी रचना-: देखो देखो जी एस टी आई एक देश एक कर कहलाई,, टैक्स चोरों में देखो आफत आई आर्थिक आजादी की है अंगड़ाई,, नयी क्रांति की है यह तरूणाई युवाओं मे है एक उम्मीद जगाई,, बौखलाया विपक्ष मौज मे है भाजपाई मायावती सर पटके और

अन्नदाता किसान को समर्पित

मै एक किसान हू बारिश न होने से परेशान हू उगाता सब्जियां और धान हू आधुनिक तकनीक से अनजान हू मेहनत करता हू दिन रात तब जाकर उगता है अनाज हल चलाकर बोता हू बीज गाय और बैल है मेरे मीत कीट पतंगे और चूहे दुश्मन है ये हमारे मेरे उगाए अनाज से ही पेट

मां का आंचल

हिम सा शीतल,गंगा सा निर्मल मन सा चंचल,मां का आंचल′ इश्वर का उपहार,वसुधा का श्रृंगार प्रकृति का आकार,मां का आंचल, स्वर्ग का सौंदर्य,ब्रह्मांड का एश्वर्य उत्सव और पर्व,मां का आंचल, आत्मीयता का स्पर्श,प्रेम का चर्मोत्कर्ष सफलता का अर्श,मां का आचल, देव की प्रार्थना,कर्म की आराधना सिंह की गर्जना,मां का आंचल “मां का आंचल” शीर्षक से

कुछ अलग जरा सा जी लो तुम

सादा जीवन तो जीते सब, कुछ अलग ज़रा सा जी लो तुम। पयपान सुधा तो पीते सब, जीवन गरलों को पी लो तुम। जो बीत गयी सो बात गयी, नहि उनसे अब कुछ पाना है। जीवन को दो अब लक्ष्य एक, दुष्कर दुर्गम पर जाना है। उस लक्ष्य मोति को पाना है, श्रमसागर में डुबकी

Mera Bharat (By Sugandh Jee)

Mera Bharat (By Sugandh Jee) Sone ki chidiya thi Bharat, tha desh saja Kuchh ratno se, kho gaye kaha wo ratna desh ke, jinhe sanjoya jatno se, Kho gayi kaha wo manavata, jo Bharat ma ki kaya thi, kho gaya kaha vatsalya prem, jisme mamta ki chhaya thi, Hai chhipa kaha vah desh prem, jo